Sunday, 29 December 2019

इच्छा/चाह पर दोहे


 
हुई न पूरी कामना, सदियों भोग विलास।
मन ययाति कहता नहीं, आधा भरा गिलास।।


दिल से चाहे जो तुझे, देख उसी की ओर।
तके चाँद को रात भर, रोता सुबह चकोर।।


चाह गर्क ग़म मयकशी, क्या खयाल है खूब।
ग़म जाने हैं तैरना, मयकश जाता डूब।।


इच्छाएँ रखना मगर, आमदनी अनुसार।
देखा देखी होड़ में, दुखी बहुत घर बार।।


जिसका दामन देखिए, कद से दुगना मान।
क्या क्या चाहे आदमी, मालिक भी हैरान।।


चाह नही संतोष रख, छोड़ संचयन भाव।
डूबे अपने बोझ से, ज्यादा भारी नाव।।


मिली जुझारू जिंदगी, कदम कदम तूफान।
मौत जटायू सी मिले, इतना सा अरमान।।
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*** आर सी शर्मा "गोपाल" ***

Sunday, 22 December 2019

गीत - सरसी छंदाधारित


खेल रचे संसार
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खेल-खेल में मित्र बनें हम, हुआ अचानक प्यार।
जोड़ी बन ऊपर से आती, खेल रचे करतार।।


कह दी उसने खेल-खेल में, एक राज की बात।
हुआ प्यार है मुझको तुमसे, सुन मेरे जज्बात।।
मेरी तुमसे विनती इतनी, सुनो लगाकर कान।
दे सकते हो क्या मुझको तुम, अपनी ये पहचान।।
ठण्डे दिल से करो जरा अब, इस पर गहन विचार।

जीवन तो है एक खिलौना, गठबंधन में सार।
जोड़ी बन ऊपर से आती, खेल रचे करतार।।


प्यार मुहब्बत की ये बातें, सुनकर हुआ अवाक।
माँ-बापू कहते हैं रिश्तें, बने साक्ष्य में पाक।।
रहा सोचता क्या उत्तर दूँ, जगकर सारी रात।
नही दुखा दिल, दे सकता मैं, उसको यूँ आघात।
मात-पिता यदि हामी भरदें, जुड़ें शीघ्र फिर तार।।

खिलती कलियाँ इस जीवन में, करें हृदय संचार।
जोड़ी बन ऊपर से आती, खेल रचे करतार।।


रक्तिम गाल गुलाल देखकर, तुम पर ह्रदय निछार।
प्रणय निवेदन की हामी भर, हृदय हुआ गुलजार।।
माँ-बापू अब कुंकुम-केशर, करें जरा स्वीकार।
मधुर-मधुर ये रूप तुम्हारा, प्रेम-प्रीति आधार।।

आकर घर में दीप जलाकर, करना घर उजियार।
जोड़ी बन ऊपर से आती, खेल रचे करतार।।


*** लक्ष्मण रामानुज लड़ीवाला ***

Sunday, 15 December 2019

आसमाँ (गीत)


उड़ भले लो आसमाँ में यार धरती पर रहो तुम।
बह रही ज्यों धार उसके संग हरदम ही बहो तुम।।


आसमाँ में घर बनायें चाह है सबकी यही तो,
चाँद-तारे तोड़ लायें आरज़ू बस है सभी को,
क्या नहीं मुमकिन अरे पर दर्द उतना भी सहो तुम।
उड़ भले लो आसमाँ में यार धरती पर रहो तुम।1।


आसमाँ मिलता उसे ही जो उसे ही माँगता है,
चाह में उसकी अजी सब कुछ लुटाना चाहता है,
चाह उसकी ही करो फिर बाँह उसकी ही गहो तुम।
उड़ भले लो आसमाँ में यार धरती पर रहो तुम।2।


छोड़ इक दिन आसमाँ को लौट आना है धरा पर,
दो गज़ी सा इक मकाँ ही तो बनाना है धरा पर,
झूठ मैंने हो कहा तो बात सच क्या है कहो तुम।
उड़ भले लो आसमाँ में यार धरती पर रहो तुम।3।


*** अवधूत कुमार राठौर ***

Sunday, 8 December 2019

चित्राधारित *गीत*


 
स्वर्णिम किरण जनी है, अनुरक्त कुंज क्यारी।
नम ओस का फुहारा, विकसित कली कुँवारी॥
*
अलि चूमते अधर-दल, तितली विलास मंजुल।
मृदु मखमली बिछौनें, मकरंद-सार अंजुल।
मद वारुणी छलकती, प्याले-कुसुम सुगंधित।
शुभ भोर कौन लाया, किसकी कृपा खरारी।
नम ओस का फुहारा, विकसित कली कुँवारी॥
*
है पुष्प-वाण शिल्पी, गूँथे अनंग-माली।
स्वागत बरात का हो, मधु चाँद की पियाली।
कमनीय पंखुरी-सी, घूँघट किए वधू ज्यों।
शुचि पुष्प-सेज सज्जित, संसृति समस्त वारी।
नम ओस का फुहारा, विकसित कली कुँवारी॥
*
ओढ़े कफ़न तिरंगा, जब वीर कोई आए।
बरसें सुमन सलोने, राहें सजल सजाए।
माँ भारती झरे है, तब अश्रु-बिन्दु पुष्पित।
है गर्व चमन का यह, छवि छाए शुचित न्यारी।
नम ओस का फुहारा, विकसित कली कुँवारी॥
*
*** सुधा अहलूवालिया ***

Sunday, 1 December 2019

एक गीत




जब-जब अंतर्मन में पीड़ा, करवट-करवट रोई है,
जब-जब हर्ष जुन्हाई काले, बादल-पट में खोई है।
जब-जब भावों की गगरी ने, अश्रु नीर छलकाया है,
काग़ज़ पर गीतों का मौसम मंद मंद मुस्काया है.....


कलियों ने घूंघट खोले जब, फूल हँसे अंगनाई में,
गुनगुन करता भँवरा आया, तितली की पहुनाई में।
जब बादल ने बिजुरी से मिल, सावन का संदेश दिया,
और बहारों ने गुलशन को, हँसने का आदेश दिया।
शब्दों की माला पहने जब प्रीति-दुल्हन डोली बैठी,
सुख के चार कहारों ने, हैया हो हैया गाया है...
कागज़ पर गीतों का मौसम ...


कोई पथिक पेड़ के नीचे, थक कर बैठा जब गुमसुम,
आस परी पायल छनकाती, आई है रुमझुम-रुमझुम।
धरती के आंचल पर टाँके अम्बर ने जगमग मोती,
जुगनू की आंखों में झिलमिल शुभ्र ज्योत्स्ना नित होती।
सृष्टि-नटी के कण-कण में जब, मधु-वीणा झंकार हुई,
चाँद-रात ने झीलों में जब, मधु आसव टपकाया है.....
कागज़ पर गीतों का मौसम....


और विदा का समय हुआ, संसार पराया अब लगता,
ईश-मिलन को मन का पंछी, रोज जतन कितने करता।
यमुना के तट बंशी की बस, तान सुनाई देती है,
निर्गुण ब्रह्म ज्ञान दीपक की, ज्योति दिखाई देती है।
चलाचली की बेला में जब, सांसों ने उन्मत होकर,
एक मरण-उत्सव पूरी श्रद्धा से आन मनाया है...
कागज़ पर गीतों का मौसम....


*** दीपशिखा ***

Sunday, 24 November 2019

सार छंद




धरती ने चूनर ओढ़ी है, जिसके कारण धानी।
उस जल को ही जीवन कहते, ऋषि मुनि ज्ञानी ध्यानी।।
बूँद-बूँद अनमोल धरा पर, बात सभी ने मानी।
कुदरत से उपहार अनोखा, हमें मिला है पानी।।1।।

जीवन केवल वहाँ-वहाँ है, जहाँ-जहाँ है पानी।
इसकी ही फ़िजूलखर्ची कर, मनुज करे मनमानी।।
पीने के काबिल धरती पर, ढाई प्रतिशत पानी।
देख-देख बर्बादी इसकी, होती है हैरानी।।2।।

धरती पर रहता है पानी, भिन्न-भिन्न रूपों में।
बर्फ ओस पाले में पानी, भाप नदी कूपों में।।
झील तड़ाग और झरनों में, सागर में भी पानी।
लेकिन कारण जल संकट का, फितरत है इंसानी।।3।।

उन सर सरिताओं में हमने, नित अपशिष्ट मिलाया।
जीवनदायी जल जिन सबने, हमको सदा पिलाया।।
जंगल काटे धरती को भी, कंकरीट से पाटा।
जल पहुँचा पाताल रूठकर, करके हमसे टाटा।।5।।

जीवन अगर बचाना है तो, संरक्षित अब जल हो।
वृक्ष लगा बर्बादी रोकें, तभी समस्या हल हो।।
जितने भी जंगल काटे हैं, उतने पेड़ लगाएँ।
यह संकल्प आज हम लेकर, जीवन सफल बनाएँ।।5।।


*** हरिओम श्रीवास्तव ***

Sunday, 17 November 2019

विमोहा छंद


 
प्रेम की जोत से। ज्ञान के स्रोत से।
आत्म चैतन्य हो। प्रेम से धन्य हो॥1॥


भावना प्रेम हो। कामना क्षेम हो।
वेद का ज्ञान हो। कर्म में ध्यान हो॥2॥


सत्य ही धर्म है। प्रेम ही कर्म है॥
सत्य देखो जरा। प्रेम से है धरा॥3॥


गोपियाँ राधिका। प्रेम की साधिका।
कृष्ण आराधना। वो न हों उन्मना॥4॥


प्रेम की मोहिनी। कृष्ण की रागिनी॥
ये अहं रीतता। प्रेम ही जीतता॥5॥


मार्ग हो सत्य का। लक्ष्य हो मर्त्य का।
व्यक्ति बच्चा रहे। प्रेम सच्चा रहे॥6॥




*** कुन्तल श्रीवास्तव ***

Sunday, 10 November 2019

नदी गीत


 
लहर लहर पर मचल रही है, अमिट सदी की प्यास।
प्रियतम सागर में मिल जाऊँ, विकल नदी की आस।।


ओ मछुआरे भूल न जाना, नित्य फेंककर जाल।
जीव जगत का हश्र यही है, बना न कोई ढाल।
अश्रु बहाता मीन नयन ये, मुझको है आभास।
 
प्रियतम सागर में मिल जाऊँ, विकल नदी की आस।।

चतुर सयानी ऊषा शोभित, तट पर जिसके प्रात।
गीत सिंदूरी गाती उर्मिल, दे जाती सौगात।
संत सबेरा कर्मठ साधक, उर में करे विलास।
 
प्रियतम सागर में मिल जाऊँ, विकल नदी की आस।। 

सुन प्रवाहिनी निर्झरिणी क्यूँ, बहती ले उन्माद।
जननी जैसा आँचल तेरा, मन में भरे विषाद।
नेह लुटा कल-कल निनाद से, हृदय जगा विश्वास।
 
प्रियतम सागर में मिल जाऊँ, विकल नदी की आस।। 
 
*** डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी ***

Sunday, 3 November 2019

पावन भारत देश हमारा (गीत)


 


पावन भारत देश हमारा, अखिल जगत से न्यारा है।
हरित धरा का राष्ट्र यही तो, सब संतों को प्यारा है।।


गंगा-सी पावन सरिता ने, जन-जन का उपकार किया।
चारों प्रयाग बने तीर्थ ये, बने शहर मैदान यहाँ।।
सभी सगर के मृत पुत्रों का, गंगा ने उद्धार किया।
सरिता की पावन माटी से, बने खेत-खलिहान यहाँ।।
नही मलिन अब पावन जल हो, यह संकल्प हमारा है।


शब्द-शक्ति से सन्देश भरा, माँ मेरा हो आलेखन।
विकसित करना पाक भावना, सच में एक चुनौती है।।
शब्द-शब्द में झरे लेखनी, इतना ही आत्म-निवेदन।
उल्लास भरी हो शुद्ध भावना, प्रभु से यही मनौती है।।
नीरामृत सा निर्मल जीवन, अब बस एक सहारा है।


पुष्प बीच काँटों के अंदर, रहे सुरक्षित तब खिलता।
जब भी कष्ट अन्य के झेले, कहीं हृदय को सुख मिलता।
चञ्चलता चपला देती है, सरिता देती शीतलता।
मिले गम्भीरता सागर से, मिले शिखर से मौलिकता।।
इसी भूमि के सन्त पुरोधा, सकल जगत उजियारा है।


पावन भारत देश हमारा, अखिल जगत से न्यारा है।
हरित धरा का राष्ट्र यही तो, सब संतों को प्यारा है।।


*** लक्ष्मण रामानुज लड़ीवाला ***

Sunday, 27 October 2019

दीवाली गीत

 

जीवन-अमा घनेरी, नम आस-दीप जलते।
मृग-तृषा वेदना में, मृदु दिवा-स्वप्न पलते॥

नित चाह होम होती, नव भोर आस बोती।
स्वर्णिम क्षितिज खुलेगा, मन-कामना सँजोती।
तिल-तिल शिखा जली है, मन-मोम दीप गलते।
मृग-तृषा वेदना में, मृदु दिवा-स्वप्न पलते॥

लघु वर्तिका सुलगती, सित वासना हृदय में।
वह झूठ-मूठ बंदिश, माँ गा रही सदय में।
सोई कली अभी चुप, हैं अक्ष-तुहिन ढलते।
मृग-तृषा वेदना में, मृदु दिवा-स्वप्न पलते॥

शुचि यामिनी अमावस, धरती-गगन मिलन है।
मन बावरा हुआ-सा, यह बाल-मन सुमन है।
फुलझरी जुगनुओं की, तारे प्रदीप्त छलते।
मृग-तृषा वेदना में, मृदु दिवा-स्वप्न पलते॥

दे प्यार भरी झप्पी, चीवर उढ़ा दिया है।
शिशु मुग्ध करे माँ को, प्रिय आँख का दिया है।
यह नेह-लक्ष्मी है, आशीष यहाँ फलते।
मृग-तृषा वेदना में, मृदु दिवा-स्वप्न पलते॥

*** सुधा अहलूवालिया ***

Sunday, 20 October 2019

एक गीत

 

बल के रूप अनेक हैं, और बहुत से नाम।
करें कभी सद्कार्य ये, करें बुरा भी काम।।


धन-बल, भुज-बल बुद्धि-बल, रहता जिनके संग,
सुविधाओं की बाढ़ ले, घर नित बहती गंग,
इसीलिए तो भाग्य भी, होय न उनका वाम।1।


दल-बल, छल-बल के धनी, करें जगत पर राज,
हाथ जोड़ के सबल सब, करते उनके काज।
निबल सदा दरबार में, झुक-झुक करें सलाम।2। 


आत्म-बली का बल सदा, बनता उसकी शक्ति,
सब बल मिलकर रोज ही, करते उसकी भक्ति,
दुख की बारिश में उसे, होता नहीं ज़ुकाम।3। 


सत-पथ गामी जो रखे, श्रम- बल अपने साथ,
ऋद्धि-सिद्धि सी देवियां, थामें उसका हाथ,
उसके रक्षक जगत में, रहें सदा श्री राम।4।


*** अवधूत कुमार राठौर ***

Sunday, 13 October 2019

बस गान तेरा ही करुँ


 
पुष्प या बहु कंटकों से पथ भरा हो
हों प्रकीर्णित रश्मियाँ या कोहरा हो
जो तुम्हारे द्वार तक ले जाए मुझको
बस यही वरदान दो प्रभु! मैं सदा, उस पंथ पर ही पग धरूँ


नींद में होऊँ भले या चेतना में
हर्ष में होऊँ भले या वेदना में
एक पल भूलूँ नहीं तुमको कभी मैं
बस यही हे ईश कर दो, चित्त तुमसे ही सदा अपना भरूँ 


तीव्र लहरें हों भले या शांत धारा
दीखता हो दूर कितना ही किनारा
आ रही हो ज्योति तेरी जिस दिशा से
बस यही भगवान वर दो, नाव का अपनी उधर ही रुख करूँ


*** प्रताप नारायण ***

Sunday, 6 October 2019

रावण वध


बाहर का रावण मर करके,
फिर जिंदा हो जाएगा।
मार सको तो मारो अपने,
अंदर बैठे रावण को।


गूढ़ अर्थ है विजयपर्व का,
चिंतन जरा सँभालो तो।
मानस का अंतर्संदेशा,
आओ जरा खँगालो तो।
विजय सत्य की थी असत्य पर,
सोचो तो इस कारण को।
मार सको तो मारो अपने,
अंदर बैठे रावण को।


रावण रथी, विरथ थे राघव,
सैन्य शक्ति भी ज्यादा थी।
पर रघुनंदन के अंतस में,
शाश्वत बस मर्यादा थी।
तभी तो लंका झेल न पायी,
हनुमत कष्ट निवारण को।
मार सको तो मारो अपने,
अंदर बैठे रावण को।


आत्मशक्ति का दीप्त मंत्र ही,
जग में शक्ति साधना है।
कर्मयोग से सदाचार ही,
प्रतिपल हमें बाँचना है।
रसना रटे सदा इस उद्भट,
बीजमंत्र उच्चारण को।
मार सको तो मारो अपने,
अंदर बैठे रावण को।


*** अनुपम आलोक ***

Sunday, 29 September 2019

पिता

 

आधार सतत मेरे पद के ,
शुचि कर्मयोग,योगी ललाम।
हे पूज्य पिता! तुमको प्रणाम।


तुमसे पाकर के यह काया।
धरती का शाश्वत सुख पाया।
उंगली को मेरी पकड़-पकड़,
तुमने ही चलना सिखलाया।
जब भी बहकी, उलझी, सिहरी-
बढ़कर हल दे डाले तमाम।
हे पूज्य पिता! तुमको प्रणाम।


तन से कठोर, मन मृदुल भाव।
श्रीफल के जैसा है स्वभाव।
हर कदम लक्ष्य की ओर बढ़े-
खेती जैसे पतवार नाव।
अपने अनुभव के गहनों से-
पथ को देते गौरव मुकाम।
हे पूज्य पिता! तुमको प्रणाम।


हे सृजक, सृजन के चिर नायक।
मन-मोद व्यंजना अरुणायक।
मेरे जीवन के शुचि अम्बर -
प्रेरणास्रोत मंगलदायक।
निज वरदहस्त रखना सदैव -
हो पाए न मुझसे लक्ष्य बाम।
हे पूज्य पिता! तुमको प्रणाम।


*** सुनीता पाण्डेय 'सुरभि' ***

Sunday, 22 September 2019

माँ



हर बला दुनिया की जाकर के कहीं सोती है
जब मेरी माँ की दुआ साथ मेरे होती है


आसमाँ फटता है बारिश भी बहुत होती है
जब कभी घर के किसी कोने में माँ रोती है 


टुकड़े हों चार मगर पाँच हों खाने वाले
मुझे है भूख नहीं कहने को माँ होती है 


रात उस एक की कीमत भला चुकाऊँ क्या
जब मेरे गीले किए बिस्तरे पे सोती है 


सारी दुनिया के सभी रिश्तों से लम्बा रिश्ता
माँ मुझे नौ महिने फ़ालतु जो ढोती है 


बेटे और बेटी में करती है फ़र्क़ ये दुनिया
माँ को बेटे की तरह बेटी प्यारी होती है 


तू अपनी खाल की गर जूतियाँ बनवाए 'कपूर'
चूमते चूमते मर जाए वो माँ होती है 


*** यशपाल सिंह कपूर ***


Sunday, 15 September 2019

गणपति बप्पा मोरिया

 
जय गौरीनंदन, हे जगवंदन,
सुनहु प्रार्थना, यह मोरी।
हौं अवतरुँ जँह जँह, तुम हो तँह तँह,
करहुँ भगति नित, मन तोरी।।1।।


जय गणपति देवा, मोदक मेवा,
भोग देय तव, यह दासा।
किरपा तव पावहुँ, तव जस गावहुँ ,
अनत नहि मम, मनआसा।।2।।


जय जय गणनायक, बुद्धि प्रदायक,
हरहु हृदय प्रभु, अज्ञाना।
नव चिंतन पावहुँ, जन हित धावहुँ,
करहु दृष्टि मम, विज्ञाना।।3।।


धरुँ सेवक बाना, जन कल्याना,
भाव हृदय प्रभु, भर डालूँ।
रिपु मीत बनालूँ, हृदय लगालूँ,
रिपुता पुनि नहि, प्रभु पालूँ।।4।।


सुनु हे लम्बोदर, हे विद्याधर,
अबकि बरस तुम, पुनि आना।
हम बाट निहारें, तुमहिं पुकारें,
हमहुँ न तुम प्रभु, बिसराना।।5।।


*** अवधूत कुमार राठौर ***

Sunday, 8 September 2019

*विदाई गीत*


वधू चली सजल नयन, गले सुमंजु हार है।
प्रयाण की नवल घड़ी, नया-नया विहार है॥

सिमट गई प्रकृति लजा, निकुंज कृष्ण-राधिका,
मिलन-घड़ी समीप शुचि, अनंग वाण-साधिका,
विधान नें नया-नया, विछोह गीत है लिखा,
तुहिन-प्रभा छलक गई, नया-नया चमन दिखा,
अनंत पुष्प खिल उठे, सुगंध की फुहार है।
प्रयाण की नवल घड़ी, नया-नया विहार है॥

घटा घुमड़ ढही कहीं, अनंत बिजलियाँ गिरें,
सुलोचना लजा रही, पलक-जलद झरें-झरें,
विवेचना कुचाल से, हुई अधीर कामिनी,
पवन गई ठहर-ठहर, हिमांशु-गात भामिनी,
नया-नया अशीष ले, कहीं मिले प्रहार है।
प्रयाण की नवल घड़ी, नया-नया विहार है॥

नयन सजे डरे-डरे, नई-नई कली खिली,
नए-नए प्रभात को, नई-नई किरण मिली,
विलास भास लास में, प्रभास हास है तरुण,
विभावरी रमें सदा, न पूर्व से उगे अरुण,
धुली धवल धरा नवल, अनंग-धनु बहार है।
प्रयाण की नवल घड़ी, नया-नया विहार है॥

*** सुधा अहलूवालिया ***

Monday, 2 September 2019

स्वप्न नयन में पलते हैं


आनंदित करते हैं प्रायः, यदा-कदा ये छलते हैं।
सोते-जगते रात्रि-दिवस ही, स्वप्न नयन में पलते हैं।।


आशाओं की नौकाओं पर
ख़ुशी लादकर ले आते।
पलकों की चौखट पर बैठे,
हौले हौले मुस्काते।।
किंतु कभी अन्तह-कानन में, अति प्रदग्ध हो जलते हैं।
सोते-जगते रात्रि-दिवस ही, स्वप्न नयन में पलते हैं।।


बचपन के बोए सपने सब
तरुणाई पर छा जाते।
साथ उम्र के बढ़ते बढ़ते,
अम्बर तक लहरा जाते।।
होड़ लगाते हैं सूरज से, संग चाँद के चलते हैं।
सोते-जगते रात्रि-दिवस ही, स्वप्न नयन में पलते हैं।।


कितनी विविध कलाएँ इनकी,
सजते और बिखरते हैं।
कभी उड़ा ले जाते नभ पर
कभी टूट कर झरते हैं।।
एक काँध पर विगत, एक पर, आगत धरे निकलते हैं।
सोते-जगते रात्रि-दिवस ही, स्वप्न नयन में पलते हैं।।


*** प्रताप नारायण ***

Sunday, 25 August 2019

दुर्मिल सवैया


 
(विधान - सगण (११२)× 8 = 24 वर्ण प्रति चरण, 12-12 वर्ण पर यति, चार चरण सम तुकांत)

घनघोर घटा मन आँगन में, तन मोर प्रकम्पित वायु करे।
तलवार दिखाय रही चपला, यह देखि सखी मन मोर डरे।।
जब सावन में बदरा बरसे, लगता नभ नैनन नीर झरे।
मनमोहन छोड़ गये जबसे, रसना रटती हर श्वास हरे।।


बहती शुचि शीतल मंद हवा, मन गीत सुहावन गावत है।
दृग खोलि हँसे फुलवा मन के, प्रिय आय रहे बतलावत है।।
मन मोर हवा सँग में उड़ता, बँसिया ब्रजनाथ बजावत है।
अब चैन न आय उमंग भरी, लगता घनश्याम बुलावत है।।


*** चन्द्र पाल सिंह "चन्द्र" ***

Sunday, 18 August 2019

स्वतन्त्रता का गीत

 
युगों युगों से चल रही, उत्सव की यह रीत,
आजादी का पर्व है, गाओ मंगल गीत।

घोर गुलामी में रहे, बहुत हुए बर्बाद,
संघर्षों के बाद ही, आज हुए आजाद,

भारत माँ को है नमन, जगी सभी में प्रीत,
आजादी का पर्व है, गाओ मंगल गीत।


कुर्बानी जो दे गये, सदा रहेंगे याद,
इसका प्रतिफल ये मिला, सब होंगे आबाद,

उन सबके गुणगान में, सुखद बजे संगीत,
आजादी का पर्व है, गाओ मंगल गीत।


आज पूर्ण आजाद हैं, होगा सही विकास,
भेद भाव सब छोड़ कर, करने उचित प्रयास,

हर जन में उत्साह हो, हर जन में हो प्रीत,
आजादी का पर्व है, गाओ मंगल गीत।


*** मुरारि पचलंगिया ***

Sunday, 11 August 2019

दक्षता पर दोहे

 
सदा दक्ष ही जीतते, बाजी को हर बार।
करते अपनी नाव को, चतुराई से पार।।


कुशल बने अभ्यास से, लगे लक्ष्य पर तीर।
दक्ष सदा ही खींचते, सबसे बड़ी लकीर।।


पग-पग पर संघर्ष है, इस जीवन में मीत।
करें दक्ष ही सामना, मिले उन्हें ही जीत।।


जिसमें जितनी दक्षता, उतनी भरे उड़ान।
दुस्साहस करते नहीं, वे ही चतुर सुजान।।


सदा कुशल चातुर्य ही, रखकर दृढ़ विश्वास।
सदा कुशल व्यवहार से, करता त्वरित विकास।।


रखते जो चातुर्य से, सबके सम्मुख पक्ष।
सभी मानते हैं उसे, उसी क्षेत्र में दक्ष।।


मानवता से युक्त हो, बनकर शिक्षित दक्ष।
अनुभव से ही रख सकें, दृढ़ता से हम पक्ष।।


*** लक्ष्मण रामानुज लड़ीवाला ***

Sunday, 4 August 2019

भीगता तन-मन चला



पग कथानक रच रहे हैं मौसमों की धार में
भीगता तन-मन चला गंतव्य को बौछार में


वेग कोई दे चुनौती चाहे आये बाढ़ - सी
वय उमंगों से भरी ही खेलती जलधार में 


सावनी छाई घटा दिल खोल कर बरसे यहाँ,
झूम लेंगे मन खुशी के संग ही परिवार में


मेह को किसकी पड़ी है वो नहीं ये देखता
कौन भीगा कौन सूखा रह गया संसार में 


खोल लो छतरी तुम्हारी ओढ़ लो बरसातियाँ
विघ्न बरसी ऋतु न डाले हाँफती रफ्तार में


एक पल देखो ठिठक बूँदे धरा पर नाचतीं
राग बजता मेघ का डूबा हुआ मल्हार में 


*** मदन प्रकाश ***

Sunday, 28 July 2019

गीत - ताजमहल



प्यार-मुहब्बत से यह दुनिया, महक रही है आज भी।
यही कहानी सब से कहता, एक अनूठा ताज भी।।


जोड़ा कोई जब-जब देखे, बोले वाह!कमाल है।
कहता है यमुना का जल भी, अद्भुत प्रेम-मिसाल हैै।।
झेल रहा सब उन्नत मस्तक, असर न छाया-धूप का।
सदियों से प्रतिबिम्ब निहारे, अपने अनुपम रूप का।।
छूकर हँसता हर मौसम पर, हुआ न मैला साज भी।
यही कहानी सबसे कहता, एक अनूठा ताज भी।।


प्राण-पखेरू जब उड़ जाते, पिंजरे रूपी देह से।
रह जाता तब सबकुछ अपना, जिसे सँवारा नेह से।।
रोता है क्यों बोलो कोई, अपने प्रिय की याद में।
सदा सँजोये रहता क्यों मन, सुधियाँ सारी बाद में।।
बिलख-बिलखकर रोने में क्यों, कभी न आती लाज भी।
यही कहानी सबसे कहता, एक अनूठा ताज भी।।


हर मज़हब से प्रेम बड़ा है, सीखो बोली प्यार की।
देकर जाएँ कभी न जग को, बातें हम तकरार की।।
आते हैं वो लोग धरा पर, ईश्वर के वरदान से।
जीते हैं जो हँसकर जीवन, मरते हैं जो शान से।।
बन जाते हैं वही प्रेम की, 'अधर' मधुर आवाज भी।
यही कहानी सब से कहता, एक अनूठा ताज भी।।


*** शुभा शुक्ला मिश्रा 'अधर' ***

Sunday, 21 July 2019

"सजन रे झूठ मत बोलो"


 
"मुहब्बत की नहीं मुझसे", सजन रे झूठ मत बोलो। 

लता के सम लिपट जाना, नखों से पीठ खुजलाना,
अधर से चूम लेना मुख, नयन से कुछ कहा जाना,
कभी पहना दिया हमदम, गले में हार बाहों का,
अचानक गोद में लेकर, तुम्हारा केश सहलाना,
हथेली से छुपा लेना, तुम्हारा नैन को मेरे,
इशारे प्यार के थे या, शरारत भेद यह खोलो,
"मुहब्बत की नहीं मुझसे", सजन रे झूठ मत बोलो।  

तुम्हारा डाँटना या फिर ,तुम्हारी झिड़कियाँ मीठी, 
ज़रा सी बात पर आँसू, बहाने के बहाने भी, 
तुम्हारा हक़ जताना भी, तुम्हारी ज़िद सभी नखरे,
बताओ किस तरह मानूं, अदाओं की कलाबाज़ी, 
बुने जो ख़्वाब थे हमने, हमारे आशियाने के,
प्रिये ! बरखा बिना संभव, कभी क्या बीज भी बो लो, 
"मुहब्बत की नहीं मुझसे", सजन रे झूठ मत बोलो। 

कठिन होगा तुम्हारे बिन, सनम हर हाल में जीना,
जुदाई का हलाहल भी, बड़ा मुश्किल यहाँ पीना,
तुम्हीं ने डोर बाँधी थी, तुम्हीं ने तोड़ क्यों डाली?
अचानक क्यों मुझे जो हक़, दिया था प्रीत का छीना?
प्रतीक्षारत रहूँगा मैं, अभी तक आस है बाकी,
क़सम है लौट आओ तुम, न जीवन में ज़हर घोलो,
"मुहब्बत की नहीं मुझसे", सजन रे झूठ मत बोलो। 

*** गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' बीकानेरी ***

Sunday, 14 July 2019

मर्म धर्म का


 
मर्म धर्म का समझो पहले
फिर करना प्रभु का ध्यान
काशी काबा व्यर्थ है सब कुछ
अंतस में सब धाम
पावन गंगा क्या करे
सब कर्मों के हैं फल
अच्छे कर्म नहीं तो मनवा
गंगा सिर्फ है जल
जाने भ्रम में जीने का
ये क्यों करता अभिमान
सच्चा सुख नहीं काशी में
 क्यों समझा न इंसान
कर्म ईश है, कर्म है गंगा,
कर्म ही शक्तिमान
राशि, रत्न और ग्रह शान्ति से
कब मुश्किल हुई आसान
अच्छे कर्मों से तू मानव
कर अपना उत्थान
दीन दुखी को सहारा देकर
अपना जन्म सँवार 
अच्छे कर्मों के अच्छे ही
फल देते भगवान्
प्रभु मिलन की अच्छे कर्म ही
राह करते आसान
पाप कर्म से तौबा कर
फिर होंगे
तुझ में
चारों धाम
तुझमें
तेरे राम
तुझमें
तेरे श्याम 

*** सुशील सरना ***

Sunday, 7 July 2019

नट नागर ये


रंग मंच पर
नट नागर ये
पल पल वेश बदलते


बड़े खिलाड़ी खेल जगत के
रोज तमाशे करते
कभी बाँधते पगड़ी सिर पर
कभी पाँव में धरते


नाच रहे हैं
नचा रहे हैं
रोते कभी उछलते


कभी बने हैं राजा बाबू
रंक कभी हो जाते
कभी न्याय के कभी लूट के
सबको पाठ पढ़ाते


कभी अकेले
कभी भीड़ सँग
घर से रोज निकलते


खेल -खेल में रहे खिलाते
हारे फिर से खेले
अपनी करनी अपनी भरनी
लादे कई झमेले


खेल-खेल में
खाईं खोदें
कैसे लोग सँभलते


*** बृजनाथ श्रीवास्तव ***

Sunday, 30 June 2019

उनसे आँखें चार हुई थीं



पहली पहली बार हुई थीं
उनसे आँखें चार हुई थीं 


बिन मौसम ऋतुराज आ गया
महक उठी थीं मंद हवाएँ
भू से नभ तक पुष्प खिल उठे
लहक उठीं तरु की शाखाएँ 


आँखें उनकी सागर दिखतीं
नज़रें मधुर फुहार हुई थीं


कण-कण नवल कांति से चमका
नई-नई-सी लगीं दिशाएँ
देवलोक भू पर उतरा ज्यों
छाईं हिय पर मदिर घटाएँ


सभी कोशिशें चेतनता की
उस पल में बेकार हुई थीं 


शशि ने रजनी के आँचल में
सतरंगी तारे टाँके थे
भोर-ओट से उचक-उचक कर
स्वप्न सैकड़ों ही झाँके थे


परी कथाएँ बचपन की ज्यों
सारी ही साकार हुई थीं


*** प्रताप नारायण ***

Sunday, 23 June 2019

जीवन के रंग


सात रंग है स्वप्न के, देखे कोई धीर।
चलाचली के जगत में, कोई एक कबीर॥


बोल दिया खुद चित्र ने, अपना पूरा नाम।
दर्पण मुझको ये कहे, कलमकार का काम॥


विधना ने जो लिख दिया, धरा उकेरे चित्र।
अपने रेखा चित्र को, खुद विस्तारो मित्र॥


जीव देह में रंग का, सुन्दर ये चितराम।
कूँची ने यूँ लिख दिया, जीवन है अभिराम॥


दुनियाँ बहुत विचित्र है, खींचे कितने चित्र।
तिलक करे तब आप के, मतलब निकले मित्र॥


*** जी.पी. पारीक ***

Sunday, 16 June 2019

चरण सोरठा छन्द



देश हमारा भाव, टुकड़ा नहीं जमीन का।
इससे हमें लगाव, मूरत दिली यकीन का॥1॥


करें देश को याद, रहते जब परदेश हम।
रहें शाद आबाद, मुल्क करे सब दूर ग़म॥2॥


राष्ट्रगान है मान, राष्ट्र हमारा नेक है।
देश हमारी शान, भिन्न वेश ध्वज एक है॥3॥


जन्मभूमि है जान, उसके लिए मरें जियें।
बनें नेक इंसान, चषक एकता का पियें॥4॥


देश प्रेम का रोग, सिर पर चढ़ कर बोलता।
हृदय बसा यह योग, नहीं मृत्यु से डोलता॥5॥


भारत देश महान, ज्ञान गुणों से है भरा।
मातृभूमि पहचान, जाने सारी यह धरा॥6॥


सब लोकों में श्रेष्ठ, जन्मभूमि अरु मात है।
कहते इसको ज्येष्ठ, संस्कृति की यह बात है॥7॥


*** कुन्तल श्रीवास्तव ***

Tuesday, 11 June 2019

परहित सरिस धर्म नहिं भाई




परहित सरिस धर्म नहिं भाई, ग्रन्थों लिखी नजीर सखे।
ताल-तलैया बहती नदिया, पीती कब निज-नीर सखे।।


पीर-परायी जिन आँखों में, बहती गंगा-नीर सखे।
नीर क्षीर में रमा रमा पति, मंदिर बना जमीर सखे।।
रोम रोम में कोटि-देवता, थान जमाकर रास करें,
भाग्य पढ़े क्या उसका गुनिया, हाथों लिखी लकीर सखे।।1।।


भाग्य बाँचने वाला अक्सर, मिलता सदा फकीर सखे।
कर्मवीर ही निज हाथों से, लिखता निज तक़दीर सखे।।
छेनी ले कर दान नेत्र जब, संगतराश करे प्रमुदित,
मंदिर में भगवन की तब-तब, मुस्काती तस्वीर सखे।।2।।


सदा स्वार्थवश स्वार्थी रमते, डाल पैर जंजीर सखे।
काक दृष्टि-सी भाती जिनको, अपनी ही जागीर सखे।।
मन में रखते राग-द्वेष वह, चेहरे पर स्मित गहरी,
पीर पराई सुई बराबर, दुख अपना शमशीर सखे।।3।।


*** गोप कुमार मिश्र ***

Sunday, 2 June 2019

तब हो हृदय विभोर (सरसी छन्द आधारित गीत)


नयन मौन हो देख रहे हैं, घूम-घूम चहुँ ओर।
भरी दुपहरी सड़कों पर हैं, सन्नाटे का शोर।।


घायल की हो शीघ्र चिकित्सा, पहुँचाये पर कौन।
क्षणभर में ही चीखें सारी, धारण करती मौन।
रोगी वाहन नहीं पहुँचता, जब तक होती मौत।
देख तमाशा चलते बनते, सन्ध्या हो या भोर।
नयन मौन हो देख रहे हैं, ---- - - - - -


मौन शब्द की ताकत जानें, वहीं समझते अर्थ।
मौन साधना करें वही जो, करें न ऊर्जा व्यर्थ।
पौ फटते ही दौड़े वाहन, देते चुप्पी तोड़।
कुहू कुहू के शब्दों से ही, नाचे मन का मोर।
नयन मौन हो देख रहे हैं, - - - - - - -


बढ़ा प्रदूषण कोलाहल का, समाधान गम्भीर।
खो देता है धैर्य आदमी, चुभे शोर का तीर।
पर्यावरण प्रेम का हो जब, बढ़े जगत की शान।
स्वर्णिम हो अब पुनः सदी ये, तब हो हृदय विभोर।
नयन मौन हो देख रहे हैं, सन्नाटे का शोर।

नयन मौन हो देख रहे हैं, - - - - - - -

*** लक्ष्मण रामानुज लड़ीवाला ***

Sunday, 26 May 2019

रात का दर्द


रात हूँ मैं नित्य आती सूर्य के अवसान पर।
चाँद तारे टाँकने आकाश के अवतान पर।
**
झूठ कहते लोग हैं कि भोर से है दुश्मनी।
सिद्ध कर दें वे कि मेरी भोर से कब कब ठनी।  
सत्य तो यह पथ हमारा एक दूजे से अलग।
इसलिए रहते हमेशा हम निरंतर हैं विलग। 
एक को आराम देने दूसरा कर्तव्य रत,
गर्व होता है मुझे इस नित्य के बलिदान पर। 
रात हूँ मैं नित्य आती सूर्य के अवसान पर।
**
मैं तमस की मित्र हूँ तो गालियाँ मिलती मुझे।
लोग कहते क्रूर निर्मम और काली भी मुझे।
गौर हो इन्सान मेरा भक्ष्य होता है नहीं।
नाश क़ुदरत का करूँ यह लक्ष्य होता है नहीं।
मानिये अहसान मेरा विश्व के मानव सभी,
और पश्चाताप कर लें अब स्वयं अज्ञान पर।
रात हूँ मैं नित्य आती सूर्य के अवसान पर।
**
कर्म गन्दे लोग करते रात का मुख देखकर।
माफ़ करिये दोष किञ्चित है नहीं मेरा मगर।
गल्तियाँ मानव करे फिर दोष क्यों है रात पर?
ध्यान दें सारे मनुज अब बैठकर इस बात पर।
बिक रही इज्ज़त किसी की बेचता यह कौन है?
गर्व कैसा कर रहा मानव इसी उत्थान पर।
रात हूँ मैं नित्य आती सूर्य के अवसान पर।  
**
रात हूँ मैं नित्य आती सूर्य के अवसान पर।
चाँद तारे टाँकने आकाश के अवतान पर।
**
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' बीकानेरी 


अवतान - मंडप

Sunday, 19 May 2019

दोहा सप्तक

 
प्रेम जनित विश्वास का, पावन सुभग चरित्र।
भाई सा जग में नहीं, रिश्ता यहाँ पवित्र।।


भाई का क्या अर्थ है, भाई का क्या मान।
लिखा धरा पर भरत ने, भाई का उपमान।। 


भरत और सौमित्र का, पढ़ो जरा सा चरित्र।
भाई के शब्दार्थ को, तब समझोगे मित्र।।


हो समर्थ रिश्ता सबल, फलते स्वयं सुयोग।
मन से भ्राता शब्द का, करिए तो उपयोग।।


यदि भाई के शब्द का, रक्खा तुमने मान।
निश्चित ही संसार में, पाओगे सम्मान।।


भाई के अपवाद हैं, अनुभव में कुछ मित्र।
बालि और लंकेश का, देखो कुटिल चरित्र।।


सब धर्मों का सार है, रिश्तों का अहसास।
कभी न जग में तोड़िए, भाई का विश्वास।।


  *** अनुपम आलोक ***

Sunday, 12 May 2019

नारी




रूप धरा तुमने धरती का, या धरती ने रूप तुम्हारा ।
या फिर एक सृष्टि-गंगा की, तुम दोनों ही अविरल धारा।।


तन बोझिल दोनों का रहता।
भार सदा इस जग का सहता।
पर कोमल निर्मल अंतर्मन,
पीर किसी से कभी न कहता।।


दोनों जननी, सकल तुम्हारा, किन्तु अन्य को देती सारा।
रूप धरा तुमने धरती का, या धरती ने रूप तुम्हारा।।


सहकर पीड़ा सर्जन करती।
निज संतानों के दुख हरती।
कष्ट स्वयं के हिस्से में रख,
सबकी झोली में सुख भरती।।


स्वार्थ हेतु तुम दोनों ने ही, कभी नहीं कुछ भी स्वीकारा।
रूप धरा तुमने धरती का, या धरती ने रूप तुम्हारा।।


ताप कहाँ उतना दिनकर में।
जितना दोनों के अंतर में।
कहाँ जलद में जल है उतना,
जितना आँचल के सागर में।।


अग्नि, वरुण की क्या बिसात है, अटल काल भी तुमसे हारा।
रूप धरा तुमने धरती का, या धरती ने रूप तुम्हारा।।


*** प्रताप नारायण ***

Sunday, 5 May 2019

जग का यही विधान


प्रीत पराई क्यों कहलाये।
जग का यही विधान सताये।


मर्म नहीं समझे जो अपना
मदिर नयन में झूठा सपना
धुंध रही पलकों में छायी,
बोझ उठाए तन का गहना।
है अनंत संघर्ष यातना,
नेह महावर क्यों बहलाये।
जग का यही विधान सताये। 


संचित होता पाप पुण्य है
अकथ जहाँ प्रिय प्रीति शून्य है।
व्यथा रहेगी अंतिम क्षण तक,
अगन लगाता पुत्र धन्य है,
अर्थ जहाँ जीवन भरमाये।
जग का यही विधान सताये। 


बहु संजोये जीवन थाती,
यम नगरी तक एक न जाती।
संदेश यही चेतन मन को,
दीप नहीं जलती है बाती।
स्नेह तंतु में भीगा मन भी,
दीन नयन जल से नहलाये।
जग का यही विधान सताये।


*** डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी ***

Sunday, 28 April 2019

सुनो सखी री


लोभी हूँ मैं, सुनो सखी री, अजब लगा यह रोग है।
लोभ सजन के घर जाने का, बोलो! कब संयोग है।


लोभ नहीं है रंगमहल का, कुटिया में रह लूँगी मैं।
कनक करधनी बिना नौलखा, प्रीतम को गह लूँगी मैं।
प्रीत पगे साजन के बयना, मेरा छप्पन भोग है।
लोभी हूँ मैं सुनो सखी री, अजब लगा यह रोग है।


लोभ एक ही शेष बचा है, साजन के घर जाने का।
आलिंगन में लेकर उनको, सारी उमर रिझाने का।
बिन साजन के सच कहती हूँ, जीवन मेरा जोग है।
लोभी हूँ मैं सुनो सखी री, अजब लगा यह रोग है।


अपनी चूनर डाल सजन जी, जिस दिन घर ले जाएँगे।
अष्टसिद्ध,नवनिधि की थाती, हम खुद ही पा जाएँगे।
फिर न लोभ होगा कोई, पर साजन बिना वियोग है।
लोभी हूँ मैं सुनो सखी री, अजब लगा यह रोग है।


*** सुनीता पाण्डेय 'सुरभि' ***


Sunday, 21 April 2019

मान-मर्यादा पर बरवै छंद

 
गरिमा इसकी गुरुतर, कर गुणगान।
अब भी अपना भारत, देश महान॥1॥


अपने कर्म निभायें, दिन हो रात।
तोड़ें मत मर्यादा, तब है बात॥2॥


साथ-साथ करना है , हमें विकास।
करना होगा सबके, दिल में वास॥3॥


भारतवर्ष हमारा, है अभिमान।
रहे तिरंगा झंडा, इसकी शान॥4॥


पर्वत इसके प्रहरी, नदियाँ शान।
सागर चरण पखारें, गायें गान॥5॥


शस्य-श्यामला धरती, है कृषि कर्म।
पर्यावरण बचायें, सबका धर्म ॥6॥


मर्यादा पुरुषोत्तम, थे श्री राम।
हम भी कर्म करें वह, हो कुछ नाम॥7॥


🌸
*** कुन्तल श्रीवास्तव ***

Sunday, 14 April 2019

उम्र की चाल



सभी की इस उमर की जब जहाँ भी शाम ढलती है
अधूरी चाह रह रह के सदा मन में मचलती है


न बचती शेष तन ताकत नहीं मन दम अजी बचता
नज़र से देख के ही फिर अजी इच्छा बहलती है


ढले जब आयु का सूरज न मिलती जोश की गर्मी
कभी नज़रें बहकती हैं कभी रसना बहकती है

 
उमर भी चीज़ क्या यारो बढ़ाने की ललक सब में
मगर घटती सदा ये तो कभी यारो न बढ़ती है


नहीं पूछो कभी भी तुम कि बाला क्या उमर तेरी
करे जम के खिंचाई वो अजी खुल कर भड़कती है


युवा जमकर बिदकते हैं दिखे कोई अगर बूढ़ा
नहीं हों वे कभी बूढ़े युवा मन सोच पलती है


गिरे सब दाँत पर चाहत चने को है चबाने की
इसे पा लें उसे छू लें उमर हर बार छलती है


*** अवधूत कुमार राठौर ***

Sunday, 7 April 2019

राम की धरती



आकर घर में खुशियाँ कैसे, मेरी रिश्तेदार बने।
कैसे खेलूँ खेल-खिलौने, कैसे घर त्योहार मने।।

इन आँखों में आकर सपने, इच्छाओं को छलते हैं।
पीड़ा के पैगम्बर सारे, इन नयनों में पलते हैं।।
काश कभी हम दीनों का भी, कोई पालनहार जने।
कैसे खेलूँ खेल-खिलौने, कैसे घर त्योहार मने।।


भूखे उठना, भूखे सोना, पड़ा दुखों का डेरा है।
अक्सर ही कुनबे में मेरे, करे भूख पग फेरा है।।
कैसे जिएँ बताओ कोई, पास नहीं जब यार चने।
कैसे खेलूँ खेल-खिलौने, कैसे घर त्योहार मने।। 


यही राम की है धरती क्या, यही कर्ण की थाती है।
यहीं प्रज्वलित रही भला क्या, दया-धर्म की बाती है।।
यहीं मिले क्या कृष्ण-सुदामा, उत्तर के व्यवहार घने।
कैसे खेलूँ खेल-खिलौने, कैसे घर त्योहार मने।। 


*** अनुपम आलोक ***

Sunday, 31 March 2019

बरवै छंद

 
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, बिन सब व्यर्थ।
मानव जीवन का हो, बस यह अर्थ॥


स्वर्ण मन लुभाये ज्यों, कलित कुरंग।
धन के पीछे भागे, तीव्र तुरंग॥


धन पाकर मन में यदि, उपजा लोभ।
अपनों का मन दुःखा, उर हो क्षोभ॥


धन संग्रह से बनना, नहीं अमीर।
उदार हृदय व्यक्ति ही, रहा प्रवीर॥


दुनिया के विकास का, एक सु-मंत्र।
सुस्थिर रहे सर्वदा, सु-अर्थतंत्र॥


नेता जी बाँट रहे, कई करोड़।
गर्दन हम सबकी कल, न दें मरोड़॥


देश बने सुदृढ़-सुखी, करे विकास।
'कुंतल' तन-मन-धन से, सबकी आस॥


🌸
*** कुन्तल श्रीवास्तव ***

Sunday, 24 March 2019

रस-रंग फाग गाए




बंसी मधुर बजाए, रस-रंग फाग गाए।
गोपी सनी विरह में, है श्याम-रस लगाए।। 


दृग-कोठरी घनेरी, शुचि झील का किनारा।
चितवन रसीली मंजु, रस पुंज का फुहारा।
उज्जवल मराल तन-मन, चित-चोर चत्त छाए।
गोपी सनी विरह में, है श्याम-रस लगाए।। 


कोरी रही चुनरिया, बस श्याम रंग हो ली।
है इन्द्र-धनुष हारा,शुभ पर्व आज होली।
अब रंग नहीं कोई, जो स्वयं सिद्धि पाए।
गोपी सनी विरह में, है श्याम-रस लगाए।।


है भोर रश्मि स्वर्णिम, सौरभ सनें भँवर-दल।
प्रति पुष्प नेह रंजित, प्रति पात तुहिन हल-चल।
मन तो रंगा अभी है, चूनर न भीग जाए।
गोपी सनी विरह में, है श्याम-रस लगाए।। 


*** सुधा अहलूवालिया ***

Sunday, 17 March 2019

आया नया चुनाव


 
हर चौखट तक सरक सरक कर, आया नया चुनाव।

ऊँचा सेमल दिखा रहा है, ताव नया नव ढंग।
फिर पलाश के पोर पोर पर, चढ़ा भांग का रंग।
गाफ़िल भवरों की उड़ान में, है थोड़ा भटकाव।
हर चौखट तक ..... (1)


बंदर बकरी भेड़ हिरण सब, ढूँढ रहे हैं घास।
कुत्ते बिल्ली बाज लोमड़ी, की भी जागी आस।
बाघ शेर भी गर्जन करके, बना रहे अलगाव।।
हर चौखट तक....... (2)


महा समर में आशिक सारे, ठोक रहे हैं ताल।
अपनी शेखी हाँक रहे सब, पहन कवच ले ढाल।
वोट पर्व का जनमन पर अब, बढ़ने लगा तनाव।।
हर चौखट तक....... (3)


बूढ़ा बुधिया परख चुका है, सबके पाँव निशान।
भूसे के इस बड़े ढेर में, नहीं मिली मुस्कान।
झूठे वादों ने जीवन को, दिए घाव पर घाव।।
हर चौखट तक...... (4)


*** भीमराव झरबड़े "जीवन" बैतूल ***

जीवन है संगीत - एक गीत

  शाश्वत गुंजित प्रणवाक्षर का, सतत् चल रहा गीत। उतर मौन में सुनो ध्यान से, जीवन है संगीत। चले समीरण सर-सर सर-सर, गाती है निर्भ्रांत। जल सरित...