Friday, 15 June 2012

एक कविता - दुविधा













धरती, आकाश, बादल, वर्षा ...
सर्दी, गर्मी, पवन, पर्वत ...
सब के सब प्रकृति के काल-चक्र,
शनैः-शनैः हो परिवर्तित सर्व-चक्र,
सर्वथा अकाट्य !
मानव तू व्यर्थ ही काल गँवाता है,
अर्द्धांश यूँ ही चिंतन में बिताता है,
बदलता नहीं हैं नियम-क्रम,
मिटती नहीं है नियति कभी,
है तुच्छ प्राणी उसी (ब्रह्म) का अंग,
कृति उसी की, जागृति उसी की,
फिर भी तू क्यों?
यूँ ही व्यर्थ काल गँवाता है,
जड़-चेतन का भेद बताता है,
जड़ वही है (ब्रह्म),
चेतन है संकल्पना उसकी,
जड़-चेतन तो उसकी है सृष्टि,
जड़-चेतन ही तो है जग-दृष्टि,
जग-दृष्टि को तुम दूर करो,
सत्-सृष्टि का तुम बोध करो,
व्यर्थ काल तुम न नष्ट करो,
सबकुछ तुम अब व्यक्त करो,
जीवन का अनुसंधान करो,
मानव तुम दुविधा दूर करो।

विश्वजीत 'सपन'

प्रेम होना चाहिए

धन नहीं धरती नहीं मुझको न सोना चाहिए हर हृदय में सिर्फ सच्चा प्रेम होना चाहिए स्वार्थ का है काम क्या इस प्रेम के संसार में...