Tuesday, 26 April 2016

पानी



यूँ तो ज्ञात सभी को है ये प्यास को हरता है पानी
बरबादी लाता है पर जिस रोज़ बिफरता है पानी


रखना नीची दृष्टि हमेशा यदि हो आज बुलन्दी पर
दीवारें ढह जाती हैं जब नींव में भरता है पानी


अब तक मैंने पीड़ाओं के दृश्य अनेकों देखे पर
दर्द कहूँ क्या अपने की जब आँख का मरता है पानी


सुनते आए हैं लोगों को पागल तक कर देता है
बनकर आँखों में जब ग़म का बोझ ठहरता है पानी


झील में कंकर फेंको तो जो लहरें जैसी बनती हैं
चोट को खाकर सीने पर दरअस्ल सिहरता है पानी


बात सहजता से करता हो उसको बुज़दिल मत समझो
कोई मुझको बतलाए कब आग से डरता है पानी


माना अपने जब्त पे मुझको नाज़ बहुत है पर 'अनमोल'
सब्र का दामन छूटा है जब सर से गुज़रता है पानी


••••••••••••••••••••••• Anmol Shukl Anmol

Monday, 25 April 2016

नज़र




ले इश्क़ की फ़रियाद को थी फिर रही गुम सी नज़र
इक बार तुमपे जो टिकी तो फिर कहाँ बहकी नज़र


अपने लिबासों में सदा दिखती रही बेपर्दगी
फिर पैरहन सी रूह पर हमने तेरी पहनी नज़र


डर से बरी ही कर दिया मैंने उसे इलज़ाम से
जाने न क्या स्वीकार ले यूँ सामने झुकती नज़र


इस कोख के जाये कभी तो लौट घर-आँगन मिलें
रस्ता तके दहलीज पर खोयी हुई बूढ़ी नज़र


हर रात थोड़ी कालिमा सपनों के गालों पर रची
जाये न लग दुर्योग से उनको कहीं मेरी नज़र


वो चाँद दिखता फिर क्षितिज पर ख़ूब मुस्काता हुआ
उस चाँद में सूरत तेरी दिलदार को आती नज़र


***** मदन प्रकाश

Sunday, 10 April 2016

ये जहाँ देखिए



कितना वीरान है गुलसिताँ देखिए
रेत का ढेर है सब मकाँ देखिए


तपती आगोश में गेरुआ है समाँ 
कैसी सूरज की ये दास्ताँ देखिए

हाय, बूंदों के लाले पड़े हर तरफ
ये समंदर भी प्यासा यहाँ देखिए


ये ज़मीं जल रही, आसमाँ जल रहा
आज जलता हुआ ये जहाँ देखिए


कट रहा है शजर, पंछी ये पूछते
अब बनाए कहाँ आशियाँ देखिए
 

 ***** आराधना

Sunday, 3 April 2016

एक गीत - पचपन और बचपन




अश्रु-संग में मुस्काना वो, याद करे दिल बार बार
पचपन बचपन करते बातें, मुस्काए मिल बार बार


कभी व्यथित जब पचपन होता
बस बचपन में खो जाता है
कागज की फिर नाव सम्हाले
सावन-भादों हो जाता है
नेह मेह में घुलती पीड़ा, दिल जाता खिल बार बार
पचपन बचपन करते बातें, मुस्काए दिल बार बार 


बहुत शौक था उडूँ गगन में
मैं भी एक पखेरू बन कर
पंख जवाँ ले अम्बर नापा
लाया चाँद सितारे चुनकर
माँग सजायी मैंने उसकी, पिया गले मिल बार बार
पचपन बचपन करते बातें, मुस्काए दिल बार बार


बाद दोपहर शाम आ गयी
पोर-पोर में पीर लिए जब
समझा बचपन सपन सलोना
प्राणों ने परवाज़ भरे जब
जो बोया वो काट रहा हूँ, दिल पर रख सिल बार बार
पचपन बचपन करते बातें, मुस्काए दिल बार बार 


***** गोप कुमार मिश्र

बचपन

जो किसी भी लालसा से मुक्त होगा सच कहें तो बस वही उन्मुक्त होगा हो नहीं ईर्ष्या न मन में द्वेष कोई हो न अभिलाषा-जनित आवेश कोई कुछ ...