Sunday, 15 July 2018

चोट/जख्म/आघात पर दोहे



पर अवगुण देखे सदा, दिखी न खुद में खोट।
अक्सर करते हैं यहाँ, अपने दिल पर चोट।।


जिसको निज नेता चुना, देकर अपना वोट।
सरेआम वह दे रहा, मुझे चोट पर चोट।।


दूषित हुए समाज पर, ले भावों की ओट।
कविगण देते हैं सदा, निज चिंतन की चोट।।


शब्दों के आघात से, उजड़े उर का गाँव।
शब्दों की रसवंतिका, सदा छुआती पाँव।।


कभी न अनुपम कीजिए, दीन हृदय आघात।
दीनों की उर आह से, पुण्य क्षार हुइ जात।।

 
*** अनुपम आलोक ***

Sunday, 8 July 2018

अदब/आदर/सम्मान



दिलों ने दिलों को जो दावत लिखी है।
न समझो कि झूठी इबारत लिखी है।


हमारे बुजुर्गों ने बड़े ही अदब से,
बिना ऐब रहना, नसीहत लिखी है।


अलग घर बसाया मेरे भाईयों ने,
पिताजी ने जबसे वसीयत लिखी है।


सभी को अता की, रंगोआब, सुहरत,
मेरे हिस्से में क्यों फ़जीहत लिखी है।


कुरेदे गये उस ख़लिस के लहू से,
कहानी तुम्हारी बदौलत लिखी है। 


झड़े पात जबसे नहीं छाँव देता,
"शजर" की यही तो हक़ीक़त लिखी है।


*** शजर शिवपुरी ***

Sunday, 1 July 2018

जब जागो तभी सवेरा

 

छट जाये तमस घनेरा।
जब जागो तभी सवेरा।।


आदिम युग से आज तलक कुछ, अग्रज चलते आये।
हमने तो बस पद चिन्हों पर, उनके कदम बढ़ाये।।
जान न पाये झूठ सत्य का, कहाँ कौनसा डेरा।
छट जाये तमस........ (1)


सबने अपने अपने हित के, निज बाजार सजाये।
औरों को भरमाया कुछ ने, साझे सत्य कराये।।
कोई था उपकारी केवल, कोई बना लुटेरा।
छट जाये तमस....... (2)


आओ यारों बने हंस हम, सच पय पान करेंगे।
निज स्वारथ सी त्याग बुराई, जन कल्याण करेंगे।
आओ खोलें ज्ञान चक्षु हम, जिन्हें तमस ने घेरा।।
छट जाये तमस..... (3)


*** भीमराव झरबड़े "जीवन" बैतूल ***

Sunday, 24 June 2018

करें नित्य हम योग (गीत)


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योग पुरातन आज जगत में, बना देश की शान।
विश्व मनाता योग दिवस अब, ये भारत का मान।।


तन बलशाली बने योग से, स्वस्थ बनें मन प्राण,
नियमित योगासन से हमको, मिले कष्ट से त्राण,
योग साधना अपनाकर के, करें नित्य हम योग,
ऋषियों ने ही योग क्रिया के, निर्मित किये विधान।


दूर करें हम नेति-क्रिया से, तन के सभी विकार,
आराधना ध्यान आसन से, होते शुद्ध विचार,
स्वस्थ रहें अपना ये जीवन, रहें न कोई रोग,
यही योग विद्या भारत की, माने विश्व सुजान।


विद्या है ये योग-साधना, एक सफल विज्ञान,
हुए योग ऋषि पातञ्जलि जो, सिखा गये ये ज्ञान,
विश्व पटल पर आज सभी ने, किया योग स्वीकार,
वैद्य चिकित्सक सारे इससे, करते रोग निदान।


*** लक्ष्मण रामानुज लड़ीवाला ***

Sunday, 17 June 2018

कुण्डलिया - बरखा

 
आयी रिमझिम बूँद है, लिये मधुर सौगात।
नयनों के तट चूमती, कभी चूमती गात॥
कभी चूमती गात, तृषित मन प्यास बुझाती।
यादों के पट खोल, प्रीत के गीत सुनाती॥
पुष्प देख एकांत, नैन के नीर छुपायी
 
पकड़ नीम की डाल, देखती बरखा आयी

कैसे दिखलाऊँ तुम्हें, इन नैनों की पीर।
कैसे दिल रोता प्रिये, हरपल यहाँ अधीर॥
हरपल यहाँ अधीर, स्वप्न नैनों में तरसे ।
बिन बादल बरसात, आंगना मेरे बरसे॥
प्यासा मन है "पुष्प ", मिलन हो जैसे तैसे।
तुम बिन ऐ मनमीत, जिन्दगी बीते कैसे॥


मस्ती की बरसात में, आओ भीगें मित्र।
कभी चलायें नाव हम, कभी बनायें चित्र
 
कभी बनायें चित्र, टपकता घर में पानी
कभी दिखायें दृश्य, कहाँ रहती है नानी
कैसे खेत, मचान, पुष्प की कैसी बस्ती।
कैसे बच्चे रोज, करें शाला मे मस्ती

 
*** पुष्प लता शर्मा ***

Sunday, 10 June 2018

सार छंद


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1.

मुरलीधर कान्हा वनवारी, चक्र सुदर्शन धारी।
माखनचोर नंद के लाला, गोवर्धन गिरधारी।।
नटवर नागर श्याम साँवरे, बलदाऊ के भैया।
मोहन माधव कृष्ण मुरारी, नटखट कृष्ण कन्हैया।।
2.
खेल-खेल में काली दह में, नाग कालिया नाथा।
जिसके नटखट बाल चरित की, अनुपम अद्भुत गाथा।।
राधा के सँग यमुना तट पर, जिसने रास रचाए।
द्रौपदि की जो लाज बचाने, दौड़े-दौड़े आए।।
3.
एक बार फिर से आ जाओ, केशव कुंज बिहारी।
पापाचार बड़े धरती पर, संकट में है नारी।।
राजनीति है छल-प्रपंच की, दुर्योधन है जिंदा।
सभी सभासद मौन हो गए, भीष्म विदुर शर्मिंदा।।
4.
कर्मयोग जग को सिखलाया, कहकर भगवद्गीता।
लेकिन अब निष्काम कर्म का, जैसे युग हो बीता।।
राजनीति का पाठ सभी को, फिर से आज पढ़ा दो।
द्रौपदियों की लाज बचाने, फिर से चीर बढ़ा दो।।
5.
जरासंघ शिशुपाल शकुनि सब, पुनः हुए बलशाली।
बाग उजाड़ रहा है केशव, स्वयं आज वनमाली।।
चक्र सुदर्शन लेकर आओ, हे गिरधर गोपाला।
तान मुरलिया की फिर छेड़ो, राह तके ब्रजबाला।।


***हरिओम श्रीवास्तव***

Sunday, 3 June 2018

कभी-कभी


कभी-कभी सड़क पर चलते चलते
बाज़ार, रेल,बस, सफ़र में
आ जाती है आँधी, रफ़्तार कम
दुबक कर खड़े हो जाते हैं हम
गुज़र जाने देते हैं ऊपर से
झाड़ कर कपड़े/चश्मा/बाल
बढ़ जाते हैं आगे


कभी-कभी कोई घटना/दृश्य/ख़बर
ला देता है आँधी/तूफ़ान/भूचाल
बढ़ती धड़कन/उलझन/उखड़ती साँसें 

अपने घर में भी नहीं मिलता कोई कोना
जहाँ गुज़र जाने दें ऊपर से 


याद कीजिए तूफ़ान से पहले की शांति
जिसके गर्भ में होती मौन/हलचल
नकारते हैं अहंकार/स्वार्थ/लापरवाही में
इसीलिए नहीं झाड़ पाते पगड़ी की धूल
किंतु चश्मे की धूल में भी
नज़र से नज़रिया साफ हो जाता है
पश्चाताप काम नहीं आता है
कभी कभी क्या,

प्रायः ऐसा ही होता है?

*** नसीर अहमद *** 
उन्नाव

चोट/जख्म/आघात पर दोहे

पर अवगुण देखे सदा , दिखी न खुद में खोट। अक्सर करते हैं यहाँ , अपने दिल पर चोट।। जिसको निज नेता चुना , देकर अपना वोट। सरेआम वह द...