Sunday, 17 June 2018

कुण्डलिया - बरखा

 
आयी रिमझिम बूँद है, लिये मधुर सौगात।
नयनों के तट चूमती, कभी चूमती गात॥
कभी चूमती गात, तृषित मन प्यास बुझाती।
यादों के पट खोल, प्रीत के गीत सुनाती॥
पुष्प देख एकांत, नैन के नीर छुपायी
 
पकड़ नीम की डाल, देखती बरखा आयी

कैसे दिखलाऊँ तुम्हें, इन नैनों की पीर।
कैसे दिल रोता प्रिये, हरपल यहाँ अधीर॥
हरपल यहाँ अधीर, स्वप्न नैनों में तरसे ।
बिन बादल बरसात, आंगना मेरे बरसे॥
प्यासा मन है "पुष्प ", मिलन हो जैसे तैसे।
तुम बिन ऐ मनमीत, जिन्दगी बीते कैसे॥


मस्ती की बरसात में, आओ भीगें मित्र।
कभी चलायें नाव हम, कभी बनायें चित्र
 
कभी बनायें चित्र, टपकता घर में पानी
कभी दिखायें दृश्य, कहाँ रहती है नानी
कैसे खेत, मचान, पुष्प की कैसी बस्ती।
कैसे बच्चे रोज, करें शाला मे मस्ती

 
*** पुष्प लता शर्मा ***

Sunday, 10 June 2018

सार छंद


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1.

मुरलीधर कान्हा वनवारी, चक्र सुदर्शन धारी।
माखनचोर नंद के लाला, गोवर्धन गिरधारी।।
नटवर नागर श्याम साँवरे, बलदाऊ के भैया।
मोहन माधव कृष्ण मुरारी, नटखट कृष्ण कन्हैया।।
2.
खेल-खेल में काली दह में, नाग कालिया नाथा।
जिसके नटखट बाल चरित की, अनुपम अद्भुत गाथा।।
राधा के सँग यमुना तट पर, जिसने रास रचाए।
द्रौपदि की जो लाज बचाने, दौड़े-दौड़े आए।।
3.
एक बार फिर से आ जाओ, केशव कुंज बिहारी।
पापाचार बड़े धरती पर, संकट में है नारी।।
राजनीति है छल-प्रपंच की, दुर्योधन है जिंदा।
सभी सभासद मौन हो गए, भीष्म विदुर शर्मिंदा।।
4.
कर्मयोग जग को सिखलाया, कहकर भगवद्गीता।
लेकिन अब निष्काम कर्म का, जैसे युग हो बीता।।
राजनीति का पाठ सभी को, फिर से आज पढ़ा दो।
द्रौपदियों की लाज बचाने, फिर से चीर बढ़ा दो।।
5.
जरासंघ शिशुपाल शकुनि सब, पुनः हुए बलशाली।
बाग उजाड़ रहा है केशव, स्वयं आज वनमाली।।
चक्र सुदर्शन लेकर आओ, हे गिरधर गोपाला।
तान मुरलिया की फिर छेड़ो, राह तके ब्रजबाला।।


***हरिओम श्रीवास्तव***

Sunday, 3 June 2018

कभी-कभी


कभी-कभी सड़क पर चलते चलते
बाज़ार, रेल,बस, सफ़र में
आ जाती है आँधी, रफ़्तार कम
दुबक कर खड़े हो जाते हैं हम
गुज़र जाने देते हैं ऊपर से
झाड़ कर कपड़े/चश्मा/बाल
बढ़ जाते हैं आगे


कभी-कभी कोई घटना/दृश्य/ख़बर
ला देता है आँधी/तूफ़ान/भूचाल
बढ़ती धड़कन/उलझन/उखड़ती साँसें 

अपने घर में भी नहीं मिलता कोई कोना
जहाँ गुज़र जाने दें ऊपर से 


याद कीजिए तूफ़ान से पहले की शांति
जिसके गर्भ में होती मौन/हलचल
नकारते हैं अहंकार/स्वार्थ/लापरवाही में
इसीलिए नहीं झाड़ पाते पगड़ी की धूल
किंतु चश्मे की धूल में भी
नज़र से नज़रिया साफ हो जाता है
पश्चाताप काम नहीं आता है
कभी कभी क्या,

प्रायः ऐसा ही होता है?

*** नसीर अहमद *** 
उन्नाव

Sunday, 27 May 2018

सुमेरु छंद

 
1.🌷
 
अचानक आज प्रभु, आये बन अतिथि।
युगों के बाद है, अब आज शुभतिथि ॥
नहीं कुछ है समझ, स्वागत करूँ क्या।
झरें झरझर नयन, झोली भरूँ क्या॥ 


2.🌷
 
करो तुम आज प्रभु, स्वीकार अर्पण।
सभी कुछ आज मैं, करती समर्पण॥
अचानक निरख छवि, पुलकित सकल तन।
मिले सहसा हुआ, हर्षित मगन मन॥


*** कुन्तल श्रीवास्तव ***

Sunday, 20 May 2018

क्रोध/कोप पर दोहे


मानव मन के गाँव में, व्यथा बड़ी है एक
चिरंजीव हो क्रोध ने, खंडित किया विवेक
।।

क्रोधाग्नि जब-जब जली, अंहकार के गाँव
निर्वासित तब-तब हुए, सद्भावों के पाँव
।।

देश-धर्म की आन हित, करना वाजिब क्रोध
जयचंदों को हो सके, राष्ट्रप्रेम का बोध
।।
 
जग में पाया क्रोध ने, सदा सतत् अपमान
रावण सा विद्वान भी, रह न सका गतिमान
।।

काम,क्रोध,मद,मोह का, जीवन है दिन चार
अमर जगत में है सदा, नेह सृजित व्यवहार
।।
 
*** (अनुपम आलोक)***

Sunday, 13 May 2018

जिन खोजा तिन पाइया


सार छंद -
-----------

1-


इच्छा होने से क्या होना, इच्छाशक्ति जरूरी।
उद्यम के बिन कभी न होती, कोई इच्छा पूरी।।
प्राप्त हुआ उसको ही जिसने, गहरे पानी खोजा।
भाग्य भरोसे क्या मिलना है, व्रत रख लो या रोजा।।


2-


कर्म विमुख जो चादर ताने,निशदिन ही सोता है।
मानव जीवन वही व्यर्थ में, अपना ही खोता है।।
वही खोजकर मोती लाया, जिसने गोता मारा।
कठिन परिश्रम नेक इरादा, प्रभु को भी है प्यारा।।


3-


कर्म प्रधान सभी ने माना, कहती भगवद्गीता।
युद्ध किया था रघुनंदन ने, तब ला पाए सीता।।
अनुसंधान किया जिसने भी, वही नया कर पाया।
सोते सिंहों के मुख में क्या, स्वयं कभी मृग आया।।


4-


दैव-दैव आलसी पुकारे, बैठे भाग्य भरोसे।
असफलता मिलने पर रोए, और भाग्य को कोसे।।
जिसने रखा हौसला मन में, सदा कर्म को पूजा।
उसके जैसा अखिल विश्व में, कोई और न दूजा।।


***हरिओम श्रीवास्तव***

Sunday, 6 May 2018

श्रम


 
श्रम एक साधना है,
जीवट की पहचान है,
आलस्य का दुश्मन और
सतत स्फूर्ति की जान है,
हारे का दृढ़ हौसला है तो
जीत के ठहराव का राज है,
फिर फिर विजय पाने की
सशक्त हिम्मत है श्रम,
धीरज का मित्र है,
महका दे जीवन
ऐसा इत्र है,
स्वाभिमान का सबक है,
ईमान है, पाक है इबादत है,
श्रम जीत की ताक़त है,
फिर भी जाने क्यों
खेलते इसके संग
आँख मिचौनी,
और न दे पाते
उनको वो मान
श्रम जिनका जीवन है!


*** डॉ. अनिता जैन "विपुला" ***

कुण्डलिया - बरखा

  आयी रिमझिम बूँद है, लिये मधुर सौगात। नयनों के तट चूमती, कभी चूमती गात॥ कभी चूमती गात, तृषित मन प्यास बुझाती। यादों के पट खोल, प्री...