Sunday, 18 February 2018

मिलन के पथ

 
मिलन के पथ सब कटीले हो गए हैं।
प्रेम के पग अब नुकीले हो गए हैं।


क्यों जले अंतस खड़ी प्रतिवेदना,
क्यों समर्पण को छले संवेदना,
स्वार्थी क्यों हो गए अनुरोध मेरे,
क्यों घृणित तन के कबीले हो गए हैं,
मिलन के पथ सब कटीले हो गए हैं।


प्रणय की बदली सभी हैं वर्तनी,
वासना की बढ़ गयी गति मंथनी,
हो गये वीभत्स प्रेमाभिव्यक्ति के पथ,
कपट के कद..तन..गठीले हो गए हैं,
मिलन के पथ सब कटीले हो गए हैं।


खो गई मोहन की मुरली बाबरी,
राधिका भी स्वार्थ वश है साँवरी,
प्रेम के सब राग मीरा ने भुलाए,
और छल सजकर छबीले हो गए हैं,
मिलन के पथ सब कटीले हो गए हैं।
 

***** अनुपम आलोक

Tuesday, 13 February 2018

आया मनभावन बसंत

 


नव पल्लव के मृदु झूले पर,
देखो बैठी इतराकर,
प्रकृति सुंदरी झूम रही है,
आहट साजन का पाकर,
पुष्पों का परिधान सुशोभित, सौरभ फैला दिग्दिगंत,
इंद्रधनुष बोता धरती पर, आया मनभावन बसंत


कोयल मंगल गान सुनाती,
मधुरिम स्वर-लहरी फूटे,
मधु पराग चहुँदिश सुमनों पर,
नत हो मधुकर-दल लूटे,
दौड़ पड़े मादक सिहरन सी, छू लेता जब विहँस कंत,
पोर पोर उन्मादित करता, छाया मनभावन बसंत


आँचल में मोहक धरती के,
कितने रंग उभर आए,
नदिया बहती भर उमंग से,
पवन श्वास को महकाए,
मुस्काती है प्रकृति सुंदरी, बिखराती है सुख अनंत,
स्वर्ग धरा पर ज्यों उतार कर, लाया मनभावन बसंत


***** प्रताप नारायण

Sunday, 4 February 2018

चार दोहे - आज-कल


आभासी हैं आज कल, रोज नये अनुबंध।
भटकाये फिर मन मृगा, ये कस्तूरी गंध।।


आपा धापी शीर्ष पर, शील धैर्य अवसान।
करुण पुकारें आज कल, कौन सुने भगवान।।


एक अचम्भा आज कल, रोज नये अवतार।
तृष्णा में डूबे हुए, बनते तारण हार।।


गुरुकुल मुँह बाये खड़े, गुरुगण्डे बेकार।
खीसे में है आज कल, अतुल ज्ञान भंडार।।


आर. सी. शर्मा "गोपाल"

Sunday, 28 January 2018

त्रिभंगी छंद


 
= 1=


दिल धेले भर का, घाट न घर का, चादर सरका, मुँह खोले।
बरसों का मारा, टूटा तारा, फिर से हारा, क्या बोले।।
खुद ही बौराया, समझ न पाया, क्यों है जाया, प्रश्न करे।
चारों दिशि ताके, गलियाँ झांके, खाली पा के, धीर धरे।।


= 2 =

हैं घाट न घर के, बातों भर के, सुन सुन कर के, कान पके।
उलझन को गुनते, सहते-सुनते, रस्ते चुनते, प्राण थके।।
पिसकर पाटों में, सब घाटों में, बिक हाटों में, छले गए।
रिश्ते सब टूटे, रहबर छूटे, मीत अनूठे, चले गए।।


- मदन प्रकाश

Sunday, 21 January 2018

मत उदास हो


मत उदास हो थके मुसाफिर
कुछ श्रम बिंदु बिखर जाने से
यह पथ और निखर जायेगा।


रोक सकी कब पागल रजनी
आने वाली सलज उषा को
बाँध न पाई काली बदली
उगते रवि की विकल प्रभा को 


अपराजित निशीथ घट-घटकर
अभिनव पूनम को पायेगा।।


कब विकास के चरण रुके हैं
बीते युग की मनुहारों से
ठिठकी नहीं चेतना जन की
भावी भय की बौछारों से 


सम्भव है आने वाला कल
कोई ज्योति शिखर लायेगा।।


सहमी नहीं नवेली नदिया
कंकरीले पथ या खारों से
गति पाई है गिरते-उठते
ऊँचे पर्वत की धारों से 


बढ़ते जाना रे! अंकुर तू
हर दिन और निखर जायेगा।।


***** मधु प्रधान

Sunday, 14 January 2018

प्रीति के दोहे

 
पावन प्रेम प्रतीति है, सौख्य शान्ति आगार।
जो डूबा सो पार है, पार हुआ भव पार।।


श्रद्धा, संयम, त्याग को, सिखलाती है प्रीत।
प्रेमी गाते हैं जिसे, वह है गीतातीत।।


प्रेम न चाहे योग्यता, रंग, रूप, धन, रीत।
"चंचल" इसमें हारकर, मिले परस्पर जीत।।


नाम रटे रसना सदा, प्रिय छवि उर उत्कीर्ण।
पलको अब अविरल बहो, करो न मन संकीर्ण।।


तुम्हीं कामना भोग हो, तुम्हीं साध्य आराध्य।
हो न कभी अनुराग कम, पूजूँ तुम्हें अबाध्य।। 


***** चंचलेश शाक्य, एटा (उ.प्र.)

Sunday, 7 January 2018

सूरज घर पर आग तापता


सूरज घर पर आग तापता,
धुँधला धुँधला पड़े दिखाई।


हुआ तुषारा पात, पीत-सरसों मुरझाई।
ऊपर से ये मुई, शीत ऋतु की पुरवाई।।
जड़ चैतन्य हुए सब जड़वत,
साथ छोड़ भागी परछाई।

लौह पुरुष सी रेल, सिहरती पड़े दिखाई।
हाड़ माँस की देह, काँपती ओढ़ रजाई।।
थमती कहाँ समय की सुइयाँ,
आख़िर खाई कौन दवाई।

भूख खेलती खेल, मनुज को रेल बनाई।
छोड़े मुँह से वाष्प, पैर दो पहिए भाई।।
आधी आबादी की आशा,
धूप पूरती बाँट रजाई।

***** गोप कुमार मिश्र

मिलन के पथ

  मिलन के पथ सब कटीले हो गए हैं। प्रेम के पग अब नुकीले हो गए हैं। क्यों जले अंतस खड़ी प्रतिवेदना, क्यों समर्पण को छले संवेदना, स्वार...