Sunday, 22 October 2017

दीवाली के दोहे


जब लौटे वनवास से, लखन सहित सियराम।
दीपों से जगमग हुआ, नगर अयोध्या धाम।।1।।


जलते दीपों ने दिया, यह पावन संदेश।
ज्योतिपुञ्ज श्रीराम हैं, रावण तम के वेश।।2।।


देवी कल्याणी रमा, कृपा करें इस बार।
हर घर में हो रौशनी, भरे रहें भंडार।।3।।


जलता दीपक एक ही, तम को देता चीर।
बुझे दीप को जारकर, लिखे नयी तकदीर।।4।।


जले दीप से दीप तब, बदलेगा परिवेश।
ज्ञानदीप से कट सकें, जीवन के सब क्लेश।।5।।


***हरिओम श्रीवास्तव***

Sunday, 15 October 2017

दिल मेरे

 
सो जाता जब ये जग सारा,
घर, आँगन, पनघट, चौबारा

सुधियों में स्पंदित पल-पल,
दिल मेरे! तू ही होता है


खेता है तू सुख की नौका,
दुःख के पर्वत भी ढोता है,
भर जाता आकंठ कभी तो,
कभी बहुत खाली होता है,
भावों का अनुबंध तुझी से,
तू ही पाता और खोता है


 जब होता है संगम तेरा,
कितने मधुर पुष्प खिल जाते,
जीवन पथ के कदम-कदम पर,
मधु, पराग, सौरभ मिल जाते,
पर विछोह का दंश चुभे जब,
चुपके-चुपके तू रोता है


लघु आकार भले ही तेरा,
किन्तु वृहद आयाम बहुत है,
एक सृष्टि लक्षित है बाहर,
अंदर तेरे एक निहित है,
सारे क्रिया कलापों का ही,
संचालन तुझसे होता है


***** प्रताप नारायण

Sunday, 8 October 2017

पुष्प का मन


हुआ चमन से अलग नहीं है फिर कोई अपना घरबार
पड़ा सड़क पर फूल सोचता लिखा भाग्य कैसा करतार


कभी किसी बाला के सुन्दर कुंतल मध्य सुशोभित हो,
इठलाता अपने जीवन पर मन ही मन आनंदित हो,
सहलाती है जब सुंदरियाँ अपने होठ कपोलों पर,
धन्य धन्य हो जाता जीवन माला संग पिरोहित हो,
लेकिन दो पल में ही मानव, भरा हृदय दे फेंक उतार
 

पड़ा सड़क पर फूल ........

गुलदस्ते में सजता हूँ पर वह मुस्कान कहाँ खिलती,
डाली पर सजकर बगिया में मेरे होठों पर मिलती,
तितली की आहट भँवरों का गुंजन गान कहाँ पाऊँ,
कैसे सम्भव बंद घरों में खुली हवा की वह मस्ती,
माली ही जब दुश्मन अपना जीतेजी देता है मार

पड़ा सड़क पर फूल ........

कभी शहीदों के चरणों में जब जब भी चढ़ जाता हूँ,
संग कन्हैया राधा के जब  मैं भी रास रचाता हूँ,
तब लगता है पैदा होकर कुछ तो कर्म सुकर्म किया,
जीवन सफल मान कुछ अपना थोड़ी राहत पाता हूँ,
ईश चरण में जगह न मिलती पूरा जीवन था बेकार

पड़ा सड़क पर फूल ........

 
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' बीकानेरी

Sunday, 1 October 2017

छन्द -- मदिरा सवैया


(1)


मन्द हँसी मुख ऊपर मात सुदर्शन रूप लुभाइ रही।
अंक लिये प्रिय पुत्र गजानन वत्सलता रस-धार बही।
तेज प्रवाहित है मुख मंडल भक्त सभी जयकार कही।
कष्ट हरो तुम आकर मात दुखी सब हैं इस पूर्ण मही।


(2)


हे भवतारिणि विश्व विनोदिनि हास विलासिनि पुण्य प्रदे।
संकटहारिणि अम्बर गामिनि दैत्य विनाशिनि माँ सुख दे।
मोद प्रमोदिनि केसरि वाहिनि कीर्ति प्रसारित भी कर दे।
मंगलकारिणि ज्ञान प्रकाशिनि बुद्धि विवेक शुभा वर दे।
 

भारती जोशी, चमोली, उत्तराखंड।

Sunday, 24 September 2017

साथी तेरा प्यार - एक गीत


जीवन की अनमोल धरोहर, साथी तेरा प्यार।
मणिकांचन संयोग सुखद है, मान रहा संसार।

हर अनुभूति सुहानी अनुपम, अद्भुत नव अनुबंध।
जुड़े हृदय के तार बना तब, यह मधुरिम संबंध ।।
झंकृत कर दे मन वीणा को, तेरा रूप सिंगार ।
जीवन की अनमोल धरोहर...


सूखे नीरस मरुथल में तुम, सुरभित सुंदर फूल।
आँखों में लहराता रहता, तेरा नील दुकूल।
अल्कों की मतवाली खुशबू, करती सदा विभोर।
अधंकारयुत सघन निशा में, आई बनकर भोर।।
खंडित जीवन नौका की तुम, एक सुदृढ़ पतवार।
जीवन की अनमोल धरोहर...


क्षण भर विलग रहूँ यदि तुमसे, हो जाता बेचैन।
विरह पलों की सोच बात ही, भर भर आते नैन।
हरपल प्रभु से यही विनय है, कभी न हों हम दूर।
जीवन भर के साथी हैं हम, करें प्यार भरपूर ।।
प्राणप्रिये तुम बनकर आईं, जीवन का आधार।
जीवन की अनमोल धरोहर...


***** डाॅ. बिपिन पाण्डेय

Sunday, 17 September 2017

अरे ओ व्योम!


ओ, चतुर्दिक फैले हुए,
समस्त पर आच्छादित,

अनन्त तक अपनी बाँहें पसारे व्योम!


कितना विलक्षण चरित्र है तुम्हारा!
निराकार होकर भी दृश्य हो
बिना रंग के भी नीलाभ हो
पास भी हो और अति दूर भी


असंख्य ग्रहों, नक्षत्रों
और आकाशगंगाओं को
अपने अंक में समेटे हुए
तुम अनंत भी हो और शून्य भी

कितने रहस्यमयी हो तुम!
बाहर भी हो और अंदर भी
मन में भी पलते हो
स्वप्नों में भी ढ़लते हो


चिर अखंडित होकर भी
मनुष्यों पर टूट कर गिरते हो।

कितना प्रगाढ़ आकर्षण है तुम्हारा!
पल पल अपनी ओर खींचते हो
साहस के पंख देकर पास बुलाते हो।
ओ, निराकार, पारदर्शी, अखण्डित नभ!
कोई न जान सका
तुम्हारी ऊँचाई, तुम्हारा विस्तार, तुम्हारी विराटता।



***** प्रताप नारायण

Sunday, 10 September 2017

कह मुकरी


(1)


मेरे साथ-साथ वह जाए,
फिर सब पर ही रौब जमाए,
कर देता सबको ही ठंडा,
क्या सखि साजन? नहिं सखि “डंडा”।।


(2)


साथ-साथ वह आता-जाता,
लिपट चिपट कर प्यार जताता,
उसके संग फिरूँ मैं भागी,
क्या सखि साजन? नहिं सखि “डॉगी”।।


(3)


साथ-साथ वह मेरे जाए,
खुलकर अपने रँग बिखराए,
मगर मुझे वह दिल से भाता,
क्या सखि साजन? नहिं सखि “छाता”।।


(4)


उसके बिन पड़ता नहिं चैना,
लड़ते सदा उसी से नैना,
साथ-साथ थोड़ी इसमाइल,
क्या सखि साजन? नहिं “मोबाइल”।।


**हरिओम श्रीवास्तव**

दीवाली के दोहे

जब लौटे वनवास से, लखन सहित सियराम। दीपों से जगमग हुआ, नगर अयोध्या धाम।।1।। जलते दीपों ने दिया, यह पावन संदेश। ज्योतिपुञ्ज श्...