Sunday, 19 November 2017

बाल कविता


अपने प्यारे गुड्डों के संग
छोटी-सी गुड़िया बन जाऊँ


छुप्पा-छुप्पी खेलूँ, भागूँ
छुपकर देखूँ फिर छुप जाऊँ


बालू को थप-थपकर, रचकर
छोटा सा घर एक बनाऊँ


मेरी अपनी छुक-छुक गाड़ी
बस उसमें ही मैं रम जाऊँ


कितने अच्छे लोग यहाँ पर
सबको कुछ खुशियाँ दे पाऊँ


शानू, डूडू, सोना, पुटलू
सब पर अपना रौब जमाऊँ


सपनों की दुनिया में जाकर
परियों को भी खूब रिझाऊँ


छप-छप पानी में मैं खेलूँ
कागज़ की इक नाव बनाऊँ


चाँद-सितारों को तक-तक कर
गुड्डों के संग अब सो जाऊँ


  ***** आराधना

Sunday, 12 November 2017

अंतस भवन तुम्हें लिख दूँगा




तुम जो प्रणय गीत बन जाओ
सारा सृजन तुम्हें लिख दूँगा
आकर मिलना प्रेम नगर में
अंतस भवन तुम्हें लिख दूँगा

हम चातक प्यासे सावन के
औ तुम मेघों की शहजादी
तुमने कर घन घोर गर्जना
मधुवन में ज्वाला सुलगा दी
इस प्यासे उजड़े उपवन में
ऋतु वहार बन कर बरसो तो
सच कहता हूंँ इस मौसम में
पावस मिलन तुम्हें लिख दूँगा
 

सोलह सावन कैसे बीते
तुम अपने अनुभव लिख देना
जो बसंत मैंने देखे हैं 

उन सब गीतों को पढ़ लेना
फिर होठों पर बोल सजा कर
साथ अगर मेरे गाओ तो
अरमानों की फुलबगिया के
सारे सुमन तुम्हें लिख दूँगा
 

ख़ुशबू बनकर बिखर जाओ तो
बाग बाग गुलशन हो जाये
फिर सोलह शृंगार सजाना
गद गद अंतर मन हो जाए
आओ बैठें एक डाल पर
स्वप्न अगर साकार हुए तो
मधुर महकती अमुराई की
पुरवइ पवन तुम्हें लिख दूँगा
 

हम अनुरोध किए फिरते हैं 
तुम कुहू कुहू कू का करती
में प्यासा हूँ जनम जनम से
तुम कहाँ कहाँ ढूंँढा करती
महामिलन को मुखरित करना
ही तकदीर हमारी है तो
सागर एक बार स्वीकारो
सातो वचन तुम्हें लिख दूँगा


*** राधा बल्लभ पाण्डेय सागर

Sunday, 5 November 2017

सपना रहा अधूरा


लड़ता रहा युद्ध जीवन का,
सपना रहा अधूरा मन का।

सुख धन दौलत खूब बटोरा,
याद भूलकर अपने तन का,
ढली उम्र तब दुख के बादल,
भूल गया अभिमान बदन का।

घात करें विश्वास बनाकर,
मुख से मीठा काले मन का,
हुआ तभी बदनाम विभीषण,
जैसे भेद खुला रावण का।

संतो की शक्लो में बैठा,
ढोंगी दुश्मन आज चमन का,
जाल बिछाता कदम कदम पर,
करता है लालच नित धन का।

मातृभूमि की सेवा में नित,
निरत पुष्प है इस उपवन का,
अटल अखंडित भारत वासी,
अडिग हमेशा अपने प्रण का।

हम अपनी सीमा के रक्षक,
हमें नहीं डर है जीवन का,
चाहे जो आतंक पसारों,
नहीं बुझेगा दीप अमन का।

भीमराव झरबडे "जीवन" बैतूल

Sunday, 29 October 2017

सार छन्द

 
गहन तिमिर हर ओर व्याप्त था, घटा घिरी अनचाही।
आसमान में घोर अँधेरा, भटक गया था राही।।
निबिड़ निशा के अंधकार से, उसका मन घबड़ाया।
तभी चमकते खद्योतों ने, उसको मार्ग दिखाया।।


ऐसा ही मानव जीवन में, नित होता रहता है।
ज्ञान ज्योति अज्ञान तिमिर में, मन उलझा रहता है।।
विषयों में बँध अज्ञानी मन, अंधकार में भटके।
ज्ञान प्रकाशित हो जाये तब, मन उजियारा चमके।।


कुन्तल श्रीवास्तव

Sunday, 22 October 2017

दीवाली के दोहे


जब लौटे वनवास से, लखन सहित सियराम।
दीपों से जगमग हुआ, नगर अयोध्या धाम।।1।।


जलते दीपों ने दिया, यह पावन संदेश।
ज्योतिपुञ्ज श्रीराम हैं, रावण तम के वेश।।2।।


देवी कल्याणी रमा, कृपा करें इस बार।
हर घर में हो रौशनी, भरे रहें भंडार।।3।।


जलता दीपक एक ही, तम को देता चीर।
बुझे दीप को जारकर, लिखे नयी तकदीर।।4।।


जले दीप से दीप तब, बदलेगा परिवेश।
ज्ञानदीप से कट सकें, जीवन के सब क्लेश।।5।।


***हरिओम श्रीवास्तव***

Sunday, 15 October 2017

दिल मेरे

 
सो जाता जब ये जग सारा,
घर, आँगन, पनघट, चौबारा

सुधियों में स्पंदित पल-पल,
दिल मेरे! तू ही होता है


खेता है तू सुख की नौका,
दुःख के पर्वत भी ढोता है,
भर जाता आकंठ कभी तो,
कभी बहुत खाली होता है,
भावों का अनुबंध तुझी से,
तू ही पाता और खोता है


 जब होता है संगम तेरा,
कितने मधुर पुष्प खिल जाते,
जीवन पथ के कदम-कदम पर,
मधु, पराग, सौरभ मिल जाते,
पर विछोह का दंश चुभे जब,
चुपके-चुपके तू रोता है


लघु आकार भले ही तेरा,
किन्तु वृहद आयाम बहुत है,
एक सृष्टि लक्षित है बाहर,
अंदर तेरे एक निहित है,
सारे क्रिया कलापों का ही,
संचालन तुझसे होता है


***** प्रताप नारायण

Sunday, 8 October 2017

पुष्प का मन


हुआ चमन से अलग नहीं है फिर कोई अपना घरबार
पड़ा सड़क पर फूल सोचता लिखा भाग्य कैसा करतार


कभी किसी बाला के सुन्दर कुंतल मध्य सुशोभित हो,
इठलाता अपने जीवन पर मन ही मन आनंदित हो,
सहलाती है जब सुंदरियाँ अपने होठ कपोलों पर,
धन्य धन्य हो जाता जीवन माला संग पिरोहित हो,
लेकिन दो पल में ही मानव, भरा हृदय दे फेंक उतार
 

पड़ा सड़क पर फूल ........

गुलदस्ते में सजता हूँ पर वह मुस्कान कहाँ खिलती,
डाली पर सजकर बगिया में मेरे होठों पर मिलती,
तितली की आहट भँवरों का गुंजन गान कहाँ पाऊँ,
कैसे सम्भव बंद घरों में खुली हवा की वह मस्ती,
माली ही जब दुश्मन अपना जीतेजी देता है मार

पड़ा सड़क पर फूल ........

कभी शहीदों के चरणों में जब जब भी चढ़ जाता हूँ,
संग कन्हैया राधा के जब  मैं भी रास रचाता हूँ,
तब लगता है पैदा होकर कुछ तो कर्म सुकर्म किया,
जीवन सफल मान कुछ अपना थोड़ी राहत पाता हूँ,
ईश चरण में जगह न मिलती पूरा जीवन था बेकार

पड़ा सड़क पर फूल ........

 
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' बीकानेरी

बाल कविता

अपने प्यारे गुड्डों के संग छोटी-सी गुड़िया बन जाऊँ छुप्पा-छुप्पी खेलूँ, भागूँ छुपकर देखूँ फिर छुप जाऊँ बालू को थप-थपकर, रचकर छो...