Sunday, 21 January 2018

मत उदास हो


मत उदास हो थके मुसाफिर
कुछ श्रम बिंदु बिखर जाने से
यह पथ और निखर जायेगा।


रोक सकी कब पागल रजनी
आने वाली सलज उषा को
बाँध न पाई काली बदली
उगते रवि की विकल प्रभा को 


अपराजित निशीथ घट-घटकर
अभिनव पूनम को पायेगा।।


कब विकास के चरण रुके हैं
बीते युग की मनुहारों से
ठिठकी नहीं चेतना जन की
भावी भय की बौछारों से 


सम्भव है आने वाला कल
कोई ज्योति शिखर लायेगा।।


सहमी नहीं नवेली नदिया
कंकरीले पथ या खारों से
गति पाई है गिरते-उठते
ऊँचे पर्वत की धारों से 


बढ़ते जाना रे! अंकुर तू
हर दिन और निखर जायेगा।।


***** मधु प्रधान

Sunday, 14 January 2018

प्रीति के दोहे

 
पावन प्रेम प्रतीति है, सौख्य शान्ति आगार।
जो डूबा सो पार है, पार हुआ भव पार।।


श्रद्धा, संयम, त्याग को, सिखलाती है प्रीत।
प्रेमी गाते हैं जिसे, वह है गीतातीत।।


प्रेम न चाहे योग्यता, रंग, रूप, धन, रीत।
"चंचल" इसमें हारकर, मिले परस्पर जीत।।


नाम रटे रसना सदा, प्रिय छवि उर उत्कीर्ण।
पलको अब अविरल बहो, करो न मन संकीर्ण।।


तुम्हीं कामना भोग हो, तुम्हीं साध्य आराध्य।
हो न कभी अनुराग कम, पूजूँ तुम्हें अबाध्य।। 


***** चंचलेश शाक्य, एटा (उ.प्र.)

Sunday, 7 January 2018

सूरज घर पर आग तापता


सूरज घर पर आग तापता,
धुँधला धुँधला पड़े दिखाई।


हुआ तुषारा पात, पीत-सरसों मुरझाई।
ऊपर से ये मुई, शीत ऋतु की पुरवाई।।
जड़ चैतन्य हुए सब जड़वत,
साथ छोड़ भागी परछाई।

लौह पुरुष सी रेल, सिहरती पड़े दिखाई।
हाड़ माँस की देह, काँपती ओढ़ रजाई।।
थमती कहाँ समय की सुइयाँ,
आख़िर खाई कौन दवाई।

भूख खेलती खेल, मनुज को रेल बनाई।
छोड़े मुँह से वाष्प, पैर दो पहिए भाई।।
आधी आबादी की आशा,
धूप पूरती बाँट रजाई।

***** गोप कुमार मिश्र

Sunday, 31 December 2017

एक गीत - नववर्ष पर


नये वर्ष संकल्प करें हम,
मिलजुल कर कुछ नया करें।


बड़ी प्रबल है वक्त मार की,
सहयोगी मन जिया करें।
क्षणभंगुर ये जीवन अपना,
मिलजुल लय में बहा करें।। 

अपनों के सँग थोड़े से दुख,
आपस में सब सहा करें ।
नये वर्ष संकल्प करें हम

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यादों की भरपूर पोटली,
हृदय समाये रहती है।
हृदय छिपी बातें सब अपनी,
दुखती रग में बहती है।।
इसीलिए सन्देश यही है -
हम बतियातें रहा करें।
नये वर्ष संकल्प करें हम

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हँसते चेहरों के पीछे भी,
दुख होते सबके अपने।
दुख-सुख को साझा करने से,
पूर्ण करे शायद सपने।।
मिलने के कुछ नए बहाने,
मन में बुनते रहा करें।
नये वर्ष संकल्प करें हम


*** लक्ष्मण रामानुज लड़ीवाला

Sunday, 24 December 2017

राह/मार्ग समानार्थी दोहे


जिसने साहस, धैर्य से, किया लक्ष्य संधान।
पथ प्रशस्त उसका हुआ, मिली उसे पहचान।।1


कामयाब वह ही हुआ, जिसके दिल में चाह।
मंजिल तक लेकर गई, कहो किसे कब राह।।2


पथ का संबल प्रेम यदि, रहे पथिक के पास।
मुश्किल झंझावात से, होता नहीं उदास।।3


मार्ग वही होता उचित, जो सिखलाए प्रीति।
साथ अकिंचन के रहे, दूर करे उर भीति।।4
 


देखो चलता जा रहा, कब से एक गरीब।
मंजिल छोड़ो राह के, पहुँचा नहीं करीब।।5


डाॅ. बिपिन पाण्डेय


Sunday, 17 December 2017

कुछ दोहे - मनभावन


अग्नि परीक्षा की घड़ी, आग मिला मजमून।
ताप-ताप कर लिख दिया, ऐसा चढ़ा ज़ुनून।।1।।


आग उगलता आदमी, बना आज शैतान।
खुद ही खुद को मानता, भ्रमवश ही भगवान।।2।।


जब-जब लग जाती जहाँ, जवां दिलों में आग।
तब यह शुभ संकेत ही, कहलाता अनुराग।।3।।


सीने में जब आग हो, बढ़ें निरंतर स्वार्थ।
तब केशव कहते यही, धनुष उठाओ पार्थ।।4।।


तप-तपकर ही आग में, सोना होता शुद्ध।
तप करके इंसान भी, बन जाता है बुद्ध।।5।।


**हरिओम श्रीवास्तव**

Sunday, 10 December 2017

प्रेम होना चाहिए




धन नहीं धरती नहीं मुझको न सोना चाहिए
हर हृदय में सिर्फ सच्चा प्रेम होना चाहिए

स्वार्थ का है काम क्या इस प्रेम के संसार में
त्याग की ईंटें लगी हों प्रीत के आधार में
प्रेम से संसार का हर दीप्त कोना चाहिए 
हर हृदय में सिर्फ सच्चा प्रेम होना चाहिए

प्रेम का उत्तर घृणा हो यह नहीं समुचित कभी
प्रेम के पथ पर गमन होता नहीं अनुचित कभी 
प्रेम वितरण अवसरों को नित सँजोना चाहिए
हर हृदय में सिर्फ सच्चा प्रेम होना चाहिए

प्रेम में है कौन जीता व्यर्थ है यह प्रश्न भी
प्रेम में हारा वही उसका मनाता जश्न भी
हार का मन पर न कोई बोझ ढोना चाहिए
हर हृदय में सिर्फ सच्चा प्रेम होना चाहिए

गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' बीकानेरी

मत उदास हो

मत उदास हो थके मुसाफिर कुछ श्रम बिंदु बिखर जाने से यह पथ और निखर जायेगा। रोक सकी कब पागल रजनी आने वाली सलज उषा को बाँध न पाई काली...