Sunday, 15 April 2018

कुण्डलिया छंद




 (1)

धोखा मक्कारी ठगी, आज पा रहे मान।
जो इनमें जितना निपुण, वह उतना गुणवान।।
वह उतना गुणवान, झूठ जिसके रग-रग में।
दगाबाज ठग धूर्त, फलें फूलें इस जग में।।
हुआ सफलता मंत्र, आज का यही अनोखा।
करते हैं अब राज, ठगी मक्कारी धोखा।।
 

(2)
 

जाना है जग छोड़कर, जीवन है दिन चार।
सद्कर्मों से ही सदा, होता है भव पार।।
होता है भव पार, धर्म ही एक सहारा।
छूठ कपट छल दम्भ, सत्य से हरदम हारा।।
विधि का यही विधान, कर्मफल सबको पाना।
धन वैभव यश कीर्ति, यहीं सब कुछ रह जाना।।


***हरिओम श्रीवास्तव***

Sunday, 8 April 2018

मेरी चाहत



मुरझाये-से तप रेत में हैं चाहतों के गुल खिले
इस बार थोड़ी छांव लाना धूप से राहत मिले


ये ऊंट भी है पूछता अब करवटें लूँ किस तरफ
किन मंज़िलों तक यूँ चलेंगें उम्र ढोते काफिले 


ज्यों रोटियों सँग बांधकर दे दी तुम्हें गुड़ की डली
वैसी ही मीठी याद की इक पोटली मुझको मिले


छौने बड़े तुमको मिलेंगे लौटकर तुम देखना
मेरा समय थमकर मगर अपनी जगह शायद हिले 


फिर बांसुरी की तान अपनी छोड़ जाओ द्वार पर
कानों में बस गूंजें तुम्हारी आहटों के सिलसिले


*** मदन प्रकाश ***

Sunday, 1 April 2018

सुषमा अति न्यारी



काशमीर सुषमा अति न्यारी
मन हरसै लखि केसर क्यारी

फूलहिं सुमन विविध विधि बागा
सुचि गृह बहहिं अनेक तड़ागा


पुष्प वाटिका सोहति नीकी
सुषमा अमर पुरी लगि फीकी
बहु बिधि फलहिं सेव अंजीरा
देखि छटा मन धरहि न धीरा


बाग निशात लगे मन भावन
दृश्य मनोहर हिम गिरि पावन
डल की छटा देखि हरषाई
सबहि रहे निज नयन जुड़ाई


मोहहि शाली मार बगीचा
लगे बिछे हैं पुष्प गलीचा
मुगल बाग की शोभा न्यारी
मन हरि लेत सुमन हर क्यारी


*** चन्द्र पाल सिंह ***

Sunday, 25 March 2018

पीयूषवर्ष छंद


1-


भीष्म सा मत आप, प्रण करना कभी।
जाँच लें गुण-दोष, पथ चलना तभी।।
हो प्रतिज्ञाबद्ध, पछताना पड़े।
ज्यों पितामह भीष्म, बेबस हो लड़े।।


2-


क्यों कहें हम आज, प्रण करना कभी।
राष्ट्रहित में कार्य, यह कर लें अभी।।
दृढ़ करें संकल्प, मिलकर हम सभी।
रह सके अक्षुण्ण, आजादी तभी।।


3-


दूध माँ का धन्य, हो पाए तभी।
देश के रक्षार्थ, प्रण लेना कभी।।
हो परस्पर मेल, हृदय विशाल हों।
भारती के लाल, एक मिसाल हों।।


4-


हौसला हो साथ, मंजिल तब मिले।
और दृढ़ संकल्प, से पर्वत हिले।।
हो इरादा नेक, जब बढ़ना तभी।
प्राप्त होगा लक्ष्य, प्रण करना कभी।।


***हरिओम श्रीवास्तव***

Sunday, 18 March 2018

मेरी अभिलाषा






जन्म सभी लेते धरती पर,पलते अपनी ही माटी में।
विकसित होते, पढ़ते, बढ़ते, अपनी अपनी परिपाटी में।।



सबकी अभिलाषा होती है, कुछ ऐसा कर जाएँ जग में।
नाम अमर हो जाए उनका, याद सदा रह जाएँ जग में।।


कवि चाहे लेखन से अपने, कालजयी रचना दे जाए।
गायक चाहे सुर से अपने, गायन कुछ अद्भुत कर जाए।।


सैनिक चाहे युद्ध लड़े वह, दुश्मन की छाती चढ़ जाए।
या तो विजय पताका फहरे, या घर लिपट तिरंगा आए।।


मेरी अभिलाषा बस इतनी, काम दूसरों के मैं आऊँ।
हर मुख बस मुस्काता देखूँ, सबके दिल में जगह बनाऊँ।।


मिट्टी में तो सब मिलते हैं, मैं फिर से जीवित रह पाऊँ।
अंग दान कर दूँ सब अपने, औरों को जीवन दे जाऊँ।।


***** अशोक श्रीवास्तव

Sunday, 11 March 2018

तुम कब समझोगे?

 


पुरुष! तुम कब समझोगे,
कि हम हाड़-मांस के पुतले नहीं,
जो तुम्हारे उपभोग के लिए बने हैं,
अपितु तुम जैसे ही संवेदित,
जीते जागते मनुष्य हैं।


कब तक तुम अपनी कल्पनाओं के स्वरुप को
हम पर आरोपित करते रहोगे,
कब तक अपनी अपेक्षाओं, स्वगठित आदर्शों
और मिथ्या मर्यादाओं का भार
हम पर डालते रहोगे,
कब तक अपनी इच्छाओं की स्वर्ण-मंडित बेड़ी से
हमारे अस्तित्व को बाँध
हमें बहलाते रहोगे।


पुरुष, तुम कब समझोगे कि
हम न तो सीता बनना चाहते हैं
और न ही शूर्पणखा,
हम न तो आकाश में रहना चाहते हैं
और न ही पाताल में,
हम इसी धरती पर विचरना चाहते हैं
स्वतंत्र, उन्मुक्त, निडर
तुम्हारे संग
तुम्हारी ही तरह
मात्र एक व्यक्ति बनकर।
पुरुष, तुम कब समझोगे?


***** प्रताप नारायण

Sunday, 4 March 2018

फागुन का रंग



फाग का रंग भाएगा तब ,
मधु मिलन की रात आएगी, हमारा चाँद हम पर,
चाँदनी बरसाएगा जब।


प्रीति का गुलाल प्रियतम चूनरी पर डाल देगा,
हरितिमा ला प्रकृति की जब जीवनी में साल देगा,
इन्द्र-धनुषी विविध रंगो की रंगोली गौर मुख पर,
भाव अंतस के मेरे स्व भाव में ले ताल देगा।


स्नेह का स्पर्ष मधुरिम फागुनी रस भाल पर दे,
प्रीति का अस्वाद घुल-मिल एक रस हो जाएगे जब,
फाग अंतस गाएगा तब।


रंगों का मिश्रण अनूठा श्याम रंग हो जाएगा मिल,
मौन मानस रंग-रस भर प्रीति में खो जाएगा खिल,
जब सिन्दूरी क्षितिज से आकर अरुण निज गात में ले,
श्वेत अंबर शीश पर दे रंग-रस घुल जाएगा हिल।


रैन में बन्दी हुए सौरभ उड़ेगे मन सुहासित,
बावली में कोकनद पर मधुप गुंजित गाएगा जब,
फाग मन हो जाएगा तब।


 ***** सुधा अहलूवालिया

कुण्डलिया छंद

 (1) धोखा मक्कारी ठगी, आज पा रहे मान। जो इनमें जितना निपुण, वह उतना गुणवान।। वह उतना गुणवान, झूठ जिसके रग-रग में। दगाबाज ठग...