Sunday, 27 May 2018

सुमेरु छंद

 
1.🌷
 
अचानक आज प्रभु, आये बन अतिथि।
युगों के बाद है, अब आज शुभतिथि ॥
नहीं कुछ है समझ, स्वागत करूँ क्या।
झरें झरझर नयन, झोली भरूँ क्या॥ 


2.🌷
 
करो तुम आज प्रभु, स्वीकार अर्पण।
सभी कुछ आज मैं, करती समर्पण॥
अचानक निरख छवि, पुलकित सकल तन।
मिले सहसा हुआ, हर्षित मगन मन॥


*** कुन्तल श्रीवास्तव ***

Sunday, 20 May 2018

क्रोध/कोप पर दोहे


मानव मन के गाँव में, व्यथा बड़ी है एक
चिरंजीव हो क्रोध ने, खंडित किया विवेक
।।

क्रोधाग्नि जब-जब जली, अंहकार के गाँव
निर्वासित तब-तब हुए, सद्भावों के पाँव
।।

देश-धर्म की आन हित, करना वाजिब क्रोध
जयचंदों को हो सके, राष्ट्रप्रेम का बोध
।।
 
जग में पाया क्रोध ने, सदा सतत् अपमान
रावण सा विद्वान भी, रह न सका गतिमान
।।

काम,क्रोध,मद,मोह का, जीवन है दिन चार
अमर जगत में है सदा, नेह सृजित व्यवहार
।।
 
*** (अनुपम आलोक)***

Sunday, 13 May 2018

जिन खोजा तिन पाइया


सार छंद -
-----------

1-


इच्छा होने से क्या होना, इच्छाशक्ति जरूरी।
उद्यम के बिन कभी न होती, कोई इच्छा पूरी।।
प्राप्त हुआ उसको ही जिसने, गहरे पानी खोजा।
भाग्य भरोसे क्या मिलना है, व्रत रख लो या रोजा।।


2-


कर्म विमुख जो चादर ताने,निशदिन ही सोता है।
मानव जीवन वही व्यर्थ में, अपना ही खोता है।।
वही खोजकर मोती लाया, जिसने गोता मारा।
कठिन परिश्रम नेक इरादा, प्रभु को भी है प्यारा।।


3-


कर्म प्रधान सभी ने माना, कहती भगवद्गीता।
युद्ध किया था रघुनंदन ने, तब ला पाए सीता।।
अनुसंधान किया जिसने भी, वही नया कर पाया।
सोते सिंहों के मुख में क्या, स्वयं कभी मृग आया।।


4-


दैव-दैव आलसी पुकारे, बैठे भाग्य भरोसे।
असफलता मिलने पर रोए, और भाग्य को कोसे।।
जिसने रखा हौसला मन में, सदा कर्म को पूजा।
उसके जैसा अखिल विश्व में, कोई और न दूजा।।


***हरिओम श्रीवास्तव***

Sunday, 6 May 2018

श्रम


 
श्रम एक साधना है,
जीवट की पहचान है,
आलस्य का दुश्मन और
सतत स्फूर्ति की जान है,
हारे का दृढ़ हौसला है तो
जीत के ठहराव का राज है,
फिर फिर विजय पाने की
सशक्त हिम्मत है श्रम,
धीरज का मित्र है,
महका दे जीवन
ऐसा इत्र है,
स्वाभिमान का सबक है,
ईमान है, पाक है इबादत है,
श्रम जीत की ताक़त है,
फिर भी जाने क्यों
खेलते इसके संग
आँख मिचौनी,
और न दे पाते
उनको वो मान
श्रम जिनका जीवन है!


*** डॉ. अनिता जैन "विपुला" ***

सृष्टि किसकी है

सप्तरंगी रश्मियाँ बरसीं गगन से जो- ओस के मोती सजल-कण सृष्टि किसकी है। हरितिमा पे ठहरती विद्युत-...