Sunday, 30 October 2016

जगमगाएँ दीप फिर

 


नेह का हम स्नेह भर दें जगमगाएँ दीप फिर
हो अगर उल्लास दिल में जगमगाएँ दीप फिर


हो अटल विश्वास ख़ुद पर राह पर जो बढ़ चलें
कर्म की जब लौ जलायें
जगमगाएँ दीप फिर

वेदना के रात दिन बहते हैं आँसू आँख से
वो ख़ुशी के गाएँ नगमें जगमगाएँ दीप फिर


बाग़ में खिलती जो कलियाँ वो अगर महफूज़ हों
तब चमन महके जहाँ में जगमगाएँ दीप फिर


दीनता लाचारगी से जी रहे जो ज़िन्दगी
जो गले उनको लगायें जगमगाएँ दीप फिर


***** प्रमिला आर्य

Sunday, 23 October 2016

आज हृदय दो टूक हो गया


आज हृदय दो टूक हो गया

बुनकर तार मधुर सपनों के,
इक संसार रचाया मैंने,
चुनकर हार प्रीति पुष्पों के,
बंदनवार सजाया मैंने,
मन मधुबन जब महक उठा,
तो यह कैसा स्वर पड़ा सुनायी,
मुस्कानों का गीत क्यों पल में,
दर्द भरी इक कूक हो गया

आज हृदय दो टूक हो गया
 

साक्षी हैं ये मधुर मिलन के,
तरु सरिता तट उपवन निर्झर,
रात्रि दिवस चन्द्र तारक गण,
विद्युत मेघ भूधर अरु दिनकर,
गाते निज संग हर्षित होकर,
मृग छोने शुक सारिका पर,
कोकिल का क्यों कुहू कुहू स्वर,
पीहू पीहू सी हूक हो गया

आज हृदय दो टूक हो गया

 
मेरे जीवन नाट्य मंच पर,
प्रीति नाट्य कर दिया निर्देशित,
अमित तुम्हारी कृपा के सम मैं,
भाव सुमन कर पाया न अर्पित,
रहा विधाता केवल दर्शक,
मेरे इस असफल नाटक का,
कलाकार अभिनीत करे क्या,
सूत्रधार जब मूक हो गया

आज हृदय दो टूक हो गया


*** गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत'

Sunday, 16 October 2016

चित्र पर दोहे


दीदी यही क़िताब तुम, पढ़ती रहती रोज
बोलो कौन सवाल का, उत्तर रहती खोज


लब खोलो औ" बोल दो, क्या है इसमें राज
मेरी ये ज़िद मान लो, राज खोल दो आज


री बहना तू रूठ मत, सच बतलाऊँ आज
लड़की की किस्मत बहन, होती धोखेबाज


यही खोजती रोज मैं, क्या है असली बात
अपनी किस्मत में बहन, लिक्खी क्या सौगात


व्यर्थ गई सब कौशिशें, मिला न कोई लेख
समझ गई है बात तो, ले अब तू भी देख


***** बिहारी दुबे

Sunday, 9 October 2016

मानव जीवन पर दोहे


मात-पिता जब वृद्ध हों, रखें पुत्र निज साथ।
बनें सहारा कष्ट में, दे हाथों में हाथ।।1।।
--
भूल साथ माँ पुत्र का, मेट रही अवसाद।
वृद्धाश्रम में बैठकर, देती आशीर्वाद।।2।।
--
नहीं घूमने जाइए, कभी प्रिया के संग।
अगर राहु है केंद्र में, और हाथ है तंग।।3।।
--
कौन खड़ा है साथ में, और कौन है पास।
सोच सोचकर ज़िन्दगी, बन जाती परिहास।।4।।
--
मानव मन उलझा रहे, साथ पास के पाश।
कभी नहीं उत्तर मिले, बैठा दिखे निराश।।5।।
--
अंतरिक्ष में साथ सब, दिखते हैं ग्रह अर्क।
किंतु नहीं वे पास फिर, कैसा तर्क वितर्क।।6।।
--
पास संग सब भूलिए, यह है मायाजाल।
सदा अकेले ही गया, लेकर सबको काल।।7।।


*** डाॅ. बिपिन पाण्डेय

Sunday, 2 October 2016

हमारा वतन






ख़ुद में सारा जहान रखते हैं
दिल में हिन्दोस्तान रखते हैं
*
वक़्त आने पे ये दिखा देंगे
हम हथेली पे जान रखते हैं
*
हमको माटी मिली है भारत की
इसपे कितना गुमान रखते हैं
*
बुद्ध और युद्ध की विरासत को
देखिये हम समान रखते हैं
*
गंग-जमुनी के रँग में डूबी
कितनी मीठी ज़ुबान रखते हैं
*
यूँ तो संयम का नाम है भारत
पर गज़ब का उफान रखते हैं
*
हमको झुकना भी ख़ूब आता है
और सीना भी तान रखते हैं

*
हमने दुनिया को है दिखाया ये
बैरियों का भी मान रखते हैं
*


दीपक कुमार शुक्ला

बचपन

जो किसी भी लालसा से मुक्त होगा सच कहें तो बस वही उन्मुक्त होगा हो नहीं ईर्ष्या न मन में द्वेष कोई हो न अभिलाषा-जनित आवेश कोई कुछ ...