Sunday, 9 October 2016

मानव जीवन पर दोहे


मात-पिता जब वृद्ध हों, रखें पुत्र निज साथ।
बनें सहारा कष्ट में, दे हाथों में हाथ।।1।।
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भूल साथ माँ पुत्र का, मेट रही अवसाद।
वृद्धाश्रम में बैठकर, देती आशीर्वाद।।2।।
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नहीं घूमने जाइए, कभी प्रिया के संग।
अगर राहु है केंद्र में, और हाथ है तंग।।3।।
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कौन खड़ा है साथ में, और कौन है पास।
सोच सोचकर ज़िन्दगी, बन जाती परिहास।।4।।
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मानव मन उलझा रहे, साथ पास के पाश।
कभी नहीं उत्तर मिले, बैठा दिखे निराश।।5।।
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अंतरिक्ष में साथ सब, दिखते हैं ग्रह अर्क।
किंतु नहीं वे पास फिर, कैसा तर्क वितर्क।।6।।
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पास संग सब भूलिए, यह है मायाजाल।
सदा अकेले ही गया, लेकर सबको काल।।7।।


*** डाॅ. बिपिन पाण्डेय

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