Friday, 15 June 2012

एक कविता - दुविधा













धरती, आकाश, बादल, वर्षा ...
सर्दी, गर्मी, पवन, पर्वत ...
सब के सब प्रकृति के काल-चक्र,
शनैः-शनैः हो परिवर्तित सर्व-चक्र,
सर्वथा अकाट्य !
मानव तू व्यर्थ ही काल गँवाता है,
अर्द्धांश यूँ ही चिंतन में बिताता है,
बदलता नहीं हैं नियम-क्रम,
मिटती नहीं है नियति कभी,
है तुच्छ प्राणी उसी (ब्रह्म) का अंग,
कृति उसी की, जागृति उसी की,
फिर भी तू क्यों?
यूँ ही व्यर्थ काल गँवाता है,
जड़-चेतन का भेद बताता है,
जड़ वही है (ब्रह्म),
चेतन है संकल्पना उसकी,
जड़-चेतन तो उसकी है सृष्टि,
जड़-चेतन ही तो है जग-दृष्टि,
जग-दृष्टि को तुम दूर करो,
सत्-सृष्टि का तुम बोध करो,
व्यर्थ काल तुम न नष्ट करो,
सबकुछ तुम अब व्यक्त करो,
जीवन का अनुसंधान करो,
मानव तुम दुविधा दूर करो।

विश्वजीत 'सपन'

Monday, 14 May 2012

माँ - मदर्स डे पर विशेष

माँ,
तुम कहाँ हो?
आज ढूँढ रहा हूँ तुम्हें,
कल तक तुम देहरी पर बैठी,
एक बुढ़िया थी,
लाचार, बेबस उम्र से,
शरीर साथ नहीं देता था,
और मैं,
तुम्हारा सामना करने में झिझकता था,
मुझे बहुत सारे काम थे,
जीवन में सभी आराम थे,
आज तुम नहीं हो,
ढूँढ रहा हूँ तुम्हें,
माँ?
तुम कहाँ हो?


(2)

माँ,
तुम कहाँ हो?
पाल-पोसकर बड़ा किया तुमने,
दूध नहीं तो अपना रक्त पिलाया तुमने,
अभागा मैं समझ न सका,
माँ की ममता न देख सका,
स्वयं ही में मशगूल रहा,
तुम बोली भी,
तो अनजान बना रहा,
तेरे बलिदानों को भुला दिया मैंने,
अपने सुख पर अभिमान किया मैंने,
आज तुम नहीं हो,
तो ढूँढ रहा हूँ तुम्हें,
माँ?
तुम कहाँ हो?


(3)

माँ,
तुम कहाँ हो?
याद है वो दिन,
भागकर आया था स्कूल से,
आँचल में छुपा लिया था तुमने,
झगड़ाकर आया था खेल के मैदान से,
आँचल में छुपा लिया था तुमने,
परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो गया था,
आँचल में छुपा लिया था तुमने,
और मैं?
तुम्हें पहचानने से भी कतरा गया था,
मित्रों के मध्य वह एक बुढ़िया है, कहता गया था,
आज तुम नहीं हो,
तो ढूँढ रहा हूँ तुम्हें,
माँ?
तुम कहाँ हो?


(4)

माँ,
तुम कहाँ हो?
वह दिन अब भी नहीं भूलता है,
सब चलचित्र के समान घूमता है,
डूब रहा था दरिया में,
कूद पड़ी थी तुम,
बहाव तेज था,
हम दोनों ही बह निकले थे,
लेकिन,
तुमने मुझे नहीं छोड़ा था,
समझ जाना था उसी दिन,
माँ के आँचल की छाया संतान के लिए होती है,
संतान कुछ दे नहीं सकता,
प्यार के बोल बोल सकता है,
मैंने यह भी नहीं किया,
और?
आज तुम नहीं हो,
तो ढूँढ रहा हूँ तुम्हें,
माँ?
तुम कहाँ हो?

Sunday, 13 May 2012

हे मातृभूमि है तुम्हें प्रणाम - एक देशभक्ति गीत






 

 

 



 

 

रोम-रोम तेरा यश गाये,

साँस-साँस में तू बस जाये,

हे मातृभूमि है तुम्हें प्रणाम ...

 

हार के आऊँ या जीत कर,

गले लगाती तू प्रीत कर,

कोई चाहे हो संग्राम,

हे मातृभूमि है तुम्हें प्रणाम ...

 

जीत होगी तुम्हें ही अर्पण,

हार हुई तो मेरा दर्पण,

अब न करूँगा कभी विराम,

हे मातृभूमि है तुम्हें प्रणाम ...

 

गीत लिखा है तेरी जय का,

स्वर डाला है नवजीवन का,

रहेगा जीवित स्वर-संग्राम,

हे मातृभूमि है तुम्हें प्रणाम ...

 

हर कंटक को दूर करूँगा,

हर दुश्मन से लोहा लूँगा,

अब चाहे हो जो अंजाम,

हे मातृभूमि है तुम्हें प्रणाम ...

 

Saturday, 14 April 2012

दर्शन




उस असीम के दर्शन,

जो अव्यक्त, किन्तु शाश्वत,

दुर्लभ बाह्यत:

झाँककर देखो अंतर्मन में,

कण-कण में विद्यमान,

समाहित तेरे अंदर भी,

गहरा आँचल क्षणिक सुख का,

परित्याग अत्यावश्यक उसका,

अन्यथा,

अंतर्व्यथा सदैव,

पीड़ित जीवन-कथा सदैव

Saturday, 10 March 2012

एक गीत













फिर चले जाना

चले आओ आकर फिर चले जाना,
क़रीब आओ छूकर फिर चले जाना ।

है मौसम आर्ज़ू का ये तो मत भूलो,
तमन्ना है जिधर फिर चले जाना ।

ये कैसी आग है जो दिल में लगती है,
शोला-ए-दिल बुझाकर फिर चले जाना।

यक़ीं न होगा उनको तुम न आओगे,
ज़रा सा देख इधर फिर चले जाना ।

है कितना सब्र मुझको कैसे बतालाऊँ ?
चुभो के दिल में नश्तर फिर चले जाना।

रहेगा राज़ सदा ही सपनके सीने में,
प्यार तुमसे है कहकर फिर चले जाना ।

विश्वजीत 'सपन'

Saturday, 18 February 2012

मुबारक़बाद - एक कविता


मुबारक़बाद


मुबारक़ हो !
पर्व होली का,
रंगों की दुनियाँ,
हँसी-खुशी बनकर,
मुस्कुराती रहे जीवन में।
नाप सको तो नाप लो,
उन ऊँचाइयों को,
जो नप न सकीं,
प्रेमी की मृत्यु से भी।
जीवन का आसरा उम्मीद है,
जीवन की रीत उलझन है,
दुःख तो कदम-कदम पे है,
उससे क्या घबराना है ?
तो फिर,
देखो सिर उठाकर,
आसमाँ कितना मनोरम है,
निश्छल, नीरव, शान्त, गंभीर,
सब कुछ समाया है उसमें,
सुख-दुःख एवं जीवन-मरण,
फिर भी,
वो मुस्कुराता है,
कहेकहे लगाता है,
फुहारों की वृष्टि से कृषक के मुख पर,
मुस्कान लाता है,
उम्मीदें बंधाता है,
सपने साकार करता है।
किन्तु,
सपने साकार हों,
उसकी तकदीर में ही नहीं शायद,
तभी तो वह उदास दिखता है,
फिर भी जीता है,
क्योंकि उसमें सहनशक्ति है,
यही उसकी जीवन-भक्ति है,
किन्तु,
तुम उसकी उदासी मत देखो,
उसमें छिपी हँसी देखो,
जो दिखती नहीं,
लेकिन देखनी है तुमको।
संभवतः !
यही जीवन है,
जीवन का सच्चा सार है,
इसलिए,
उठो, जागो, सवेरा आया है,
प्रभात की नई किरणें लाया है,
मैं मुबारकबाद देता हूँ,
तुम्हें,
सवेरे-सवेरे।

विश्वजीत 'सपन'

Monday, 9 January 2012

पाँच छोटी कविताएँ - मेरी चाहत


(1)

मैंने चाहा तुम्हें,
शायद ये मेरी बदक़िस्मती है,
क्या सोचते हो?
मुझे चाहने वाला कोई नहीं?
हर तरफ़ मेरा दीदार सितम ढाता है,
जान न्योछावर हर अदा पर होता है,
मगर, बदनसीबी मेरी,
मैं तुम्हें चाहता हूँ,
और तुम हो कि,
बिला-वजह मिझसे खिंचते हो।

(2)

सोचो ज़रा,
बस एक बार तो सोचो,
बग़ैर तुम्हारे,
मेरी ज़िन्दगी क्या होगी?
एक ठूँठ-सी,
जिस पर न पत्ते उग सकते हैं'
और न ही फूल।

(3)

यह सोचकर तुम,
दो शब्द ख़त में न लिख सके,
कि, मैं तुम्हें भूल पाऊँगा,
मैंने ख़त लिखकर भी,
अपने पास रखा है,
क्या तुमने कभी ऐसे ख़तों का,
दर्द महसूस किया है?

(4)

चलो मान लिया,
मैं तेरा प्यार नहीं,
चलो मान लिया,
मैं तेरे अनुसार नहीं,
लेकिन,
मेरे दिल में जो प्यार है,
वह बस तेरे लिए है,
चाहे कुछ न करो,
कम से कम दीदार तो करने दो।

(5)

अब क्या करूँ?
और कैसे चाहूँ?
जी-जान से चाहता हूँ,
धर्म-ओ-ईमान से चाहता हूँ,
शायद तुम्हें यकीं तभी होगा,
जब मेरी लाश से वस्ता होगा।

विश्वजीत 'सपन'

Monday, 2 January 2012

चार छोटी कविताएँ - मानव


मानव





(१)

मैं भी मानव हूँ।
एहसास इसका,
इसलिए नहीं होता,
कि परिभाषा के अनुकूल मैं भी हूँ।
बल्कि, इसलिए होता है
क्योंकि मैं भी बेबस हूँ।






(२)

मैं भी मानव हूँ,
मैंने कहा,
सुना उसने,
फिर पूछा,
तुम मानव कैसे हो?
जब मानव, मानव का नहीं रहा,
तो तुम कैसे रहे?

(३)

ख़ुद को ख़ुद ने जाना,
ख़ुद ने पहचाना,
मानव, मानव को कब जानेगा?
मानव, मानव को कब पहचानेगा?

(४)

कौन है यह मानव?
क्या कभी वह जान पाएगा?
कभी इसका उत्तर पहचान पाएगा?
क्या वह कभी मानव का हो पाएगा?
युगों-युगों से यह अनुत्तरित प्रश्न,
क्या कभी उत्तरित हो पाएगा?
क्या यह सवाल, सवाल ही रह जाएगा?
इस अनबूझ पहेली वाली दुनिया में,
जीवन के अनमोल बोल वाली दुनिया में,
जहाँ जीवन का मोल न रह गया हो?
जहाँ मानवता के बोल न रह गए हों?
काश! मानव, मानव को जान पाता,
तो आतंकवाद का साया न छा पाता।

विश्वजीत 'सपन'

बचपन

जो किसी भी लालसा से मुक्त होगा सच कहें तो बस वही उन्मुक्त होगा हो नहीं ईर्ष्या न मन में द्वेष कोई हो न अभिलाषा-जनित आवेश कोई कुछ ...