Saturday, 18 February 2012

मुबारक़बाद - एक कविता


मुबारक़बाद


मुबारक़ हो !
पर्व होली का,
रंगों की दुनियाँ,
हँसी-खुशी बनकर,
मुस्कुराती रहे जीवन में।
नाप सको तो नाप लो,
उन ऊँचाइयों को,
जो नप न सकीं,
प्रेमी की मृत्यु से भी।
जीवन का आसरा उम्मीद है,
जीवन की रीत उलझन है,
दुःख तो कदम-कदम पे है,
उससे क्या घबराना है ?
तो फिर,
देखो सिर उठाकर,
आसमाँ कितना मनोरम है,
निश्छल, नीरव, शान्त, गंभीर,
सब कुछ समाया है उसमें,
सुख-दुःख एवं जीवन-मरण,
फिर भी,
वो मुस्कुराता है,
कहेकहे लगाता है,
फुहारों की वृष्टि से कृषक के मुख पर,
मुस्कान लाता है,
उम्मीदें बंधाता है,
सपने साकार करता है।
किन्तु,
सपने साकार हों,
उसकी तकदीर में ही नहीं शायद,
तभी तो वह उदास दिखता है,
फिर भी जीता है,
क्योंकि उसमें सहनशक्ति है,
यही उसकी जीवन-भक्ति है,
किन्तु,
तुम उसकी उदासी मत देखो,
उसमें छिपी हँसी देखो,
जो दिखती नहीं,
लेकिन देखनी है तुमको।
संभवतः !
यही जीवन है,
जीवन का सच्चा सार है,
इसलिए,
उठो, जागो, सवेरा आया है,
प्रभात की नई किरणें लाया है,
मैं मुबारकबाद देता हूँ,
तुम्हें,
सवेरे-सवेरे।

विश्वजीत 'सपन'

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