Thursday, 15 December 2011

पाँच क्षणिकाएँ

(१) ज़िन्दगी

क्या ऐसा नहीं लगता,
ज़िन्दगी बे-वजह है,
क्योंकि गुमनाम है।

(२) ख़ुशी और ग़म

जो इक पल हो,
और हर पल हो की तमन्ना हो,
वह है ख़ुशी।
जो इक पल भी हो,
और हर पल न हो की तमन्ना हो,
वह है ग़म।

(३) संसर्ग

बादल और सूरज,
गरीबों की झोपड़ियों पर ही क्यों टूट पड़ते हैं?
संभव है,
अमीरों का संसर्ग उन्हें न भाता हो!

(४) रास्ता

ये अजीब बात है,
हर तरफ़ रस्ता है,
कभी ढूँढा,
तो मिलता नहीं है।

(५) क़सक

पलट के देखो कभी,
अजीब-सी अनुभूति होती है।
छूट जाता है सब कुछ,
घर-बार, वक़्त, दोस्त …
सामने भी तो कुछ नहीं होता,
सुनसान सड़क,
टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियाँ और,
एकाकीपन की एक क़सक।

Thursday, 1 December 2011

तीन रचनाएँ (ग़ज़लनुमा)




इंसान
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पीता हूँ दोस्त जब कभी इंसान बन गया
नज़रों से दूर जाम के होते ही मर गया।
किससे सुनाएँ हाल-ए-दिल* सुनता नहीं कोई
किसने कहा हैवान, वो सुनकर ही मर गया।
जो इक निगाह फेरी ज़माने के दौर पर,
न शाद जब मिला कोई तो जोश मर गया।
हर-सू* दिखाई देता है आलम फ़साद का,
लगता है इस मुक़ाम पर भगवान मर गया।
जब आग लग गई तो बुझाने को ऐ ‘सपन’
बस राख ही बची थी सब और जल गया।
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* दिल का हाल, * हर ओर, चारों तरफ़

        मैं वफ़ा ही करूँगा
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तुम ज़फ़ा भी करो, मैं वफ़ा ही करूँगा,
तुम सदा ना सुनो, मैं वफ़ा ही करूँगा।
तुम ख़ता भी करो, मैं वफ़ा ही करूँगा,
तुम वफ़ा ना करो, मैं वफ़ा ही करूँगा।
माह-ओ-साल* बीते ख़बर न तेरी आई,
तुम गुरेज़ाँ* रहो, मैं वफ़ा ही करूँगा।
ऐ संगे-दिल* हसीना, है ग़म भरा महीना,
तुम कुछ ना करो, मैं वफ़ा ही करूँगा।
देख शम्मे-महफ़िल* तो बुझने को आई,
तुम रौशन रहो, मैं वफ़ा ही करूँगा।
मैकदे* में पीता हूँ और क्या करूँ मैं?
तुम बद-ख़ू* कहो, मैं वफ़ा ही करूँगा।
वफ़ा तो वफ़ा रहे, 'सपन' की आरज़ू है,
तुम ज़फ़ा भी करो, मैं वफ़ा ही करूँगा।
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* महीने और साल * दूर-दूर * महफ़िल की शम्मा * शराबखाना * बुरी आदत वाला


       यूँ ना बैठाओ
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बंद-ए-इश्क़* में हूँ, यूँ ना बैठाओ,
दरख़ुरे-महफ़िल* हूँ, यूँ ना बैठाओ।
तश्ना-ए-शौक* का मारा हुआ हूँ,
बे-नियाज़ी* में हूँ, यूँ ना बैठाओ।
करूँ तसलीम उस तसव्वुर को,
तेरे आगोश में हूँ, यूँ ना बैठाओ।
अन्दोहे-इश्क़* की तपिश है मुझे,
मैं अंदेशे* मैं हूँ, यूँ ना बैठाओ।
मुझे गुरेज़* नहीं, तुम्हीं गुरेज़ाँ* हो,
अलम-नसीम* मैं हूँ, यूँ ना बैठाओ।
तुम्हारे हुस्न का सर चढ़ा है जादू,
सरगस्तगी* में हूँ, यूँ ना बैठाओ।
है 'सपन' बेपरवा, बेख़साल होगा क्यों?
तपिश-ए-दिल* में हूँ, यूँ ना बैठाओ।
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* प्रेम का बंधन * महफ़िल के योग्य * अभिलाषा की प्यास * उपेक्षा * प्रेम की वेदना * चिंतन * झिझक * दूर-दूर होना या रहना * जिसके भाग्य में दुःख हो * उन्माद * जो अच्छी आदत वाला नहीं है * दिल की जलन  


Saturday, 26 November 2011

क्षणिकाएँ - तुम तो ज़ालिम हो

(१)

तुम तो ज़ालिम हो,
सामने आकार गुज़र जाती हो,
कभी सोचा है तुमने ?
उस दिल का क्या होगा ?
जिसपे चलकर गुज़र जाती हो !

(२)

तुम तो ज़ालिम हो,
सामने आकार गुज़र जाती हो,
कभी सोचा है तुमने ?
उन वादों का क्या होगा ?
जिसे तोड़ रुसवाई ले जाती हो।

(३)

तुम तो ज़ालिम हो,
सामने आकार गुज़र जाती हो,
कभी सोचा है तुमने ?
न कुछ साथ आता है, न कुछ साथ जाता है,
क्या ऐसा नहीं हो सकता ?
हम साथ-साथ रह लें,
कुछ दिन,
बस कुछ दिन ही।

(४)

तुम तो ज़ालिम हो,
बस, देख भर लेती हो,
कभी सोचा है तुमने ?
तुम्हारा दर्द सीने मैं लिए कोई बैठा है,
कब से गुमसुम, बेख़बर, ग़मगीन,
कि शायद उसकी सुधि लो।

(५)

तुम तो ज़ालिम हो,
बस, देख भर लेती हो,
टोकती नहीं, हँसती नहीं,
कुछ बोलती नहीं, कुछ कहती नहीं,
माना, ख़ुदा ने मर्दों को बेशर्म बनाया है,
मगर,
उसका क्या होगा ?
जो चाहता है,
लिखता भी है,
मगर, कह न पाता है।

Tuesday, 15 November 2011

नवयुवक एवं दायित्व


नवयुवकों के वृषभ कन्धों पर,
नवयुग का भार,
अत्यंत वृहद्,
ढोकर चलना है उनको,
नवीन परम्पराओं का भार असह्य।
विगत मौसमों में पिघलता जीवन,
पल-पल करवट बदलता जीवन,
प्रलय प्रवाह-सा बहता जीवन,
उदय नव-प्रसून का,
आभास नव-जीवन का,
गरजता मौसम बादल से,
छ्लकता मोती सीप से,
बदलता सावन नव-कलिकाओं से,
नई उमंग, नया सवेरा, विराम नया,
नई दृष्टि, नई आशा, जीवन नया,
नई उलझन, नये गलीचे, मकान नया,
तब,
दृष्टिकोण पुरातन क्यों ?
उठो, जागो, नवयुवको !
नवयुग का भार वहन करो,
किनारे नये,
किरण नई,
व्यक्तित्व नये ।

दीवाली के दोहे

जब लौटे वनवास से, लखन सहित सियराम। दीपों से जगमग हुआ, नगर अयोध्या धाम।।1।। जलते दीपों ने दिया, यह पावन संदेश। ज्योतिपुञ्ज श्...