Sunday, 13 August 2017

रक्षा-बन्धन आया है


देखो कैसा पावन दिन यह, रोली-चन्दन लाया है
आज बहन से मुझे मिलाने, रक्षा-बन्धन आया है 


बाबूजी की प्यारी बिटिया, माँ की राज दुलारी थी
उसके कारण घर की बगिया, जैसे खिली कयारी थी
सारे घर में जैसे कोई, चिड़िया चहका करती थी
उसकी ख़ुशबू से आँगन की, मिट्टी महका करती थी
साथ-साथ हम खेले कूदे, वक़्त वो कैसे बीत गया
समय का पहिया ऐसा घूमा, समय-कलश ही रीत गया
यादों की बारात सजाकर, करने वन्दन आया है
आज बहन से मुझे मिलाने, रक्षा-बन्धन आया है 


बचपन में वो बहना मुझसे, लड़ती और झगड़ती थी
बात-बात पर रूठा करती, मुझपे बहुत बिगड़ती थी
खेल-खेल में हरदम मैं भी, उसे सताया करता था
रोने फिर लगती थी जब वो, उसे मनाया करता था
दुनिया के हर भ्रात-बहन को, ईश्वर का उपहार मिला
कच्चे धागे पक्का बन्धन, राखी का त्यौहार मिला
उसी पर्व को आज मनाने, अक्षत-चन्दन लाया है
आज बहन से मुझे मिलाने, रक्षा-बन्धन आया है


***** विश्वजीत 'सागर'

Sunday, 6 August 2017

"आना जाना लगा रहा"


दुख सुख का सबके जीवन में,
ताना बाना लगा रहा,
रंग बिरंगी इस दुनिया में,
आना जाना लगा रहा।


कभी लगे है शूल जिन्दगी,
पग पग चुभती रहती है,
रेत सरीखी बंद हाथ से,
रोज फिसलती रहती है,
कड़ुवे जीवन में लोहे के,
चने चबाना लगा रहा।


कर्मों की चक्की सब पीसे,
कौन यहाँ पर बच पाया,
नील गगन ये मिला उसी को,
जिसने पर को फैलाया,
इस धरती से ऊपर नभ तक,
स्वप्न सुहाना लगा रहा।


सफल वही है जिसने समझा,
जीवन सुख -दुख का मेला,
कुशल मदारी ऊपर बैठा,
खेल उसी ने है खेला,
खुशियों खातिर उलटी गंगा,
रोज बहाना लगा रहा।

दुख सुख का सबके जीवन में,
ताना बाना लगा रहा,
रंग बिरंगी इस दुनिया में,
आना जाना लगा रहा। 


***** पुष्प लता शर्मा

रक्षा-बन्धन आया है

देखो कैसा पावन दिन यह, रोली-चन्दन लाया है आज बहन से मुझे मिलाने, रक्षा-बन्धन आया है  बाबूजी की प्यारी बिटिया, माँ की राज दुलारी थी...