Saturday, 29 April 2017

जल ही जीवन है




धरती तरस रही बादल को, सूख रहा है पानी,
पेड़ नहीं है दूर दूर तक, लोग करे मनमानी

मटके सारे प्यासे मरते, होंठ सभी के रूखे,
गंगा-यमुना भी रूठी है, ताल-तलैया सूखे,
तपता सूरज याद दिलाता, सबको अपनी नानी,
धरती तरस रही बादल को, सूख रहा है पानी

तुझको कुदरत नें सौंपा था, हरी-भरी धरणी को,
रोता है क्यों बैठ किनारे, तू अपनी करनी को,
पानी ढोते ढोते ही अब, ढलती जाय जवानी,
धरती तरस रही बादल को, सूख रहा है पानी
 
अंतर्मन की आँखें खोलो, जल से ही जीवन है,
पौधे रोपो, पेड़ लगाओ, हरित धरा ही धन है,
बच्चे बूढ़े सभी सुनो यह, कोरी नहीं कहानी,
धरती तरस रही बादल को, सूख रहा है पानी

***** विश्वजीत शर्मा "सागर"

Sunday, 23 April 2017

दोहे जो मन को छू जाए



कभी-कभी कर लीजिए, मन में तनिक विचार।
व्यर्थ न जाए जिन्दगी, जीवन के दिन चार।।1।।


कभी-कभी खिलने लगें, पतझड़ में भी फूल।
होती है जब प्रभु कृपा, और समय अनूकल।2।।


कभी-कभी ये जिन्दगी, लगती है रंगीन।
और कभी लगने लगे, यही बहुत संगीन।।3।।


कभी-कभी होने लगे, दिल बेवजह उदास।
और कभी बिन बात ही, हो जाता मधुमास।।4।।


कभी-कभी लगने लगे, जीना ही दुश्वार।
कभी अपरिमित हो खुशी, रहे न पारावार।।5।।


चलता रहता है सदा, मन में झंझावात।
कभी-कभी मन डोलता, जैसे पीपल पात।।6।।


कभी-कभी हर बात पर, बन जाता है छंद।
और कभी पड़ने लगे, यही बुद्धि फिर मंद।।7।।


कभी-कभी देते प्रभू, सबको छप्पर फाड़।
फिर मोदी को भेजकर, लेते गड़ा उखाड़।।8।।


***हरिओम श्रीवास्तव***

Sunday, 16 April 2017

"ग्रीष्म ऋतु" पर हाइकु


 
पिघला सूर्य,
गरम सुनहरी;
धूप की नदी।


बरसी धूप,
नदी पोखर कूप;
भाप स्वरूप।


जंगल काटे,
चिमनियाँ उगायीं;
छलनी धरा।


दही अचार,
गर्मी का उपहार;
नानी का प्यार।


बच्चे हैं भोले,
रंग बिरंगे गोले;
अमृत घोले।


चुस्की के ठेले,
आँगन बच्चे खेले;
गर्मी के मेले।


***** निशा

Monday, 10 April 2017

एक कविता - शून्य


शून्य से शून्य तक
प्रारम्भ से अंत तक
चला कटीले मार्ग पर
सोया फूलों की सेज पर भी


बालुका राशि पर लिखी ज़िन्दगी 

और फिर इसे धोती लहरें
जीवन के लम्बे अंतराल का
समय के इस कालाघात का,
अनुभव कराती
सागर की गहरी जल राशि,
ऊपर से शांत अन्दर से उद्वेलित


विष भी इसी में
अमृत भी इसी में

यत्न सहस्त्रों किये
क्या खोया क्या मिला
लंबी डगर की यात्रा टेढ़ी-मेढ़ी
निर्दिष्ट पथ से बिखरती
आशाओं के शब्द से सँवारती 

विचित्र जीवन-यात्रा
अनमोल क्षणों को आँचल में सहेजती
दुःख को कुरेदती


यही तो है सत्य
सत्य जो पूरा भी है
अधूरा भी है
जीवन यात्रा के सन्दर्भ
उपलब्धियों का आकलन
शून्य से प्रारंभ यात्रा
शून्य पर समाप्त।


*** सुरेश चौधरी "इंदु"

Sunday, 2 April 2017

नवरात्रि पर विशेष


1
उठो मातु आये दुखी भक्त द्वारे
मिले हर्ष उत्कर्ष ले आस सारे।।
अँधेरे घने हो डराने लगे हैं।
उजाले छले आज जाने लगे हैं।।
2
हुईं दानवी शक्तियाँ मातु भारी।
धरा भी दुखी हो तुम्हे माँ पुकारी।।
मिटाओ अहंकार हे कालिके माँ।
तुम्हीं हो सहारा तुम्हीं पालिके माँ।।
3
करो लेखनी पे कृपा शारदे माँ।
विराजो हिये कण्ठ झंकार दे माँ।।
तुम्हारी दया माँ जिसे भी मिली है।
बुझी ज्योति भी माँ उसी की जली है।।


***** राजेश प्रखर

प्रेम होना चाहिए

धन नहीं धरती नहीं मुझको न सोना चाहिए हर हृदय में सिर्फ सच्चा प्रेम होना चाहिए स्वार्थ का है काम क्या इस प्रेम के संसार में...