Sunday, 30 December 2018

तृण का भार




पर्वत को मैंने छेड़ा
ढह गया।
दूर कहीं से
एक तिनका आया
पथ बाँध गया।
बड़ी-बड़ी बाधाओं को तो
हम
यूँ ही झेल लिया करते हैं
पर कभी-कभी
एक तृण छूता है
तब
गहरा घाव कहीं बनता है
अनबोले संवादों का
संसार कहीं बनता है
भीतर ही भीतर
कुछ रिसता है
तब मन पर
पर्वत-सा भार कहीं बनता है।
 

*-*-*-*-*-
*** कविता सूद ***


Sunday, 23 December 2018

निशानी

 


अपने' क़िरदार से' तू मील का' पत्थर बन जा
रह-रवों के लिए' रहबर सा' इक अख़्तर बन जा
ज़िन्दगी तेरी ज़माने को' हो' इक पैमाना 
बशरियत के लिए' अनमोल सा' ज़ेवर बन जा 


जाना' ही है तो' यहाँ छोड़ निशानी ऐसी
सब जवानों में' हो' इक तेरी' जवानी ऐसी
हो के' क़ुर्बान वतन पर तु सितारा हो जा
कहकशाओं को' मिले एक रवानी ऐसी




*** यशपाल सिंह कपूर ***

शब्दार्थ :-
क़िरदार = चरित्र
रह-रवों = साथी मुसाफिर
रहबर = मार्गदर्शक
अख़्तर = सितारा, ध्वज
पैमाना = मानदण्ड, मानक
बशरियत = इंसानियत, मानवता
क़ुर्बान = बलिदान
कहकशा
ओं = आकाशगंगाओं
रवानी = चाल


Monday, 17 December 2018

एक नज़्म

 


ये दिल का दरिया उफन-उफन कर हसीन आंखों में आ गया है,
फलक़ पे तस्वीर तेरी-मेरी उभर रही है यूँ रफ्ता रफ़्ता,
नशीली शब ने कि फ़िल्म कोई बनाई जैसे हो आशिक़ी पर।
सुलगती सांसों का पैरहन दे कि जिस्म ने रूह को छुआ है।
ये मौज़ ए दरिया, तड़पता साहिल, है तेरी यादों की शोख़ महफ़िल,
मेरे ख़यालों में बज रहे हैं किसी की चाहत के भीगे नग्मे।
तड़प के उल्फ़त ने आँख खोली, समेटने को ये शोख़ मंज़र,
मगर ये किसने मिटा दिया है फलक़ पे तारी हसीं नज़ारा,
तेरे-मेरे अक्स पर न जाने, ये कौन बन के घटा है छाया,
ये किसने फेरी सियाह कूची, ये कौन बन के विलन खड़ा है।
अधूरी है दास्तान ए उल्फ़त कि फ़िल्म डब्बे में जा पड़ी है।
अधूरी रीलों पे रह गया है लिखा हुआ नाम तेरा-मेरा।
भरी जवानी में मर गए हैं कि जैसे क़िरदार दास्तां के,
उफन-उफन कर ये दिल का दरिया मना रहा है कि सोग कोई।
खड़े किनारे पे सोचता हूँ कोई तो आएगा दिल का गाहक,
खरीद लेगा जो दर्द ओ ग़म की, अधूरी रीलें, अधूरे सपने, 

बनेगी चाहत की फ़िल्म फिर से कि आशिक़ी भी जवान होगी,
थियेटरों में वो दिल के चढ़कर मचाएगी धूम एक दिन फिर।
लिखेगा फिर से फलक़ कहानी तेरी-मेरी जान आशिक़ी पर

...हाँ ... तेरी-मेरी जान आशिक़ी पर...

*** दीपशिखा ***

Sunday, 9 December 2018

शब्द



शब्दों का था भाव बड़ा
शक्ति बड़ी थी अर्थ बड़ा
केवल उनके उच्चारण से 

धरती पर था स्वर्ग खड़ा
शब्द ब्रह्म थे शब्द मंत्र थे

शब्दों से थी रची ऋचाएँ
शब्द सबद थे शब्द कबीरा

शब्दों में ही आयत आयें
ईमान शब्द हैं शब्द धर्म हैं 

किरदार शब्द हैं शब्द कर्महैं
शब्द योग हैं यही अमोघ हैं

शब्द अस्त्र हैं शस्त्र शब्द हैं
शब्द ज्ञान हैं शब्द मान हैं

शब्द पुण्य हैं शब्द पाप हैं
तूने तो शब्दों का अद्भुत वरदान दिया है
मैंने ही शब्दों का अपमान किया है

शब्द वही हैं
बस अर्थ नहीं हैं
केवल उच्चारण करते हैं

किरदारों में जिए नहीं हैं
इसीलिए व्यक्तित्व हमारे 

जगमग जलते दिए नहीं हैं
मेरे मालिक मेरे दाता
मुझसे अपने शब्द छीन ले
मुझको तू निःशब्द बना दे।


==============================
*** नसीर अहमद 'नसीर' ***

Sunday, 2 December 2018

दो फूल




फूल ने फूल से फूल सी बात की,
मानो उल्फ़त ने गुल से मुलाकात की,
प्यार की तिश्नगी को सबब मिल गया,
कौन लिक्खे कथा ऐसे हालात की। 


उनके गालों के गुल पर कहा शे'र जब,
तमतमाने लगे तैश में बे-सबब,
हमने' ग़ुस्ताख़ी' की माँग लीं माँफ़ियाँ,
बोले ज़ुल्फों पे' भी तो कहो एक अब। 


*** यशपाल सिंह कपूर ***


Sunday, 25 November 2018

राधिका छंद


1-

है अपना हिन्दुस्तान, जगत में न्यारा।
लगता जन-गण-मन गान, हमें अति प्यारा।।
हैं भाषा वेश अनेक, संघ का ढाँचा।
जहँ संविधान भी एक, बना है साँचा।।


2-


है लोकतंत्र की यहाँ, व्यवस्था न्यारी।
जिसमें शासन की शक्ति, वोट में सारी।।
जनता देकर निज वोट, बने बेचारी।।
इसमें यह भारी दोष, और लाचारी।।


3-


है राजनीति में आज, बहुत पौबारा।
फिरता है केवल आम, आदमी मारा।।
सब नेताओं का एक, आज का नारा।
जनता का है जो माल, हड़प लो सारा।।


4-


जो हैं घोटालेबाज, चोर आवारा।
चुन जाते हैं फिर लोग, वही दोबारा।।
नेतागण सभी समान, नहीं कुछ चारा।
चूसो जनता का खून, आज का नारा।।


5-


मैं ही हूँ सबसे श्रेष्ठ, आज का नारा।
कर दे यदि कोई प्रश्न, चढ़े फिर पारा।।
जब जैसी चाहूँ जिधर, मोड़ दूँ धारा।
मेरा ही लगता रहे, सदा जयकारा।।


*** हरिओम श्रीवास्तव ***

Sunday, 18 November 2018

एक गीत - शिशु मन से मैं करता बात

 
 

किसको चिंता यहाँ उम्र की, शिशु मन से मैं करता बात,
पोती नाती के सँग बीते, जीवन का ये सुखद प्रभात।


प्रश्न पूछकर करें निरुत्तर, उलझन तब होती हर बार,
सोच सोच कर प्रश्न समझता, मन में होती तब तकरार,
बाबा-पोते झगड़ रहें क्यों, पत्नी सुन पूछे यह बात,
किसको चिंता यहाँ उम्र की, शिशु मन से मैं करता बात।


शान्त नहीं होते हैं बच्चे, बिना हुए जिज्ञासा शान्त,
चुप होने को कहता फिर मैं, मुझे चाहिए कुछ एकान्त,
तभी सुझाये माँ वीणा कुछ, जाकर तब बनती कुछ बात,

किसको चिंता यहाँ उम्र की, शिशु मन से मैं करता बात।

खिलती कलियाँ तभी देखते, जब हम करते थोड़ा त्याग,
सिद्ध करे शिशु शिक्षित बनकर, घर का बनता वही चिराग,
घर का सपना पूरा होता, मिलती तब सुंदर सौगात,
किसको चिंता यहाँ उम्र की, शिशु मन से मैं करता बात।


*** लक्ष्मण रामानुज लड़ीवाला ***

Sunday, 11 November 2018

दीप-ज्योति प्रज्ज्वलित है


दीप-जीवन, ज्योति प्रभु की प्रज्ज्वलित है।
नेह-घृत में आत्म-बाती आगलित है॥ 


ज्योति-घट छलका बना अस्तित्व तेरा।
मातु-पितु से है सुभग सुकृतित्व तेरा।
है उन्ही की रोशनी तुझको मिली जो।
डाल अब कुछ नेह तू भी लौ चली वो।
धुन्ध बन कर दीप बुझता शुचि ललित है॥

है बुझा दीपक किसी का अमर हो कर।
जी गया वह जिन्दगी को मृत्यु बो कर।
हौसलों की आग में जलता रहा जो।
आँधियों के मध्य भी पलता रहा वो।
वीर सैनिक-दीप भारत का फलित है॥

आस-दीपक गुल, सबेरा है किसी का।
करुण-आभा में बसेरा है किसी का।
हम चिरागों को जलालें आज ऐसे।
चन्द्र की सोलह कला का साज जैसे।
ज्ञान का ही दीप जीवन में कलित है॥
------------
*** सुधा अहलूवालिया ***


(आगलित - भीगी हुई)

Sunday, 4 November 2018

अंतर्वेदना का एक गीत


 
शरण नहीं निज प्यार जाँचने आए हैं।
दया नहीं अधिकार माँगने आए हैं। 


ढूँढ़-ढूँढ़ कर हार गए तेरा आँगन,
बैठ गयी फिर थके बटोही-सा साजन,
सुधियों के सब चित्र नैन में घूम गए,
बंद नयन में जब अतीत घूमा पावन। 


उन यादों की पीर तुम्हारे आँगन में,
जग से हम थक-हार टाँगने आए हैं, 

दया नहीं अधिकार माँगने आए हैं। 

निर्मोही कुछ दिशा बता दो, आ जाऊँ,
जीवन अंबर पर तेरे मैं छा जाऊँ,
आत्मसात कर तेरा सारा दर्द प्रिये,
खुशियों के नवगीत मधुर से गा जाऊँ। 


भुजपाशों में तेरे, अपने जीवन का,
सारा बोझिल भार दाबने आए हैं,
दया नहीं अधिकार माँगने आए हैं। 


प्यार नहीं तो, फिर आहें भरना कैसा,
प्रणय निवेदन छवियों से करना कैसा,
हर आगत से कुशल हमारी जब पूछी,
फिर बाँहों में भरने से डरना कैसा। 


अपनी खुशियाँ छोड़ तुम्हारी दुनिया में,
अपना हर सम्बंध बाँचने आए हैं,
दया नहीं अधिकार माँगने आए हैं। 


*** अनुपम आलोक ***

Sunday, 28 October 2018

करे कोई भरे कोई




***
करे कोई भरे कोई, कहावत यह पुरानी है।
गुसांई दास तुलसी ने, इसे कुछ यों बखानी है।
करे अपराध जिह्वा पर, पिटाई पीठ की होती।
मढ़े जो और पर गलती, वही अब ब्रह्म ज्ञानी है।।
***
अजब दस्तूर दुनिया का, करे कोई भरे कोई।
इन्हीं उल्टे रिवाजों से, ये अंतर आत्मा रोई।
दिखे सुख चैन में दोषी, यहाँ निर्दोष कष्टों में।
डरे अल्लाह नंगे से, हया जिसने स्वयं खोई।।
***
वही पंडित पुरोहित भी, वही है मौलवी काजी।
रखे जो हाथ में अपने, सदा हर खेल की बाजी।
जमाना लम्पटों का है, पड़ें सब पर वही भारी।
भरी जिसकी रगों में है, दगाबाजी दगाबाजी।।
***
बजा ले गाल जो जितने, करे जो श्रेष्ठ ऐयारी।
सदा खुद की खता को जो, किसी पर थोप दे सारी।
हिले पत्ता न कोई भी, बिना उसके इशारे के।
समझिए कर चुका है अब, निज़ामत की वो तैयारी।।
***
जगत में जो बड़ा काफिर, वही तो तख्त पाता है।
स्वयं के कारनामों में, शरीफों को फँसाता है।
बदल दे झूठ को सच में, चढ़ा दे सत्य को सूली।
करे कोई भरे कोई, यही करके दिखाता है।।


*** हरिओम श्रीवास्तव ***

Sunday, 21 October 2018

कोमल पैरों में - एक कविता




कोमल पैरों में कहीं चुभें दूर्वा के तृण,
इससे डरकर क्या पथ चलना दें त्याग सखे
। 

मखमल आदत में अगर रहा भी हो शामिल,
क्या पाषाणी सच से हम जाएँ भाग, सखे
।।


गीता ने माना, दिए कर्म-उपदेश बहुत,
ठुकरा दें क्या जो मिलें कभी फुर्सत के क्षण।
क्या है आवश्यक, वह उतावला-सा ही हो,
क्या धीरज धरना सीख नहीं पाएगा प्रण।।


माना,कठोर होने को अब कह रहा समय,
कोमल अहसासों के सिर क्यों दें आग, सखे।।


मौसम आँधी वाले हैं,क्या इससे घबरा,
तुलसी का पौधा खुद को कर ले काष्ठ-सदृश।
क्षणभंगुर जीवन का आनन्द न ले पाए,
क्यों बस गुलाब मुरझाने को ही रहे विवश।।


रंगों वाले हाथों तक कीच चली आई।
क्या अंतिम विदा ले गया है अब फाग, सखे।।


माना, मन तो हो चुके किसी पत्थर-जैसे।
क्या लहज़े को भी नरम नहीं रख सकते हैं।।
अंतर्मन को क्या ज़रा राग की ऊष्मा से।
अब कुछ क्षण भी हम गरम नहीं रख सकते हैं।।


दो-चार ज़रा मीठी-मीठी बातें कर लें।
हो भले न कुछ आपस में भी अनुराग, सखे।।


*** पंकज परिमल ***

Sunday, 14 October 2018

वंदना - शृंगार छन्द

 


'सत्य की विजय' दशहरा-पर्व।
मनाते अनुभव होता गर्व॥
सदा मर्यादा का हो भान।
तभी हो सफल राम गुणगान॥1॥


शब्द 'माँ' शुद्ध बीज इक मंत्र।
व्यर्थ सब अन्य यंत्र या तन्त्र॥
करें आह्वान मातृ नवशक्ति।
करें माता की नवधा-भक्ति॥2॥


शरद ऋतु का अनुपम त्योहार।
दशहरा-महिमा अपरम्पार॥
मनाये पूरा भारत देश।
'अलग पर एक' यही संदेश॥3॥

 
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 *** कुन्तल श्रीवास्तव ***

Sunday, 7 October 2018

क्या करें - एक ग़ज़ल



विष भरे जिसके हृदय हो प्यार उनसे क्या करें
है पड़ोसी दुष्ट तो व्यवहार उनसे क्या करें


घात करते रोज उनके कर्म सब नापाक हैं
कब्र में जा खुद छिपे जो रार उनसे क्या करें


चाहते मिलना गले पर हाथ में लेकर छुरी
चाल जिनकी छल भरी सहकार उनसे क्या करें


चेतना जिनकी दबी अज्ञानता के बोझ से
मूढ़ता भारी भरी तकरार उनसे क्या करें


गिद्ध सारे नोचते विश्वास की मृत देह को
कामना जिनकी हवस अभिसार उनसे क्या करें


कर्म से मन से वचन से जो समर्पण कर चुका
भूख जिसको ज्ञान की इंकार उनसे क्या करें


धर्म पथ पर देह आहत क्या करें अनजान हम
गैर है चारों तरफ़ मनुहार उनसे क्या करें


*** भीमराव झरबड़े "जीवन" बैतूल

Sunday, 30 September 2018

यश या अपयश


बाज़ार में बिकते हैं आज
कीर्ति-ध्वज
यश-पताकाएं,
जितनी चाहें
घर में लाकर
सजा लें,
कुछ दीवारों पर टांगे
कुछ गले में लटका लें
नामपट्ट बन जायेंगे
द्वार पर मढ़ जायेंगे
पुस्तकों पर नाम छप जायेंगे
हार चढ़ जायेंगे
बस झुक कर
कुछ चरण-पादुकाओं को
छूना होगा
कुछ खर्चा-पानी करना होगा
फिर देखिए
कैसे जीते-जी ही
अपनी ही मूर्तियों पर
आप
अपने-आप ही हार चढ़ायेंगे।

*-*-*-*-*-
*** कविता सूद ***

Sunday, 23 September 2018

कुछ दोहे



राज काज का चल रहा, जैसे तैसे काम। 
साधन का टोटा बहुत, कर से त्रस्त अवाम॥
***
महँगाई का कुछ मिला, तोड़ नहीं जब हाय।
ध्यान हटाने को करें, नेता रोज उपाय॥ 
***
बाबा सोचे आजकल, नई नई नित युक्ति। 
उनको लक्ष्मी प्राप्त हो, भक्त जनों को मुक्ति॥ 
***
वही पुराने टोटके, साड़ी दारू नोट। 
देकर सभी चुनाव में, नेता मांगे वोट॥ 
***
सत्तर सालों बाद भी, निर्धन है मजबूर। 
मिटे ग़रीबी युक्ति वह, अब तक सबसे दूर॥ 
***
फिर घर घर जाने लगे, नेता देख चुनाव। 
किस विधि अबकी वोट का, पार करें दरियाव॥ 
***
ऐसा करें उपाय सब, शिक्षा बढे अपार। 
लक्ष्मी स्वयं पधार कर, दस्तक दें नित द्वार॥ 
***
*** गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' ***

Sunday, 16 September 2018

अंजाम/परिणाम/नतीजा एवं समानार्थी शब्द



जो भला था कर ही डाला काम का सोचा नहीं
ज़िन्दगी में फिर किसी परिणाम का सोचा नहीं
*****
तय नतीजे पर पहुँचने का इरादा कर लिया
और छेड़ी जंग तो आराम का सोचा नहीं
*****
इस अकेली जान के थे सामने जब इम्तहां
बोलते दिल को सुना इहलाम का सोचा नहीं
*****
हर जगह तो तुम ही तुम थे और मैं विस्मय भरा
ढूंढने किस ओर जाता धाम का सोचा नहीं
*****
कौन सी धुन पे टिके हो दर्द इतना झेल कर
छेड़ती है मय मुझे इक ज़ाम का सोचा नहीं
*****
दायरे फैले हुए हैं सब सवालों के यहाँ
हल तलाशे और हर आयाम का सोचा नहीं
*****
खो के उसमें सुख मिला है वो मेरी पहचान अब
वो मुझे जैसे पुकारे नाम का सोचा नहीं

 
*** मदन प्रकाश ***

Sunday, 9 September 2018

सार छंद


1-
झरनों में झरझर बहता है, कलकल करता पानी।।
और साथ में हरियाली भी, देती नई रवानी।।
माँ जैसी ही गोद प्रकृति की,लगती अतिशय प्यारी।
कितनी सुंदरतम मनभावन, सुषमा इसकी न्यारी।।
2-
रंग-बिरंगे पुष्प अनोखे, लता पत्र फल सारे।
कुदरत की सौगात मिली जो, बिखरे यहाँ नजारे।।
कहते वेद पुराण संत यह, ऋषि मुनि ज्ञानी ध्यानी।
ईश्वर की महिमा से निकले, पत्थर में भी पानी।।
3-
हमसे ही अनमोल सम्पदा, रखी न गई सँभाली।
धरती के भण्डारण को भी, किया हमीं ने खाली।।
मंगल ग्रह पर खोज लिया पर, मिला न हमको पानी।
छेड़छाड़ हो बंद प्रकृति से, और न हो मनमानी।।
4-
भाँति-भाँति के जीव-जंतु हैं, अगणित सर सरिताएँ।
तपोभूमि भारत की धरती, इसकी खुशी मनाएँ।।
मानव से जब मिली चुनौती, क्रोध प्रकृति को आया।
अपने अवरोधों का खुद ही, उसने किया सफाया।।
 
***हरिओम श्रीवास्तव***

Sunday, 2 September 2018

एक गीत - नदियाँ



कल-कल करती नदियाँ गाती, माँ सम लोरी गान।
गरल पान करके भी नदियाँ, करती सुधा प्रदान।।


नदियों से ही नहरें निकलें, जिनसे सिंचित खेत।
ऊपजाऊ मिट्टी भी देखो, नदियों की ही रेत।।
कंकड़-पत्थर सभी यहाँ पर, सरिता के सोपान।
गरल पान करके भी नदियाँ, --------------।।


***********************************


नाले पोखर नहर सभी ही, नदियों की सौगात।
सागर को सरिता का पानी, मिलता है दिन-रात।।
बिन नदियों के नही जीविका, माने सभी किसान।
गरल पान करके भी नदियाँ, --------------------।।


************************************


बिन श्रम के सरिता का पानी, कुदरत की ही भेंट।
नहा नदी में मनुज सदा ही, ले थकान को मेट।।
नदी किनारे शहर बसे है, खिलें जहाँ उद्यान।
गरल पान करके भी नदियाँ, -----------------।।


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*** लक्ष्मण रामानुज लड़ीवाला

Sunday, 26 August 2018

खेल-कूद - एक कविता

 


खेल-कूद जीवन का ऐसा गहना होता है
जहाँ हार को स्वस्थ हृदय से सहना होता है 


मिली विजय श्री तुम्हें बधाई तुम बेहतर खेले
प्रतिस्पर्धी से ये हँसकर कहना होता है 


धैर्य नहीं खोना होता है कभी पराजय पर
हर हालत में अनुशासन में रहना होता है 


खुशी मनानी अलग बात है गर्व न मन में हो
जब जब कोई हार विजय का पहना होता है


चोट अगर लग जाए तो मानो ख़ुद की ग़लती
लेकिन प्रतिद्वन्द्वी से कहाँ उलहना होता है


खेल निखरता है जिससे वो मंत्र बताता हूँ
आदर देकर गुरु चरणों को गहना होता है


*** अनमोल शुक्ल 'अनमोल'

Sunday, 19 August 2018

स्वतन्त्रता दिवस


नमन करे शत-शत उनको दिल
जिनके कारण अपना भारत
------
तम को हमसे दूर भगाकर
एक नई वे अलख जगाकर
सोचो तो किसकी खातिर वे
झूले फाँसी पर मुस्काकर

नमन करे शत-शत उनको दिल
जिनके कारण अपना भारत
-----
सूरज से वे आँख मिलाकर
आज़ादी हमको दिलवाकर
सौंपा हमको वतन हमारा
चले गए इक दीप जलाकर

नमन करे शत-शत उनको दिल
जिनके कारण अपना भारत
-----
सीने पर गोली को खाकर
लड़ते थे वे ज़ख़्म छुपाकर
मिली शहादत उनको तब ही
हमने देखा नया दिवाकर

नमन करे शत-शत उनको दिल
जिनके कारण अपना भारत
-----------------------------------------
 

*** गुरचरण मेहता "रजत"

Sunday, 12 August 2018

किसके सम्मुख - एक कविता


अपना जीवन, अपने दुखड़े,
अपने सुख।
इनका ढोल बजाएँ अब
किसके सम्मुख।।


ढिबरी की अपनी लौ
भले ज़रा मद्धिम,
पर अपनी आँखों में
तेज बहुत बाकी।
अपने रस के पात्र सभी
भर ही देगा
वो, जो दुनिया की
मधुशाला का साकी।।


तुमको जो थोड़ा-थोड़ा-सा
दीख रहा,
यह अपनी पुस्तक का
बस केवल आमुख।।


हमने रंगों को भी
सब स्वीकार किया,
चाहे चटख रहे हों,
चाहे धूसर ही।
अपने मन के खेतों में
सपने बोए,
चाहे वे उर्वर हों
चाहे ऊसर ही।।


दीख रहे हैं
तुमको बहुत तरोताज़ा,
दुख के जल से
धोकर लाए अपना मुख।।


हमने अपना ज्ञान
नहीं रक्खा खुद तक,
नई पीढ़ियों को दी
परम्परा आगे।
कितने भी कमजोर रहे
पर थामे हैं,
हम अपने जीवन की
साँसों के धागे।।


थमने दिया न
अपना भी संगीत कभी,
चाहे झेले हैं
मौसम के सारे रुख़।।


इस दुनिया में
घर-घर माटी के चूल्हे,
इनमें अपना भी है एक
तुम्हें पर क्या।
हम जितना मिल जाता
उसमें ही खुश हैं,
हमने तुमसे माँगी नहीं
बहुत सुविधा।।


तुम अपनी ये आँखें
जरा बंद कर लो,
तुमसे देखा अगर नहीं
जाता है दुख।।


*** पंकज परिमल ***

Sunday, 5 August 2018

ख़ता/ग़लती/भूल


ख़ता का पुतला होता है बशर की जात समझो सब
ख़ता करना अगरचे है बुरी इक बात समझो सब

ख़ता करता नहीं इंसान वो भगवान हो जाता
अगर मिलता कोई ऐसा उसे सौगात समझो सब

ख़ता होती अगर अनजाने में तो माफ़ की जाये
ख़ताएँ जानकर करता उसे बदजात समझो सब

ख़ता गर एक ही करता मुसल्सल बारहा इन्सां
यक़ीनन जुर्म की करता है वह शुरुआत समझो सब

ख़ता की कोशिशें हरगिज़ न हो आओ अहद कर लें
ख़ता की जान कर ख़ुद पर कुठाराघात समझो सब

ख़ता होगी समझिये फिर सज़ा भी कुछ मिलेगी ही
सज़ा का दायरा मुमकिन बुरे हालात समझो सब

ख़ताओं से 'तुरंत' अब से हमेशा के लिए तौबा
ग़मों की चाहिए हमको नहीं बरसात समझो सब

*** गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' बीकानेरी
***


Sunday, 29 July 2018

ताल पर दोहे



ताल शब्द तो एक है, इसके अर्थ अनेक।
कवि को श्रोता ताल दे, जागे जोश विवेक।


तबला ढोल सितार हो, या शहनाई नाल।
कानों में रस घोल दे, बजे संग इक ताल।


नर्तन में तो ताल की, बहुत बड़ी है बात।
काल-माप औ वज़न ही, देता शह या मात


दंगल में उतरे वही, जिसकी मोटी जान।
ताल ठोक गर्जन करे, सिंह भाँति बलवान


ताल तलैया पोखरा, भर दे जो बरसात।
दिन में होली ईद हो, मने दिवाली रात।

 
  *** सतीश मापतपुरी ***

Sunday, 22 July 2018

बारिश/बाढ़ पर कुण्डलिया




भारत में टूटा कहर, बारिश का घनघोर
मची हुई जल प्रलय से, त्राहि त्राहि चहुँ ओर 
त्राहि त्राहि चहुँ ओर, हुआ बाधित जनजीवन 
झेल रहा संत्रास, देश आधा तकरीबन 
कह 'दबंग' कविराय, घिरी जनता आफत में
दिखा रहा सैलाब, भयानकता भारत में

 
रवि कांत श्रीवास्तव 'दबंग'

Sunday, 15 July 2018

चोट/जख्म/आघात पर दोहे



पर अवगुण देखे सदा, दिखी न खुद में खोट।
अक्सर करते हैं यहाँ, अपने दिल पर चोट।।


जिसको निज नेता चुना, देकर अपना वोट।
सरेआम वह दे रहा, मुझे चोट पर चोट।।


दूषित हुए समाज पर, ले भावों की ओट।
कविगण देते हैं सदा, निज चिंतन की चोट।।


शब्दों के आघात से, उजड़े उर का गाँव।
शब्दों की रसवंतिका, सदा छुआती पाँव।।


कभी न अनुपम कीजिए, दीन हृदय आघात।
दीनों की उर आह से, पुण्य क्षार हुइ जात।।

 
*** अनुपम आलोक ***

Sunday, 8 July 2018

अदब/आदर/सम्मान



दिलों ने दिलों को जो दावत लिखी है।
न समझो कि झूठी इबारत लिखी है।


हमारे बुजुर्गों ने बड़े ही अदब से,
बिना ऐब रहना, नसीहत लिखी है।


अलग घर बसाया मेरे भाईयों ने,
पिताजी ने जबसे वसीयत लिखी है।


सभी को अता की, रंगोआब, सुहरत,
मेरे हिस्से में क्यों फ़जीहत लिखी है।


कुरेदे गये उस ख़लिस के लहू से,
कहानी तुम्हारी बदौलत लिखी है। 


झड़े पात जबसे नहीं छाँव देता,
"शजर" की यही तो हक़ीक़त लिखी है।


*** शजर शिवपुरी ***

Sunday, 1 July 2018

जब जागो तभी सवेरा

 

छट जाये तमस घनेरा।
जब जागो तभी सवेरा।।


आदिम युग से आज तलक कुछ, अग्रज चलते आये।
हमने तो बस पद चिन्हों पर, उनके कदम बढ़ाये।।
जान न पाये झूठ सत्य का, कहाँ कौनसा डेरा।
छट जाये तमस........ (1)


सबने अपने अपने हित के, निज बाजार सजाये।
औरों को भरमाया कुछ ने, साझे सत्य कराये।।
कोई था उपकारी केवल, कोई बना लुटेरा।
छट जाये तमस....... (2)


आओ यारों बने हंस हम, सच पय पान करेंगे।
निज स्वारथ सी त्याग बुराई, जन कल्याण करेंगे।
आओ खोलें ज्ञान चक्षु हम, जिन्हें तमस ने घेरा।।
छट जाये तमस..... (3)


*** भीमराव झरबड़े "जीवन" बैतूल ***

Sunday, 24 June 2018

करें नित्य हम योग (गीत)


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योग पुरातन आज जगत में, बना देश की शान।
विश्व मनाता योग दिवस अब, ये भारत का मान।।


तन बलशाली बने योग से, स्वस्थ बनें मन प्राण,
नियमित योगासन से हमको, मिले कष्ट से त्राण,
योग साधना अपनाकर के, करें नित्य हम योग,
ऋषियों ने ही योग क्रिया के, निर्मित किये विधान।


दूर करें हम नेति-क्रिया से, तन के सभी विकार,
आराधना ध्यान आसन से, होते शुद्ध विचार,
स्वस्थ रहें अपना ये जीवन, रहें न कोई रोग,
यही योग विद्या भारत की, माने विश्व सुजान।


विद्या है ये योग-साधना, एक सफल विज्ञान,
हुए योग ऋषि पातञ्जलि जो, सिखा गये ये ज्ञान,
विश्व पटल पर आज सभी ने, किया योग स्वीकार,
वैद्य चिकित्सक सारे इससे, करते रोग निदान।


*** लक्ष्मण रामानुज लड़ीवाला ***

Sunday, 17 June 2018

कुण्डलिया - बरखा

 
आयी रिमझिम बूँद है, लिये मधुर सौगात।
नयनों के तट चूमती, कभी चूमती गात॥
कभी चूमती गात, तृषित मन प्यास बुझाती।
यादों के पट खोल, प्रीत के गीत सुनाती॥
पुष्प देख एकांत, नैन के नीर छुपायी
 
पकड़ नीम की डाल, देखती बरखा आयी

कैसे दिखलाऊँ तुम्हें, इन नैनों की पीर।
कैसे दिल रोता प्रिये, हरपल यहाँ अधीर॥
हरपल यहाँ अधीर, स्वप्न नैनों में तरसे ।
बिन बादल बरसात, आंगना मेरे बरसे॥
प्यासा मन है "पुष्प ", मिलन हो जैसे तैसे।
तुम बिन ऐ मनमीत, जिन्दगी बीते कैसे॥


मस्ती की बरसात में, आओ भीगें मित्र।
कभी चलायें नाव हम, कभी बनायें चित्र
 
कभी बनायें चित्र, टपकता घर में पानी
कभी दिखायें दृश्य, कहाँ रहती है नानी
कैसे खेत, मचान, पुष्प की कैसी बस्ती।
कैसे बच्चे रोज, करें शाला मे मस्ती

 
*** पुष्प लता शर्मा ***

जीवन है संगीत - एक गीत

  शाश्वत गुंजित प्रणवाक्षर का, सतत् चल रहा गीत। उतर मौन में सुनो ध्यान से, जीवन है संगीत। चले समीरण सर-सर सर-सर, गाती है निर्भ्रांत। जल सरित...