Sunday, 9 September 2018

सार छंद


1-
झरनों में झरझर बहता है, कलकल करता पानी।।
और साथ में हरियाली भी, देती नई रवानी।।
माँ जैसी ही गोद प्रकृति की,लगती अतिशय प्यारी।
कितनी सुंदरतम मनभावन, सुषमा इसकी न्यारी।।
2-
रंग-बिरंगे पुष्प अनोखे, लता पत्र फल सारे।
कुदरत की सौगात मिली जो, बिखरे यहाँ नजारे।।
कहते वेद पुराण संत यह, ऋषि मुनि ज्ञानी ध्यानी।
ईश्वर की महिमा से निकले, पत्थर में भी पानी।।
3-
हमसे ही अनमोल सम्पदा, रखी न गई सँभाली।
धरती के भण्डारण को भी, किया हमीं ने खाली।।
मंगल ग्रह पर खोज लिया पर, मिला न हमको पानी।
छेड़छाड़ हो बंद प्रकृति से, और न हो मनमानी।।
4-
भाँति-भाँति के जीव-जंतु हैं, अगणित सर सरिताएँ।
तपोभूमि भारत की धरती, इसकी खुशी मनाएँ।।
मानव से जब मिली चुनौती, क्रोध प्रकृति को आया।
अपने अवरोधों का खुद ही, उसने किया सफाया।।
 
***हरिओम श्रीवास्तव***

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