Sunday, 31 December 2017

एक गीत - नववर्ष पर


नये वर्ष संकल्प करें हम,
मिलजुल कर कुछ नया करें।


बड़ी प्रबल है वक्त मार की,
सहयोगी मन जिया करें।
क्षणभंगुर ये जीवन अपना,
मिलजुल लय में बहा करें।। 

अपनों के सँग थोड़े से दुख,
आपस में सब सहा करें ।
नये वर्ष संकल्प करें हम

----
यादों की भरपूर पोटली,
हृदय समाये रहती है।
हृदय छिपी बातें सब अपनी,
दुखती रग में बहती है।।
इसीलिए सन्देश यही है -
हम बतियातें रहा करें।
नये वर्ष संकल्प करें हम

----
हँसते चेहरों के पीछे भी,
दुख होते सबके अपने।
दुख-सुख को साझा करने से,
पूर्ण करे शायद सपने।।
मिलने के कुछ नए बहाने,
मन में बुनते रहा करें।
नये वर्ष संकल्प करें हम


*** लक्ष्मण रामानुज लड़ीवाला

Sunday, 24 December 2017

राह/मार्ग समानार्थी दोहे


जिसने साहस, धैर्य से, किया लक्ष्य संधान।
पथ प्रशस्त उसका हुआ, मिली उसे पहचान।।1


कामयाब वह ही हुआ, जिसके दिल में चाह।
मंजिल तक लेकर गई, कहो किसे कब राह।।2


पथ का संबल प्रेम यदि, रहे पथिक के पास।
मुश्किल झंझावात से, होता नहीं उदास।।3


मार्ग वही होता उचित, जो सिखलाए प्रीति।
साथ अकिंचन के रहे, दूर करे उर भीति।।4
 


देखो चलता जा रहा, कब से एक गरीब।
मंजिल छोड़ो राह के, पहुँचा नहीं करीब।।5


डाॅ. बिपिन पाण्डेय


Sunday, 17 December 2017

कुछ दोहे - मनभावन


अग्नि परीक्षा की घड़ी, आग मिला मजमून।
ताप-ताप कर लिख दिया, ऐसा चढ़ा ज़ुनून।।1।।


आग उगलता आदमी, बना आज शैतान।
खुद ही खुद को मानता, भ्रमवश ही भगवान।।2।।


जब-जब लग जाती जहाँ, जवां दिलों में आग।
तब यह शुभ संकेत ही, कहलाता अनुराग।।3।।


सीने में जब आग हो, बढ़ें निरंतर स्वार्थ।
तब केशव कहते यही, धनुष उठाओ पार्थ।।4।।


तप-तपकर ही आग में, सोना होता शुद्ध।
तप करके इंसान भी, बन जाता है बुद्ध।।5।।


**हरिओम श्रीवास्तव**

Sunday, 10 December 2017

प्रेम होना चाहिए




धन नहीं धरती नहीं मुझको न सोना चाहिए
हर हृदय में सिर्फ सच्चा प्रेम होना चाहिए

स्वार्थ का है काम क्या इस प्रेम के संसार में
त्याग की ईंटें लगी हों प्रीत के आधार में
प्रेम से संसार का हर दीप्त कोना चाहिए 
हर हृदय में सिर्फ सच्चा प्रेम होना चाहिए

प्रेम का उत्तर घृणा हो यह नहीं समुचित कभी
प्रेम के पथ पर गमन होता नहीं अनुचित कभी 
प्रेम वितरण अवसरों को नित सँजोना चाहिए
हर हृदय में सिर्फ सच्चा प्रेम होना चाहिए

प्रेम में है कौन जीता व्यर्थ है यह प्रश्न भी
प्रेम में हारा वही उसका मनाता जश्न भी
हार का मन पर न कोई बोझ ढोना चाहिए
हर हृदय में सिर्फ सच्चा प्रेम होना चाहिए

गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' बीकानेरी

Sunday, 3 December 2017

यह कैसा इन्तिज़ार

 


हार गया हूँ प्रेमनगर मैं अपने नीति-निधान का,
इन्तिज़ार अब मुझको केवल साँसों के अवसान का।


सपनों का स्पंदन टूटा भाव प्रेम के सिसक रहे,
धूल-धूसरित प्रणय पताका, अंतस के पट झिझक रहे,
युग सिमटा है पल में आकर मेरे कर्म विधान का,
इन्तिज़ार अब मुझको केवल साँसों के अवसान का।


चक्रवात सा दर्द घुमड़ यूँ जीवन के पथ पर आया,
आँखों का गंगाजल बहकर सागर खारा कर आया,
सावन बनकर विरह बरसता मुझपर आज जहान का,
इन्तिज़ार अब  मुझको केवल साँसों के अवसान का।


सप्तपदी के सात जन्म हित सातों वचन भुलाकर वह,
सातों अंबर पार कर गया तन्हा मुझे सुला कर वह,
हुआ दर्द से रिश्ता अविचल मेरे हर अनुमान का,
इन्तिज़ार अब मुझको केवल साँसों के अवसान का।


***** अनुपम आलोक

Sunday, 26 November 2017

अपना धर्म निभाते


मानसरोवर में सबको ही, सुंदर दृश्य लुभाता।
हंस हंसिनी विचरण करते, धवल रंग से नाता।।
सरस्वती के वाहन होकर, हंसा मोती चुगते।
शांत भाव के पक्षी है ये, खुले गगन में उड़ते।। 


प्रणय पंथ के सच्चे साथी, आपस में हर्षाये
शुभ ऊषा का पंथ निहारें, काली रात बिताये।।
इनकी मूरत लगती भोली, प्रीति निभाती जोड़ी।
सम्मोहित हो कविगण लिखते, बैठ वहाँ पैरोडी।।


प्रेमी ये हंसों की जोड़ी, दिल दरिया पैमाना।
ममता के सागर में बसते, इनका वही ठिकाना।
धरती अम्बर तीन लोक में, अपना धर्म निभाते।
हंस वाहिनी माँ कहलाती, जग में उन्हें घुमाते।।


***** लक्ष्मण रामानुज लड़ीवाला 

Sunday, 19 November 2017

बाल कविता


अपने प्यारे गुड्डों के संग
छोटी-सी गुड़िया बन जाऊँ


छुप्पा-छुप्पी खेलूँ, भागूँ
छुपकर देखूँ फिर छुप जाऊँ


बालू को थप-थपकर, रचकर
छोटा सा घर एक बनाऊँ


मेरी अपनी छुक-छुक गाड़ी
बस उसमें ही मैं रम जाऊँ


कितने अच्छे लोग यहाँ पर
सबको कुछ खुशियाँ दे पाऊँ


शानू, डूडू, सोना, पुटलू
सब पर अपना रौब जमाऊँ


सपनों की दुनिया में जाकर
परियों को भी खूब रिझाऊँ


छप-छप पानी में मैं खेलूँ
कागज़ की इक नाव बनाऊँ


चाँद-सितारों को तक-तक कर
गुड्डों के संग अब सो जाऊँ


  ***** आराधना

Sunday, 12 November 2017

अंतस भवन तुम्हें लिख दूँगा




तुम जो प्रणय गीत बन जाओ
सारा सृजन तुम्हें लिख दूँगा
आकर मिलना प्रेम नगर में
अंतस भवन तुम्हें लिख दूँगा

हम चातक प्यासे सावन के
औ तुम मेघों की शहजादी
तुमने कर घन घोर गर्जना
मधुवन में ज्वाला सुलगा दी
इस प्यासे उजड़े उपवन में
ऋतु वहार बन कर बरसो तो
सच कहता हूंँ इस मौसम में
पावस मिलन तुम्हें लिख दूँगा
 

सोलह सावन कैसे बीते
तुम अपने अनुभव लिख देना
जो बसंत मैंने देखे हैं 

उन सब गीतों को पढ़ लेना
फिर होठों पर बोल सजा कर
साथ अगर मेरे गाओ तो
अरमानों की फुलबगिया के
सारे सुमन तुम्हें लिख दूँगा
 

ख़ुशबू बनकर बिखर जाओ तो
बाग बाग गुलशन हो जाये
फिर सोलह शृंगार सजाना
गद गद अंतर मन हो जाए
आओ बैठें एक डाल पर
स्वप्न अगर साकार हुए तो
मधुर महकती अमुराई की
पुरवइ पवन तुम्हें लिख दूँगा
 

हम अनुरोध किए फिरते हैं 
तुम कुहू कुहू कू का करती
में प्यासा हूँ जनम जनम से
तुम कहाँ कहाँ ढूंँढा करती
महामिलन को मुखरित करना
ही तकदीर हमारी है तो
सागर एक बार स्वीकारो
सातो वचन तुम्हें लिख दूँगा


*** राधा बल्लभ पाण्डेय सागर

Sunday, 5 November 2017

सपना रहा अधूरा


लड़ता रहा युद्ध जीवन का,
सपना रहा अधूरा मन का।

सुख धन दौलत खूब बटोरा,
याद भूलकर अपने तन का,
ढली उम्र तब दुख के बादल,
भूल गया अभिमान बदन का।

घात करें विश्वास बनाकर,
मुख से मीठा काले मन का,
हुआ तभी बदनाम विभीषण,
जैसे भेद खुला रावण का।

संतो की शक्लो में बैठा,
ढोंगी दुश्मन आज चमन का,
जाल बिछाता कदम कदम पर,
करता है लालच नित धन का।

मातृभूमि की सेवा में नित,
निरत पुष्प है इस उपवन का,
अटल अखंडित भारत वासी,
अडिग हमेशा अपने प्रण का।

हम अपनी सीमा के रक्षक,
हमें नहीं डर है जीवन का,
चाहे जो आतंक पसारों,
नहीं बुझेगा दीप अमन का।

भीमराव झरबडे "जीवन" बैतूल

Sunday, 29 October 2017

सार छन्द

 
गहन तिमिर हर ओर व्याप्त था, घटा घिरी अनचाही।
आसमान में घोर अँधेरा, भटक गया था राही।।
निबिड़ निशा के अंधकार से, उसका मन घबड़ाया।
तभी चमकते खद्योतों ने, उसको मार्ग दिखाया।।


ऐसा ही मानव जीवन में, नित होता रहता है।
ज्ञान ज्योति अज्ञान तिमिर में, मन उलझा रहता है।।
विषयों में बँध अज्ञानी मन, अंधकार में भटके।
ज्ञान प्रकाशित हो जाये तब, मन उजियारा चमके।।


कुन्तल श्रीवास्तव

Sunday, 22 October 2017

दीवाली के दोहे


जब लौटे वनवास से, लखन सहित सियराम।
दीपों से जगमग हुआ, नगर अयोध्या धाम।।1।।


जलते दीपों ने दिया, यह पावन संदेश।
ज्योतिपुञ्ज श्रीराम हैं, रावण तम के वेश।।2।।


देवी कल्याणी रमा, कृपा करें इस बार।
हर घर में हो रौशनी, भरे रहें भंडार।।3।।


जलता दीपक एक ही, तम को देता चीर।
बुझे दीप को जारकर, लिखे नयी तकदीर।।4।।


जले दीप से दीप तब, बदलेगा परिवेश।
ज्ञानदीप से कट सकें, जीवन के सब क्लेश।।5।।


***हरिओम श्रीवास्तव***

Sunday, 15 October 2017

दिल मेरे

 
सो जाता जब ये जग सारा,
घर, आँगन, पनघट, चौबारा

सुधियों में स्पंदित पल-पल,
दिल मेरे! तू ही होता है


खेता है तू सुख की नौका,
दुःख के पर्वत भी ढोता है,
भर जाता आकंठ कभी तो,
कभी बहुत खाली होता है,
भावों का अनुबंध तुझी से,
तू ही पाता और खोता है


 जब होता है संगम तेरा,
कितने मधुर पुष्प खिल जाते,
जीवन पथ के कदम-कदम पर,
मधु, पराग, सौरभ मिल जाते,
पर विछोह का दंश चुभे जब,
चुपके-चुपके तू रोता है


लघु आकार भले ही तेरा,
किन्तु वृहद आयाम बहुत है,
एक सृष्टि लक्षित है बाहर,
अंदर तेरे एक निहित है,
सारे क्रिया कलापों का ही,
संचालन तुझसे होता है


***** प्रताप नारायण

Sunday, 8 October 2017

पुष्प का मन


हुआ चमन से अलग नहीं है फिर कोई अपना घरबार
पड़ा सड़क पर फूल सोचता लिखा भाग्य कैसा करतार


कभी किसी बाला के सुन्दर कुंतल मध्य सुशोभित हो,
इठलाता अपने जीवन पर मन ही मन आनंदित हो,
सहलाती है जब सुंदरियाँ अपने होठ कपोलों पर,
धन्य धन्य हो जाता जीवन माला संग पिरोहित हो,
लेकिन दो पल में ही मानव, भरा हृदय दे फेंक उतार
 

पड़ा सड़क पर फूल ........

गुलदस्ते में सजता हूँ पर वह मुस्कान कहाँ खिलती,
डाली पर सजकर बगिया में मेरे होठों पर मिलती,
तितली की आहट भँवरों का गुंजन गान कहाँ पाऊँ,
कैसे सम्भव बंद घरों में खुली हवा की वह मस्ती,
माली ही जब दुश्मन अपना जीतेजी देता है मार

पड़ा सड़क पर फूल ........

कभी शहीदों के चरणों में जब जब भी चढ़ जाता हूँ,
संग कन्हैया राधा के जब  मैं भी रास रचाता हूँ,
तब लगता है पैदा होकर कुछ तो कर्म सुकर्म किया,
जीवन सफल मान कुछ अपना थोड़ी राहत पाता हूँ,
ईश चरण में जगह न मिलती पूरा जीवन था बेकार

पड़ा सड़क पर फूल ........

 
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' बीकानेरी

Sunday, 1 October 2017

छन्द -- मदिरा सवैया


(1)


मन्द हँसी मुख ऊपर मात सुदर्शन रूप लुभाइ रही।
अंक लिये प्रिय पुत्र गजानन वत्सलता रस-धार बही।
तेज प्रवाहित है मुख मंडल भक्त सभी जयकार कही।
कष्ट हरो तुम आकर मात दुखी सब हैं इस पूर्ण मही।


(2)


हे भवतारिणि विश्व विनोदिनि हास विलासिनि पुण्य प्रदे।
संकटहारिणि अम्बर गामिनि दैत्य विनाशिनि माँ सुख दे।
मोद प्रमोदिनि केसरि वाहिनि कीर्ति प्रसारित भी कर दे।
मंगलकारिणि ज्ञान प्रकाशिनि बुद्धि विवेक शुभा वर दे।
 

भारती जोशी, चमोली, उत्तराखंड।

Sunday, 24 September 2017

साथी तेरा प्यार - एक गीत


जीवन की अनमोल धरोहर, साथी तेरा प्यार।
मणिकांचन संयोग सुखद है, मान रहा संसार।

हर अनुभूति सुहानी अनुपम, अद्भुत नव अनुबंध।
जुड़े हृदय के तार बना तब, यह मधुरिम संबंध ।।
झंकृत कर दे मन वीणा को, तेरा रूप सिंगार ।
जीवन की अनमोल धरोहर...


सूखे नीरस मरुथल में तुम, सुरभित सुंदर फूल।
आँखों में लहराता रहता, तेरा नील दुकूल।
अल्कों की मतवाली खुशबू, करती सदा विभोर।
अधंकारयुत सघन निशा में, आई बनकर भोर।।
खंडित जीवन नौका की तुम, एक सुदृढ़ पतवार।
जीवन की अनमोल धरोहर...


क्षण भर विलग रहूँ यदि तुमसे, हो जाता बेचैन।
विरह पलों की सोच बात ही, भर भर आते नैन।
हरपल प्रभु से यही विनय है, कभी न हों हम दूर।
जीवन भर के साथी हैं हम, करें प्यार भरपूर ।।
प्राणप्रिये तुम बनकर आईं, जीवन का आधार।
जीवन की अनमोल धरोहर...


***** डाॅ. बिपिन पाण्डेय

Sunday, 17 September 2017

अरे ओ व्योम!


ओ, चतुर्दिक फैले हुए,
समस्त पर आच्छादित,

अनन्त तक अपनी बाँहें पसारे व्योम!


कितना विलक्षण चरित्र है तुम्हारा!
निराकार होकर भी दृश्य हो
बिना रंग के भी नीलाभ हो
पास भी हो और अति दूर भी


असंख्य ग्रहों, नक्षत्रों
और आकाशगंगाओं को
अपने अंक में समेटे हुए
तुम अनंत भी हो और शून्य भी

कितने रहस्यमयी हो तुम!
बाहर भी हो और अंदर भी
मन में भी पलते हो
स्वप्नों में भी ढ़लते हो


चिर अखंडित होकर भी
मनुष्यों पर टूट कर गिरते हो।

कितना प्रगाढ़ आकर्षण है तुम्हारा!
पल पल अपनी ओर खींचते हो
साहस के पंख देकर पास बुलाते हो।
ओ, निराकार, पारदर्शी, अखण्डित नभ!
कोई न जान सका
तुम्हारी ऊँचाई, तुम्हारा विस्तार, तुम्हारी विराटता।



***** प्रताप नारायण

Sunday, 10 September 2017

कह मुकरी


(1)


मेरे साथ-साथ वह जाए,
फिर सब पर ही रौब जमाए,
कर देता सबको ही ठंडा,
क्या सखि साजन? नहिं सखि “डंडा”।।


(2)


साथ-साथ वह आता-जाता,
लिपट चिपट कर प्यार जताता,
उसके संग फिरूँ मैं भागी,
क्या सखि साजन? नहिं सखि “डॉगी”।।


(3)


साथ-साथ वह मेरे जाए,
खुलकर अपने रँग बिखराए,
मगर मुझे वह दिल से भाता,
क्या सखि साजन? नहिं सखि “छाता”।।


(4)


उसके बिन पड़ता नहिं चैना,
लड़ते सदा उसी से नैना,
साथ-साथ थोड़ी इसमाइल,
क्या सखि साजन? नहिं “मोबाइल”।।


**हरिओम श्रीवास्तव**

Sunday, 3 September 2017

वही मक्कार होता है।

 
अजब है मुल्क यह सारा सदा लाचार रोता है।
यहाँ तो भेषधारी भी बहुत बीमार होता है।


यहाँ हों बंदिशें दिल पर वहाँ कब चैन मिलता है,
किनारे पर खड़ा मानुष सदा बेकार होता है।


सुलगती ज़िन्दगी में तो उलझती रात है काली,
वहाँ ख़ुद से मिले कोई तभी स्वीकार होता है।


ज़माना है बड़ा जालिम ज़रा निकलो तरीके से,
यहाँ खुदगर्ज बैठे हैं यहाँ हर वार होता है।


तुझे अपना समझ कर ही पुकारा है नशेमन में,
ज़रा सा पास भी बैठो यही तो प्यार होता है।


अँधेरे में सभी बैठे यहाँ मत रौशनी करना,
यहाँ उपदेश देता जो वही मक्कार होता है।


🌺अरविंद

Sunday, 27 August 2017

कोई कारण बतलाये



सदा आह में पली नारियाँ जीवन करके क्षार।
सुख की आहुति भी न सकी दे उनको किंचित प्यार।
कोई कारण बतलाये!
कोई कारण बतलाये! 


गौतम मुनि की नार अहिल्या बनी शिला क्या दोष,
देवराज ने छल से उसका लूटा यौवन कोष,
क्यों पाषाण बनी वह नारी तके राम कब आये।
कोई कारण बतलाये!
कोई कारण बतलाये!


पतिव्रता बृंदा की भी तो अतिशय करुण कहानी,
दानव कुल के जालंधर की बृंदा थी पटरानी,
हरि से लाज लुटा जड़ होकर आज तलक दुख पाये।
कोई कारण बतलाये!
कोई कारण बतलाये!


प्रेम पुजारन मीरा की क्या कम है करुण कहानी,
महल, दुमहला धन, दौलत तजि भई कृष्ण दीवानी,
विष प्याले फिर क्यों राणा ने पग-पग उसे पिलाये।
कोई कारण बतलाये!
कोई कारण बतलाये!


जग जननी थी मातु जानकी आदिशक्ति अवतारी,
पर सुख की एक रैन धरा पर पा न सकी बेचारी,
अग्निपरीक्षा दे कर भी क्यों वन-वन भटकी जाये।
कोई कारण बतलाये!
कोई कारण बतलाये!


***** अनुपम आलोक

Sunday, 20 August 2017

थोथा चना बाजे घना


भ्रम
जी हाँ भ्रम
भ्रमित करता है
मन के दौड़ते अहंकार को,
अंतस के शापित संसार को।
क्षितिज पर धुएं का अंबार
अम्बर की नील पराकाष्ठा को
धूमिल तो कर सकती है
समाप्त नहीं।
सत्यता पारदर्शित होती ही है
अतिवाचालता अपने अस्तित्व के
खोखलेपन की द्योतक होती है
और दिग्भ्रमित होती है।
शब्द-शब्द बहुमूल्य है
शब्द ईश्वर के समतुल्य है,
अज्ञानी ही जो चाहे बोल जाते हैं
अपनी पोल खोल जाते हैं
चना थोथा हो तो बजेगा ही
जो घना हो वह तो सदा सजेगा ही।
अतिवाद अपवाद और वाद सृष्टि क्रम में
अनपेक्षित हैं
व्यक्ति जो अनावश्यक और ज्यादा बोले 

वह उपेक्षित है।

***** सुरेश चौधरी

Sunday, 13 August 2017

रक्षा-बन्धन आया है


देखो कैसा पावन दिन यह, रोली-चन्दन लाया है
आज बहन से मुझे मिलाने, रक्षा-बन्धन आया है 


बाबूजी की प्यारी बिटिया, माँ की राज दुलारी थी
उसके कारण घर की बगिया, जैसे खिली कयारी थी
सारे घर में जैसे कोई, चिड़िया चहका करती थी
उसकी ख़ुशबू से आँगन की, मिट्टी महका करती थी
साथ-साथ हम खेले कूदे, वक़्त वो कैसे बीत गया
समय का पहिया ऐसा घूमा, समय-कलश ही रीत गया
यादों की बारात सजाकर, करने वन्दन आया है
आज बहन से मुझे मिलाने, रक्षा-बन्धन आया है 


बचपन में वो बहना मुझसे, लड़ती और झगड़ती थी
बात-बात पर रूठा करती, मुझपे बहुत बिगड़ती थी
खेल-खेल में हरदम मैं भी, उसे सताया करता था
रोने फिर लगती थी जब वो, उसे मनाया करता था
दुनिया के हर भ्रात-बहन को, ईश्वर का उपहार मिला
कच्चे धागे पक्का बन्धन, राखी का त्यौहार मिला
उसी पर्व को आज मनाने, अक्षत-चन्दन लाया है
आज बहन से मुझे मिलाने, रक्षा-बन्धन आया है


***** विश्वजीत 'सागर'

Sunday, 6 August 2017

"आना जाना लगा रहा"


दुख सुख का सबके जीवन में,
ताना बाना लगा रहा,
रंग बिरंगी इस दुनिया में,
आना जाना लगा रहा।


कभी लगे है शूल जिन्दगी,
पग पग चुभती रहती है,
रेत सरीखी बंद हाथ से,
रोज फिसलती रहती है,
कड़ुवे जीवन में लोहे के,
चने चबाना लगा रहा।


कर्मों की चक्की सब पीसे,
कौन यहाँ पर बच पाया,
नील गगन ये मिला उसी को,
जिसने पर को फैलाया,
इस धरती से ऊपर नभ तक,
स्वप्न सुहाना लगा रहा।


सफल वही है जिसने समझा,
जीवन सुख -दुख का मेला,
कुशल मदारी ऊपर बैठा,
खेल उसी ने है खेला,
खुशियों खातिर उलटी गंगा,
रोज बहाना लगा रहा।

दुख सुख का सबके जीवन में,
ताना बाना लगा रहा,
रंग बिरंगी इस दुनिया में,
आना जाना लगा रहा। 


***** पुष्प लता शर्मा

Sunday, 30 July 2017

विधि/विधान पर दोहे


लागू अपने देश में, जो भी नियम विधान।
फर्ज सभी का है यही, इनका लें संज्ञान।।1।।


आँखों पर पट्टी बँधी, अंधा है कानून।
बिना गवाह सबूत के, कितने भी हों खून।।2।।


जिनको मिल पाती नहीं, रोटी भी दो जून।
उनको उलझाता सदा, ये अंधा कानून।।3।।


करते-करते पेशियाँ, बचे न भूँजी भाँग।
नियम और कानून भी, लगने लगते स्वाँग।।4।।


मिली सदा कानून से, एक यही बस सीख।
आशा रहती न्याय की, मिले सिर्फ तारीख।।5।।


*****हरिओम श्रीवास्तव

Sunday, 23 July 2017

प्रिये तुम्हारे मोहक कुंतल

 
प्रिये तुम्हारे मोहक कुंतल,
सघन, सुवासित, अतिशय चंचल,
नेह निमंत्रण देते पल पल।
तन-मन हो उठता उच्छृंखल ।।
प्रिये तुम्हारे मोहक कुंतल...


मुख पर बिखरें ऐसे खुलकर,
भ्रमर-झुण्ड ज्यों नत फूलों पर,
करते गुंजन, होकर विह्वल।
झंकृत हो उठता अंतस्थल।।
प्रिये तुम्हारे मोहक कुंतल...


चोटी में बल खाते ऐसे,
सर्प-युगल क्रीड़ा-रत जैसे,
अंग अंग छूते हैं प्रतिपल।
मधुरस धारा बहती अविरल।।
प्रिये तुम्हारे मोहक कुंतल...


***** प्रताप सिंह

Sunday, 16 July 2017

सेना पर कुछ दोहे

सावन में फिर आ गई, काँवडियों की मौज।
घूम रहे हैं बन सभी, बम भोले की फौज।।1।।
--
बानर सेना साथ ले, लंका पहुँचे राम।
किया आसुरी शक्ति का, प्रभु ने काम तमाम।।2।।
--
आई भँवरों की चमू, करने पान पराग।
कली-कली से कर रही, देख व्यक्त अनुराग।।3।।
--
सेना अपने राष्ट्र की, देती नित बलिदान।
इसके कारण विश्व में, है भारत की शान।।4।।
--
दुर्गम दुर्ग पहाड़ का, देती सीना चीर।
सेना के बलिदान से, देश रहे बेपीर।।5।।


***** डाॅ. बिपिन पाण्डेय

Sunday, 9 July 2017

बड़ा मुश्किल - एक नवगीत


बड़ा मुश्किल
समय के साथ चल पाना
बड़ा मुश्किल


कभी ये शाह बनता है
बड़ा ये चोर है लेकिन
बदलता रंग बोल़ों के
मचाता शोर ये लेकिन


बड़ा मुश्किल
समय के साथ बतियाना
बड़ा मुश्किल


कभी ये बघनखे पहने
कभी महका गुलाबों सा
कभी पढ़ता अमृत मंतर
कभी बहका शराबों सा


बड़ा मुश्किल
समय के मंत्र पढ़ पाना
बड़ा मुश्किल


हँसा था साथ में अपने
सजी थी आरती आँगन
समय ने अब कहाँ पटका
अकेले इस सघन कानन


बड़ा मुश्किल
समय के साथ निभ पाना
बड़ा मुश्किल

=========
*** बृजनाथ श्रीवास्तव

Sunday, 2 July 2017

दुमदार दोहे


1.
उमड़ घुमड़ घिरने लगे, बदरा चारों ओर।
घनन घनन घन हो रहा, आसमान में शोर।।
मेघ पानी भर लाए।।
2.
मेघ मल्हारें गा रहे, कोयल का मधु गान।
हरित चूनरी में खिली, वसुधा की मुस्कान।।
झमाझम बारिश होती।।
3.
चोली चूनर चपल मन, सराबोर सब आज।
खोल दिए बरसात ने, यौवन के सब राज।।
काम ने वाण चढ़ाए।।
4.
सावन के झूले पड़े, शीतल मंद समीर।
मेघों की सौगात से, मिटी धरा की पीर।।
सभी के मन हर्षाए।।
5.
मेघों की बारात से, मन में उठे हिलोर।
वृंदगान करने लगे, दादुर मोर चकोर।।
हुआ मौसम सतरंगी।।


*****हरिओम श्रीवास्तव

Sunday, 25 June 2017

बचपन



जो किसी भी लालसा से मुक्त होगा
सच कहें तो बस वही उन्मुक्त होगा


हो नहीं ईर्ष्या न मन में द्वेष कोई
हो न अभिलाषा-जनित आवेश कोई


कुछ नहीं पाना अगर तो रोष कैसा
मन अगर संतुष्ट फिर आक्रोश कैसा


घूमते लट्टू इसी में व्यस्त बच्चे

भूल कर दुनिया हुए हैं मस्त बच्चे

नाचते लट्टू उधर बच्चे नचाते
लोभ के चक्कर बड़ों को हैं घुमाते


खेल बस प्रतिद्वंद्विता का खेलते हैं
लालसा में लिप्त जीवन झेलते हैं


एक कल्पित प्रगति का उन्माद मन में
जी रहे हैं बस लिए अवसाद मन में


लौट तो सकता नहीं बचपन दुबारा
पर बदल सकता है ये चिंतन हमारा


है मिला जितना उसे पर्याप्त मानें
सुख सदा संतुष्टि से ही प्राप्त जानें


अब न इच्छाएँ भले ही तुष्ट हों सब
है उचित फिर भी सभी संतुष्ट हों अब


<><><><><><><>
भूपेन्द्र सिंह "शून्य"

Sunday, 18 June 2017

मेघअश्रु बरसाता है



प्रकृति दोष जब धरती माँ के, आँचल आग लगाता है
एक वक्त की रोटी को भी, पेट तरस तब जाता है
कुल कुटुंब की भूख विवशता, होती धरती पुत्रों की

शुष्क नयन से तब सावन भी, मेघअश्रु बरसाता है


इठला कर बादल का पौरुष, दावानल है उगल रहा
कृषक पुत्र की खुशियाँ सारी, सत्ता का सुख निगल रहा
खलिहानों का सूखा अँधड़, मन मंतस तरसाता है
शुष्क नयन से तब सावन भी मेघअश्रु बरसाता है


जहाँ वेदना को ठुकराना, ही मंशा सरकारी है
तब प्राणों को आहुत करना, कृषकों की लाचारी है
जय किसान का घोष व्यर्थ तब, बोझ कलुष बनजाता हैं
शुष्क नयन से तब सावन भी, मेघअश्रु बरसाता है


***** अनुपम आलोक

Sunday, 11 June 2017

दो घनाक्षरी



जो भी हो मुझे पसंद, हो जाये वो रजामंद,
नाज़ जो उठाये सदा, साथी ऐसा चाहिए।
मानूं कभी उसकी मैं, वो भी मान जाए मेरी,
ताल जो मिलाये सदा, साथी ऐसा चाहिए।
हाँ में हाँ मिलाने वाले मिलेंगे कई मगर,
गलती बताये सदा, साथी ऐसा चाहिए।
माँगे जो सभी की खैर, याद नहीं रक्खे बैर,
बस भूल जाये सदा, साथी ऐसा चाहिए।।


********************************


मोती ज्यों हो सीप सँग, बाती जैसे दीप सँग,
साथ मेरे आये सदा, साथी ऐसा चाहिए।
डूबे मेरे दुख में जो, और मेरी खुशियों में,
खुशी जो मनाये सदा, साथी ऐसा चाहिए।
रास्ते हों फूल भरे चाहे मिलें शूल भरे,
साथ जो निभाये सदा, साथी ऐसा चाहिए।
एक एक मिलकर ग्यारह बन जाते हैं,
हाथ जो बढ़ाये सदा, साथी ऐसा चाहिए।।


***** गुरचरन मेहता 'रजत'

Sunday, 4 June 2017

सज़ा/दण्ड पर पाँच दोहे


शांति व्यवस्था के लिए, बनते दण्ड विधान।
कर्म दंड के हेतु हैं, ऊपर कृपानिधान।।1।।


लिखे नहीं कानून में, कुछ ऐसे भी दण्ड।
ईश्वर जो देता सजा, होती बहुत प्रचण्ड।।2।।


आया है कानून का, अब कुछ ऐसा दौर।
सज़ा किसी को मिल रही, अपराधी है और।।3।।


कभी लगे जीवन सज़ा, कभी लगे आनंद।
मिले हलाहल भी यहाँ, और यहीं मकरंद।।4।।


सज़ा सख्त सबसे यही, मन से दिया उतार।
जीते जी इंसान को, देती है जो मार।।5।।


***हरिओम श्रीवास्तव

Sunday, 28 May 2017

फिर लगी आँखें भिगोने




उम्र मुझसे
पूछती अब
हैं कहाँ वे दिन पुराने


जिन दिनों
हमने रचे थे
धूल से सोनल घरौंदे
फिर बनाया
बाग हमने
और रोपे नवल पौधे


वे विगत पल
पूछते अब
हैं कहाँ वे दिन सलोने


जिन दिनों
हमने नहाये
तीर्थ नैमिष गोमती जल
जिन दिनों
हमको सुलभ था
नेहपूरित मातृ आँचल


घाट नदियाँ
पूछते अब
क्यों नयन के आर्द्र कोने


खो गये
मधु मंजरी के
वे सुवासित बाग न्यारे
और खोये
सावनी दिन
मेहधारी जलद कारे


सोचती अब
उम्र बैठी
फिर लगी आँखें भिगोने


***बृजनाथ श्रीवास्तव

Sunday, 21 May 2017

अत्त दीपो भव


अंतिम साँसे गिन रहे, थे जब गौतम बुद्ध।
भद्रक रो कहने लगा, गला हुआ अवरुद्ध।।
राह दिखाए कौन अब, सूर्य चला अवसान।
दीप ज्ञान का बुझ रहा, कौन करै मों शुद्ध।।


भद्रक से प्रभु ने कहे, अंतिम ये उपदेश।
अपना दीपक आप बन, दीप्त होय परिवेश।।
मन वाणी अरु कर्म से, साधक साधे साध्य।
मन-दर मंदिर होय तब, जहाँ बसे अवधेश।।


जीव भटकता रात दिन, तीर्थ कंदरा खोह।
करे कामना बिन तजे, काम क्रोध मद मोह।।
बाहर-बाहर ढूँढता, अंतर लिए प्रकाश।
साधक साधन साध्य सब, ईश अंश ही सोह।।


***** गोप कुमार मिश्र

Sunday, 14 May 2017

मौन के साये


 
जाम होठों से लगाये मीत तेरे नाम पर
मौन के साये लदे हैं आज अपनी शाम पर


कब शुरू होकर कहाँ ढलती रहीं शामें सभी
कौन रक्खे अब नज़र आगाज़ पर अंजाम पर


साँझ की भी क्या कहें, बस रात छाती है यहाँ
रोज़ तारे देखते हैं चुप खड़े हो बाम पर


चूम शामों की पलक हम कर रहे थे बंदगी
अब खुदा ही दे गवाही इश्क़ के इलज़ाम पर


ज़िन्दगी की साँझ में क्या खूब तुम हो आ मिले
वक़्त मेरा मुस्कुराया देर के ईनाम पर 


 ***** मदन प्रकाश

Tuesday, 9 May 2017

हे! कर्मवीर

 
हे! कर्मवीर, श्रम देवपुरुष, हे! सर्जक, साधक, प्रतिपालक,
हे! सृष्टि समर के गणनायक, हे! जन गण मन के अधिनायक,
मैं कर्म योग का परिकल्पन, नैनों में धरने आई हूँ,
औ कर्म महत्ता जन जन के, अन्तस घट भरने आई हूँ


श्रम स्वेद नीर से ही सिंचित, धरणी की सारी काया है,
कब हाथ हिलाए बिन बोलो, दाना मुख तक भी आया है,
जैसा जिसने बोया पाया, यह नियम अटल है धरती पर,
प्रारब्ध न गले लगाता फिर, जो बैठा कर पर कर धर कर,
खुशबू हूँ सद्कर्मो की मैं, हर सदन बिखरने आई हूँ।


आध्यात्म, तपस्या, अनुशीलन,सन्यास अपरिग्रह, आत्मबल,
हैं कर्म साधना रूप अलग, करते मानव को सुदृढ़, सबल,
श्रद्धा, विश्वास, भक्ति आशा, हर कर्म मूल मन का दर्पण,
निज अहम बैर के भावों का, कर मानस गंगा में तर्पण,
मैं कर्म देविका जन जन के, कर कमल सँवरने आई हूँ।

धरणी, अम्बर, सूरज, तारे, अविराम सदा पथ पर चलते,
हैं कल्प करोड़ों बीते पर, देखा है क्या इनको थकते,
रावण हंता श्रीराम प्रभो, या कृष्ण सुदर्शनधारी हैं,
निज कर्म यज्ञ प्रतिपालन को, धरणी पर ये अवतारी हैं,
इस देव धरा के कण कण में, उत्फुल्ल विचरने आई हूँ।


***** दीपशिखा सागर

Saturday, 29 April 2017

जल ही जीवन है




धरती तरस रही बादल को, सूख रहा है पानी,
पेड़ नहीं है दूर दूर तक, लोग करे मनमानी

मटके सारे प्यासे मरते, होंठ सभी के रूखे,
गंगा-यमुना भी रूठी है, ताल-तलैया सूखे,
तपता सूरज याद दिलाता, सबको अपनी नानी,
धरती तरस रही बादल को, सूख रहा है पानी

तुझको कुदरत नें सौंपा था, हरी-भरी धरणी को,
रोता है क्यों बैठ किनारे, तू अपनी करनी को,
पानी ढोते ढोते ही अब, ढलती जाय जवानी,
धरती तरस रही बादल को, सूख रहा है पानी
 
अंतर्मन की आँखें खोलो, जल से ही जीवन है,
पौधे रोपो, पेड़ लगाओ, हरित धरा ही धन है,
बच्चे बूढ़े सभी सुनो यह, कोरी नहीं कहानी,
धरती तरस रही बादल को, सूख रहा है पानी

***** विश्वजीत शर्मा "सागर"

Sunday, 23 April 2017

दोहे जो मन को छू जाए



कभी-कभी कर लीजिए, मन में तनिक विचार।
व्यर्थ न जाए जिन्दगी, जीवन के दिन चार।।1।।


कभी-कभी खिलने लगें, पतझड़ में भी फूल।
होती है जब प्रभु कृपा, और समय अनूकल।2।।


कभी-कभी ये जिन्दगी, लगती है रंगीन।
और कभी लगने लगे, यही बहुत संगीन।।3।।


कभी-कभी होने लगे, दिल बेवजह उदास।
और कभी बिन बात ही, हो जाता मधुमास।।4।।


कभी-कभी लगने लगे, जीना ही दुश्वार।
कभी अपरिमित हो खुशी, रहे न पारावार।।5।।


चलता रहता है सदा, मन में झंझावात।
कभी-कभी मन डोलता, जैसे पीपल पात।।6।।


कभी-कभी हर बात पर, बन जाता है छंद।
और कभी पड़ने लगे, यही बुद्धि फिर मंद।।7।।


कभी-कभी देते प्रभू, सबको छप्पर फाड़।
फिर मोदी को भेजकर, लेते गड़ा उखाड़।।8।।


***हरिओम श्रीवास्तव***

Sunday, 16 April 2017

"ग्रीष्म ऋतु" पर हाइकु


 
पिघला सूर्य,
गरम सुनहरी;
धूप की नदी।


बरसी धूप,
नदी पोखर कूप;
भाप स्वरूप।


जंगल काटे,
चिमनियाँ उगायीं;
छलनी धरा।


दही अचार,
गर्मी का उपहार;
नानी का प्यार।


बच्चे हैं भोले,
रंग बिरंगे गोले;
अमृत घोले।


चुस्की के ठेले,
आँगन बच्चे खेले;
गर्मी के मेले।


***** निशा

Monday, 10 April 2017

एक कविता - शून्य


शून्य से शून्य तक
प्रारम्भ से अंत तक
चला कटीले मार्ग पर
सोया फूलों की सेज पर भी


बालुका राशि पर लिखी ज़िन्दगी 

और फिर इसे धोती लहरें
जीवन के लम्बे अंतराल का
समय के इस कालाघात का,
अनुभव कराती
सागर की गहरी जल राशि,
ऊपर से शांत अन्दर से उद्वेलित


विष भी इसी में
अमृत भी इसी में

यत्न सहस्त्रों किये
क्या खोया क्या मिला
लंबी डगर की यात्रा टेढ़ी-मेढ़ी
निर्दिष्ट पथ से बिखरती
आशाओं के शब्द से सँवारती 

विचित्र जीवन-यात्रा
अनमोल क्षणों को आँचल में सहेजती
दुःख को कुरेदती


यही तो है सत्य
सत्य जो पूरा भी है
अधूरा भी है
जीवन यात्रा के सन्दर्भ
उपलब्धियों का आकलन
शून्य से प्रारंभ यात्रा
शून्य पर समाप्त।


*** सुरेश चौधरी "इंदु"

Sunday, 2 April 2017

नवरात्रि पर विशेष


1
उठो मातु आये दुखी भक्त द्वारे
मिले हर्ष उत्कर्ष ले आस सारे।।
अँधेरे घने हो डराने लगे हैं।
उजाले छले आज जाने लगे हैं।।
2
हुईं दानवी शक्तियाँ मातु भारी।
धरा भी दुखी हो तुम्हे माँ पुकारी।।
मिटाओ अहंकार हे कालिके माँ।
तुम्हीं हो सहारा तुम्हीं पालिके माँ।।
3
करो लेखनी पे कृपा शारदे माँ।
विराजो हिये कण्ठ झंकार दे माँ।।
तुम्हारी दया माँ जिसे भी मिली है।
बुझी ज्योति भी माँ उसी की जली है।।


***** राजेश प्रखर

Sunday, 26 March 2017

शहीद दिवस



आज शहीदी दिवस साथियो, भगत सिंह से वीरों का।
राजगुरू, सुखदेव सरीखे, वतनपरस्त फकीरों का।
जब भारत की, महाघोष की ये हुंकारें भरते थे।
गोरे अफसर इनके डर से, थर-थर काँपा करते थे।


आजादी की खातिर इनने, हँस-हँस के बलिदान दिया।
भारत के तीनो बेटों ने, एक साथ प्रस्थान किया।
इन मतवाले वीरों की इस, कुर्बानी का ध्यान रहे।
हाथ तिरंगा औ होंठों पर, भारत का जयगान रहे।


***** रणवीर सिंह (अनुपम)

Sunday, 19 March 2017

न तेरा न मेरा

 
यही झगड़ा सदा से है कि तेरा है कि मेरा है
समझता पर नहीं कोई कि चिड़िया का बसेरा है


लिखा लेते वसीयत हम सभी घर बार दौलत की
मगर ले कुछ नहीं जाते हमें लालच ने घेरा है


नहीं मालूम अगले पल यहाँ होंगे वहाँ होंगे
निभाने को किया वादा नहीं होता सवेरा है 


कफ़न के बाद भी ख़्वाहिश बची रहती ज़माने की
दफ़न के बाद भी रहता यहीं दो गज़ का डेरा है 


भुला देता ज़माना हर किसी को बाद मरने के
मगर रहता वही है याद जिसका दिल में डेरा है


*** अशोक श्रीवास्तव, रायबरेली

Sunday, 12 March 2017

पाँच कह मुकरिया - होली विशेष


(1)
मैं उस पर जाऊँ बलिहारी,
डाले रँग भर-भर पिचकारी,
बचे न साबित मेरी चोली,
ए सखि साजन? नहिं सखि होली।।1।।
(2)
आकर मुझको भंग पिलाए,
अजब-गजब फिर मस्ती छाए,
पकड़ा धकड़ी हँसी ठिठोली,
ए सखि साजन? नहिं सखि होली।।2।।
(3)
उसके संग करूँ मैं मस्ती,
मिट जाती मेरी सब हस्ती,
चेहरा बन जाता रँगोली,
ए सखि साजन? नहिं सखि होली।।3।।
(4)
दिन भर मुझको भंग पिलाए,
तन मन मेरा खिल-खिल जाए,
तंग लगे तब गीली चोली,
ए सखि साजन? नहिं सखि होली।।4।।
(5)
गुझिया मीठा खूब खिलाए,
रंग लगाकर गले लगाए,
ठंडाई में डाले गोली,
ए सखि साजन? नहिं सखि होली।।5।।


**हरिओम श्रीवास्तव**

Sunday, 5 March 2017

साथी/मित्र पर पाँच दोहे


सच्चा साथी राखिए, दुख में दे जो साथ।
एक विभीषण मिल गया, धन्य हुए रघुनाथ।।


कृष्ण सुदामा थे सखा, जग में है विख्यात।
बड़ भागी को ही मिले, ऐसी प्रिय सौगात।।


संकट में जो साथ दे, उसको साथी मान।
राह दिखाए सत्य की, जग में हो सम्मान।।


साथी मेरे हैं कई, सच्चा नहि है एक।
फूक-फूक कर चल रहा, मन में लिए विवेक।।


कड़वी बोली भी भली, जो हो सच्चा मित्र।
सत पथ गामी हम रहें, बनता दिव्य चरित्र।।


~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

*** मुरारि पचलंगिया

जीवन है संगीत - एक गीत

  शाश्वत गुंजित प्रणवाक्षर का, सतत् चल रहा गीत। उतर मौन में सुनो ध्यान से, जीवन है संगीत। चले समीरण सर-सर सर-सर, गाती है निर्भ्रांत। जल सरित...