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नेह भरा ईश्वर का प्यार
सृष्टि रचयिता परमेश्वर ही, जीवन पथ करते उजियार । जीवन दर्शन जो भी समझे, कुदरत का माने उपकार ।। माँ बापू ही ईश हमारे, नित उठ उनको करे प्रणा...
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पिघला सूर्य , गरम सुनहरी; धूप की नदी। बरसी धूप, नदी पोखर कूप; भाप स्वरूप। जंगल काटे, चिमनियाँ उगायीं; छलनी धरा। दही ...
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जब उजड़ा फूलों का मेला। ओ पलाश! तू खिला अकेला।। शीतल मंद समीर चली तो , जल-थल क्या नभ भी बौराये , शाख़ों के श्रृंगों पर चंचल , कुसुम-...

संजीव सर ,बहुत गहराई हैं आपकी कविता मॆ.
ReplyDeleteसादर आभार आदरणीय आलोक जी.
Deleteसुंदर भावो की अनुपम प्रस्तुति
ReplyDeleteसादर आभार आपका आदरणीय लक्ष्मण रामानुज लडीवाला जी. सादर नमन
ReplyDeleteसुंदर जीवन दर्शन , सादर बधाई आदर्णीय संजीव सर जी , आदर्णीय सपन सर जी बेहतरीन ब्लोग हेतु हार्दिक बधाई |
ReplyDeleteसादर आभार आपका आदरणीया.
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