Sunday, 14 December 2025

पावन/पवित्र - कुण्डलिया छंद

 

(1)
पावन रखो शरीर मन, पावनता ज्यों क्षीर।
पावनता प्रभु की सखी, पावन गंगा नीर।
पावन गंगा नीर, तरंगित सागर लहरें।
पावन हैं हिम श्रृंग, मेघ जल लाकर ठहरें।
मन में हो न विकार, दया बरसे ज्यों सावन।
प्रभु का हो सान्निध्य, रहे जब तन-मन पावन।
(2)
वेद ऋचाएँ मंत्र शुचि, ओमकार उच्चार।
कपट रहित मन स्वच्छ है, शुचि जीवन आधार।
शुचि जीवन आधार, सत्य सौंदर्य भरा है।
निष्कलंक निर्दोष, हृदय में प्रेम खरा है।
दिव्य लगे संसार, कर्म में शुचिता लाएँ
पावन है ब्रह्माण्ड, कह रहीं वेद ऋचाएँ
*** डॉ. राजकुमारी वर्मा

1 comment:

  1. हार्दिक बधाई आदरणीया राजकुमारी वर्मा जी
    दूसरे छंद में "कह रही वेद ऋचाएं" को "कहे सब वेद ऋचाएं" करना उचित होगा । सादर नमन

    ReplyDelete

आरम्भ

  आरम्भ कोई शोर नहीं करता वह अक्सर एक गहरी चुप्पी में जन्म लेता है जैसे रात के खत्म होने पर अँधेरे को इत्तिला दिए बिना ही सुबह की ...