Sunday, 18 January 2026

आरम्भ

 

आरम्भ कोई शोर नहीं करता

वह अक्सर एक

गहरी चुप्पी में जन्म लेता है

जैसे रात के खत्म होने पर

अँधेरे को इत्तिला दिए बिना ही

सुबह की किरणें आ जाती हैं

आरम्भ बीते हुए का खंडन नहीं

बल्कि उसे सहलाती हुई

एक नई स्वीकृति है

मानों टूटे भरोसों की राख में

कहीं दबा हुआ

एक जीवित बीज!

आरम्भ

साहस से पहले का भय है

और भय के बाद की

सामान्य होती सांसे

यह वही क्षण है

जब मन

हार को स्वीकार कर

आगे बढ़ने का

पहला कदम रखता है!

आरम्भ

अंत का विरोध नहीं

उसका सबसे सटीक उत्तर है!


*** राजेश कुमार सिन्हा

 


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