आरम्भ
कोई शोर नहीं करता
वह
अक्सर एक
गहरी
चुप्पी में जन्म लेता है
जैसे
रात के खत्म होने पर
अँधेरे
को इत्तिला दिए बिना ही
सुबह
की किरणें आ जाती हैं
आरम्भ
बीते हुए का खंडन नहीं
बल्कि
उसे सहलाती हुई
एक नई
स्वीकृति है
मानों
टूटे भरोसों की राख में
कहीं
दबा हुआ
एक
जीवित बीज!
आरम्भ
साहस
से पहले का भय है
और भय
के बाद की
सामान्य
होती सांसे
यह वही
क्षण है
जब मन
हार को
स्वीकार कर
आगे
बढ़ने का
पहला
कदम रखता है!
आरम्भ
अंत का
विरोध नहीं
उसका
सबसे सटीक उत्तर है!
*** राजेश
कुमार सिन्हा

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