Sunday, 5 July 2026

नेह भरा ईश्वर का प्यार

 

सृष्टि रचयिता परमेश्वर ही, जीवन पथ करते उजियार ।
जीवन दर्शन जो भी समझे, कुदरत का माने उपकार ।।

माँ बापू ही ईश हमारे, नित उठ उनको करे प्रणाम।
करे ईश भी आदर इनका, इसके मिलते बहुत प्रमाण।।
पाल-पोष कर योग्य बनाते, जीवन में भरते उल्लास।
गुरुओं की बलिहारी माने, मिलती उनसे सीख अपार।।

गुरुवर ही वट वृक्ष बनाते, करे हृदय से हम सत्कार।
सृष्टि रचयिता परमेश्वर ही, जीवन पथ करते उजियार।।

पृथ्वी माता, सूर्य चन्द्रमा, इन सबमें ईश्वर का रूप।
नदियाँ पर्वत वृक्ष सभी से, मिलते हैं उपहार अनूप।।
सत्य सनातन पथ पर चलते, ईश्वर पर करते विश्वास।
सद्कर्मों पर चलकर प्राणी, करे स्वयं का ही उद्धार।।

बने ईश का प्रेम दीवाना, मन मंदिर का हो शृंगार।
सृष्टि रचयिता परमेश्वर ही, जीवन पथ करते उजियार।।

आस्था रखते सदा ईश पर, उनके नहीं दिलों में खोट।
कर्म मनुज का हो मर्यादित, नहीं किसी को देते चोट।।
अंतर्मन के वस्त्र उधेड़े, मन में उनके भरा विकार।
समय चक्र को समझे जो भी, हुआ उसी का बेड़ा पार।।

प्रीत पगे नयनों में छलके, नेह भरा ईश्वर का प्यार।
सृष्टि रचयिता परमेश्वर ही, जीवन पथ करते उजियार।।

*** लक्ष्मण लड़ीवाला 'रामानुज'



Sunday, 28 June 2026

उमड़-घुमड़ घन - कुण्डलिया

 

उमड़-घुमड़ घन छा गए, नभ में चारों ओर।
छम-छम छम-छम नाचते, पंख पसारे मोर।
पंख पसारे मोर, छटा अद्भुत मनहारी।
करें नगाड़े शोर, मचा कोलाहल भारी।
करतीं बूँदें नृत्य, बजातीं घुँघरू छन-छन।
दामिनि दुल्हन संग, चले हैं उमड़-घुमड़ घन।

मनहारी काली घटा, रजनी भरती पीग।
झिलमिल तारों से भरी, साड़ी लिपटी भीग।
साड़ी लिपटी भीग, सितारे गिरे धरा पर।
लगता मुक्ता-हार, फेंक छिप गया कलाधर।
गाएँ झींगुर गीत, हो रही वर्षा भारी।
नाचें दादुर मोर, दृश्य अद्भुत मनहारी।

*** डॉ. राजकुमारी वर्मा

Sunday, 21 June 2026

बात फूलों की - एक ग़ज़ल

 

प्यार की बात - बात फूलों की
किसने पूछी है जात फूलों की

दूर इंसान से हुआ इंसां
हर इबादत हयात फूलों की

दिन में महके हैं रात में महके
खिलखिलाती जमात फूलों की

इश्क़ काँटे समेटने आया
जा चुकी जब बरात फूलों की

ग़म-ए-दुनिया है ग़म का साया भी
कौन भूला है रात फूलों की

वक़्त मरहम लगा के छोड़ गया
ज़ख्म लिखते हैं घात फूलों की

छेद देता है होंठ से लकड़ी
कैद भँवरा है मात फूलों की
~~~~~~~~~~~
मदन मोहन शर्मा

Sunday, 14 June 2026

किसान

 

किसान
एक ऐसा मेहनती शख्स
जो बोता है उम्मीद सींचता है विश्वास
और काटता है संघर्ष
उसके हाथों की दरारों में
मौसमों का इतिहास लिखा होता है
उसके माथे पर चमकता पसीना
यूनिवर्सिटी की डिग्री से कम नहीं होता
वह हमेशा जागता रहता है
ओस की नमी और अंधेरे की चुप्पी के बीच
बादल उसके लिए कविता नहीं बल्कि
भाग्य का प्रश्न होते हैं और
बारिश उसके लिए रोमांस नहीं
रोटी का जुगाड़ होती है /है ना
कितनी अजीब बात जिसके हाथ
पूरे देश का पेट भरते हैं/अक्सर उसी
की थाली अधूरी रह जाती है
सूखा, बाढ़, कर्ज़ और बाज़ार
उसकी परीक्षा लेते हैं
फिर भी वह हार नहीं मानता
क्योंकि वह जानता है कि
जीवन का अर्थ संग्रह में नहीं
बेशक सृजन में है और किसान वह है
जो मिट्टी से सोना नहीं बनाता
बल्कि मिट्टी से जीवन बनाता है
जब भी किसी घर में
रोटी की खुशबू आती है
तब कहीं न कहीं
एक किसान का श्रम
मौन होकर मुस्कुराता है
पर एक सच तो यह भी है कि
धरती का सबसे उपेक्षित और निरीह
प्राणी किसान ही तो होता है
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
***राजेश कुमार सिन्हा

Sunday, 7 June 2026

कहानी अग्नि की

 

'अग्नि' उन्नति की कथा है, 'अग्नि' अवनति की कहानी।
यदि सृजन का मंत्र है यह, तो प्रलय की भी निशानी।

यज्ञ में हो प्रज्ज्वलित यह, देवता का भाग लेती।
शीत से व्याकुल धरा को, उष्णता का दान देती।
दीप बनकर पथ दिखाती, विश्व को यह ज्योति दानी,
'अग्नि' उन्नति की कथा है, 'अग्नि'अवनति की कहानी।

जब तपोबल बन धधकती, लक्ष्य कब रहता प्रतीक्षित।
चढ़ शिखर पुरुषार्थ के हों, प्राप्य सारे ही अभीप्सित।
किन्तु अनियंत्रित हुई तो, भस्म कर देती जवानी,
'अग्नि' उन्नति की कथा है, 'अग्नि' अवनति की कहानी।

क्रोध बनकर यदि भड़कती, तोड़ देती नेह बन्धन।
नष्ट होती सभ्यताओं, की बनी है मूक क्रन्दन।
बोल हो संयम सधे यदि, प्रेम की गंगा बहानी।
'अग्नि' उन्नति की कथा है, 'अग्नि'अवनति की कहानी।

*** सीमा गुप्ता 'असीम'

Sunday, 31 May 2026

जीवन का यह मंच - दोहे

 

अभिनय करते मंच पर, माटी के किरदार।
जीवन की अनुभूतियाँ, करते वो साकार।।

यह जग तो वह मंच है, जिसमें रंग अनेक।
कहीं कहकहे गूँजते, कही दर्द अतिरेक।।

निश्चित सबको छोड़ना, जीवन का यह मंच।
पर्दा गिरते ही मिटें, झूठे सभी प्रपंच।।

आदि-अन्त के मध्य को, मंच करे साकार।
इस जीवन के सत्य को, कहते हैं संसार।।

आया जो इस मंच पर, गूँजे उसका नाम।
हुआ अँधेरा बोलता, किरदारों का काम।।

करे उजागर मंच पर, सच को हर किरदार।
हरदम होती अंत में, सदा झूठ की हार।।

मंच आइना वक्त का, जिसमें जीवन काल।
विधिना के इस चक्र का, अम्बर बड़ा विशाल।।

*** सुशील सरना

Sunday, 24 May 2026

एक बेहतरीन ग़ज़ल - हो फ़लसफ़ा ऐसा

 

दुविधा रही मन में गहन अभ्यास के उपरांत भी
तरकश में तो इस जिंदगी के सज गए सिद्धांत भी

दर्शन यही लेकर सृजन भी कर रहा है पुण्य का
श्रम कर्मयोगी का रहा है वेद भी वेदांत भी

आधे - अधूरे ही रहे हैं हम शिखर पर क्या कहें
श्रेणी हमारी बुद्धिजीवी हो चुका दीक्षांत भी

जो सामयिक है सामना उसका सतह पर है कठिन
उपजी क्षणिक उत्तेजना ने कर दिया मन क्लांत भी

लगती बुरी आलोचना मशहूरियों के मध्य में
जो चढ़ चुका है आवरण रखता वही उद्भ्रांत भी

क्या युक्तियाँ मन में धरें जब नीतियाँ भी साथ हों
रख वर्जनाओं में हृदय हमने चुना एकांत भी

दिल चाहता है वो रहे बच्चों सा बिल्कुल निष्कपट
हो फ़लसफ़ा ऐसा सहज मेरे लिए दृष्टांत भी

*** मदन प्रकाश सिंह

Sunday, 17 May 2026

आख़िर क्यों - कड़वी हक़ीक़त की एक ग़ज़ल

 

नहीं है आस अपनों से नहीं अधिकार आख़िर क्यों
भरी आँखें मगर है प्यार का इज़हार आख़िर क्यों

ख़ुदा ने नेमतें प्यारी हमें बख़्शी हुईं लेकिन
कपट छल बेइमानी से भरा संसार आख़िर क्यों

कभी बेटी किसी पर बोझ तो होती नहीं फिर भी
उठा दी बेरहम हो बीच में दीवार आख़िर क्यों

बराबर हैं सभी इंसां न कोई फर्क इनमें है
तो फिर चारों तरफ ये ख़ून की बौछार आख़िर क्यों

दिखावा ख़ुदफ़रेबी का लगी कुछ होड़ है ऐसी
हुए मगरूर रिश्तों में अजब व्यवहार आख़िर क्यों

गए हो छोड़ कर जब से लगे वीरान ये दुनिया
सुकूनो चैन को खोकर पड़े मँझधार आख़िर क्यों

ठिकाना चंद दिन का है तमाशा कुछ घड़ी का है
भला फिर कर रहे भाई यहाँ तक़रार आख़िर क्यों

*** कान्ति शुक्ला


Sunday, 10 May 2026

'मान' सहित विश्वास जगाकर - एक गीत

गीत गुनेंगे सरगम अपने, नित्य नये अहसास जगाकर।
राष्ट्र चेतना रोम-रोम में, 'मान' सहित विश्वास जगाकर।

सरस लालिमा प्राचीरों पर,
आभा-मण्डल कर दे अर्पित।
मदिर मदिर तन पवन दुलारे,
माटी महके सोंधी सिंचित।
गुन-गुन का इकतारा छेड़े, चंचल भँवरे हास जगाकर।
राष्ट्र चेतना रोम-रोम में, 'मान' सहित विश्वास जगाकर।

विकट वेदना द्रुतगामी हो
राग-द्वेष को होम करें हम।
ऋण अनंत वसुधा के वीरों,
सिंहनाद को व्योम करें हम।
संस्कृति के सम्मान-मान से,नवल पंथ विन्यास जगाकर।
राष्ट्र चेतना रोम-रोम में, 'मान' सहित विश्वास जगाकर।

घिरी साँझ जो धरा गगन तक,
पथ दीप्तिमान करना प्रतिपल।
तरल तरंगित अंतस्तल में,
रत्नाकर सा होगा हलचल।
मंत्र मुग्ध सी करे रागिनी,”लता” अनछुई प्यास जगाकर।
राष्ट्र चेतना रोम-रोम में, 'मान' सहित विश्वास जगाकर।

*** डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी  

Sunday, 3 May 2026

सरतीति संसार: - एक गीत

 

यह माटी है यह सोना है, सुख-दुख का भण्डार है।
जिसने इसको जैसा देखा, वैसा यह संसार है।।
मेला लगा कहीं भक्तों का, संगम तट पर वास है,
कहीं नशे में चूर जवानी, जलती गीली घास है,
विश्वासों के बिछे गलीचे, छल-छद्मों का जाल है,
उगल रहे विष साॅंप दूध पी, दन्त गढ़ाते भाल है।

फूलों की घाटी के नीचे, दहक रहे अंगार है।
जिसने इसको जैसा देखा, वैसा यह संसार है।।

शांति - प्रेम - सद्भाव यहीं है, विश्व ग्राम का भाव भी,
मतभेदों के बीच उभरता, नव रिश्तों का चाव भी,
है आतंक - युद्ध -शोषण तो, मानवता का गान भी,
समृद्धि ने संस्कृति को बाँटें, गुप्त घाव का भान भी।

कहीं ज्ञान का विद्रुप मुख है, कहीं ज्ञान शृंगार है।
जिसने इसको जैसा देखा, वैसा यह संसार है।।

शाश्वत भी है मिथ्या भी है, व्यष्टि- समष्टि रूप यही,
क्षणभंगुर में नित जीवन है, वही कृषक है कृषि वही,
वही जगत के नाट्य मंच का, अभिनेता- निर्देशक है,
मनुज पीर का कुशल चितेरा, हँसता हुआ विदूषक है।

समझो तो जग ही ईश्वर है, ना मानो भंगार है।
जिसने इसको जैसा देखा, वैसा यह संसार है।।
~~~~~~~~~~~~~~~~~
*** मदन मोहन शर्मा

Sunday, 26 April 2026

जीवन के प्रश्नों का हल - एक गीत

 

उलझन कभी नहीं बतलाती, जीवन के प्रश्नों का हल।
शान्त हृदय से ही मिलते हैं, सुन्दर सुखद सुहाने पल।

बाधाओं से मुक्त नहीं हैं, अनजानी जीवन राहें।
जहाँ विपत्ति खड़ी रहती हैं, फैलाए अपनी बाहें।
नहीं दिखाई पड़ता हमको, इस नैराश्य सिन्धु का तल।
उलझन कभी नहीं बतलाती, जीवन के प्रश्नों का हल।

जब अशान्त हो अन्तर अपना, सुख का फूल नहीं खिलता।
उलझन के ताने-बाने का, कोई सिरा नहीं मिलता।
अवसादों का तमस् लिए कब, होगा मधुमय आगत कल।
उलझन कभी नहीं बतलाती, जीवन के प्रश्नों का हल।

नहीं आज में जीने देते, उलझन के ये चौराहे।
किंकर्तव्यविमूढ़ हुआ मन, जादू की लकड़ी चाहे।
किन्तु मिटेगी सारी उलझन पाकर आत्म शक्ति का बल।
उलझन कभी नहीं बतलाती, जीवन के प्रश्नों का हल।

*** सीमा गुप्ता 'असीम'

Sunday, 19 April 2026

प्राची प्रकट हुई भारत में, लेकर आज नया दिनमान - एक गीत

संसद में संवाद शुरू है, नारी है जिसका उन्वान।
प्राची प्रकट हुई भारत में, लेकर आज नया दिनमान॥

उषा लिए उम्मीद रश्मियाँ, पहुँच रही संसद के द्वार।
शोर मचा चहुँ ओर बढ़ रहा, भारत में नारी अधिकार।
किन्तु अभ्र आशंकाओं के, खड़ा अभी आभा को घेर।
साथ ग्रहण बन रूढ़ शक्तियाँ, करा रहे शुभक्षण में देर।
छ्द्म कोहरा फट जाएगा, आएगा ही नवल विहान।
प्राची प्रकट हुई भारत में, लेकर आज नया दिनमान॥

जल थल नभ के आयामों तक, नारी पहुँच रही है आज
रहा न कोई क्षेत्र बचा अब, जहाँ न भरती ये परवाज़।
अगर न्याय है तो आधा दो, ऐसा ही कहता दस्तूर।
दशम अंश दे उन्हें रखा है, संसद के चौखट से दूर।
भीख नहीं हक माँग रही है, लौटा दो उसका सम्मान।
प्राची प्रकट हुई भारत में, लेकर आज नया दिनमान॥

सिर्फ लुभावन वादे हैं या, सचमुच पुरुष हुआ गंभीर।
या नारी को चाप बना कर, मारा पुनः चुनावी तीर।
पहला बिल लेकर जब आया, लोक सभा चुनाव चौबीस।
कहा गया धर्य रख नारी, दूर नहीं है अब है उनतीस।
बंग जीतने की चाहत है, या होगा नारी उत्थान।
प्राची प्रकट हुई भारत में, लेकर आज नया दिनमान॥

*** शशि रंजन 'समदर्शी'

Sunday, 12 April 2026

मत्तगयंद सवैया - जयघोष

 

जीत लिया जिसने मन को वह वीर प्रवीर अधीर न होगा।

क्रोध प्रलोभन काम गुमान लिए मन मेल असीर न होगा।

सौम्य सुशील स्वभाव सुसज्जित और कहीं रणधीर न होगा।

भीतर धार लिया प्राण तो फिर और समान सुबीर न होगा।। 


जोश जागे रणतूर्य सुने असि ताल बजा जयघोष करे वो।

मौत नहीं भयभीत करे तब कौन कहे किस बात डरे वो।

नाद अगाध करे मुख से ललकार सुना मन भीति भरे वो।

यूढ़ पलायन शत्रु करें रण में जब पाँव अडोल धरे वो।। 


*** सूरजपाल सिंह, कुरुक्षेत्र 


Sunday, 5 April 2026

सौंदर्य - एक कवि का सच

 

तुम शब्दों से परे हो
फिर भी हर कवि तुम्हारा
उपयोग करना चाहता है। 
मानो, वह हवा को मुट्ठी में क़ैद कर
लेने पर आमादा हो,
मानो, आकाश को आँखों में समेट लेने
की उसकी ज़िद हो,
सौंदर्य तुम्हें देखने के लिए
आँखें नहीं/दृष्टि चाहिए
और दृष्टि भी वही
जिसका जन्म अन्तर्मन से हो
जो पूर्वाग्रहों से मुक्त हो
क्योंकि,  जब तक मापते रहेंगे तुम्हें 
त्वचा, आकार और मानकों से/ तब तक तुम
छूटते रहोगे हमारी पकड़ से,
एक अनाम/अनकहा/अनदेखा
सच बनाकर/सौंदर्य वस्तु नहीं/अनुभव हो
तुम दृश्य नहीं/ संवेदना हो
और शायद इसीलिए
तुम्हें पाया नहीं जाता है,
केवल महसूस किया जाता है। 

*** राजेश कुमार सिन्हा  

Sunday, 29 March 2026

पर्व की महत्ता - दोहे

 

पर्व बढ़ाते हैं सदा, सामाजिक सद्भाव।
पर्वों से रखना नहीं, मानव कभी दुराव।।

एक सूत्र में बाँधकर, पर्व रखें परिवार।
प्रेम और सौहार्द का, देते हैं उपहार।।

भारतीय त्योहार हैं, जीवन शैली अंग।
एक साथ जब बैठते, छेड़ें विविध प्रसंग।।

पर्व हमें देते सदा, खुशी और आनंद।
यही मानसिक शांति के, लिखते मधुमय छंद।।

संस्कृति और परंपरा, समझाते त्योहार।
नव उमंग उत्साह को, पर्व करें साकार।।

*** चंद्र पाल सिंह 'चंद्र'

नेह भरा ईश्वर का प्यार

  सृष्टि रचयिता परमेश्वर ही, जीवन पथ करते उजियार । जीवन दर्शन जो भी समझे, कुदरत का माने उपकार ।। माँ बापू ही ईश हमारे, नित उठ उनको करे प्रणा...