Sunday, 30 May 2021

तुम्हारा ब्रह्म हूँ मैं

 


तुम्हारी अकर्मण्यता का / ब्याज चुकाता हूँ मैं !
कारागृह से सागर गृह तक भागता हूँ मैं!
अघ -बक - तृण रूप / पाखण्डों से घिरा
तुम्हारी कामनाओं का पहाड़ उठाता हूँ मैं!
तुम्हारी वासना की बलिवेदी पर
यज्ञपशु बन विलपती
कन्याओं के अश्रु पोंछता हूँ मैं!
लहू और पवि से सना
तुम्हारे अहंकार की उर्वर भूमि में
क्षतविक्षत कराहता हूँ मैं!
तुम्हारी प्रतिज्ञाओं, वरों, और संकल्पों की
धीमी आंच में / प्रति पल जलता हूँ मैं!
तुम्हारे अधिकारों का स्वर बनकर
प्रेम- स्नेह- वात्सल्य की शीतल छांव
निष्ठुर हो छोड़ता हूँ मैं!
तुम्हारी कामुकता- लम्पटता के / कुत्सित यत्नों की चौसर पर
मोहरा बनता हूँ मैं!
और एक दिन तुम्हारी कायरता के दंश को
अपने तलवों में सहता हूँ मैं!
इसीलिए तुम्हारा ईश्वर हूँ मैं!
हाँ, तुम्हारा ब्रह्म हूँ मैं!!
°°°°°°°°°
डॉ.मदन मोहन शर्मा
सवाई माधोपुर, राज.

Sunday, 23 May 2021

मदद

 


मदद नहीं माँगी थी
अधिकार माँगे थे हमने।
सपने नहीं माँगे थे
सत्य के आधार माँगे थे हमने।
सुबह-शाम दो रोटी देकर
हमारा पेट भरने की कोशिश मत करना,
काम चाहिए, सम्मान चाहिए,
सत्कार माँगा था हमने।
उजड़ गये या उजाड़ दिये गये,
समझ नहीं आया हमें कभी,
लेकिन इतना तो जानते ही हैं
कि तुम्हारे सच हुए सपनों में,
हमारे ही हाथों ने
हर बार मदद की थी तुम्हारी।
कभी अंगूठा लगाकर,
कभी अंगुली दबाकर,
कभी हाथों को तुम्हारे पास गिरवी रखकर।
गुरूर मत करना
कि गगन को छू रहे हो तुम,
भूलना मत
कि हमारे ही हाथों पर खड़े हो तुम।
हमारी हवाओं की कीमत
तुम्हें चुकानी पड़ेगी।
आज नहीं तो कल
अपनी हक़ीक़त से टकराओगे तुम,
गगन से धरा पर आओगे तुम,
तब ज़रूर मदद करेंगे तुम्हारी।

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*** कविता सूद ***

Sunday, 16 May 2021

ख़ुशी



ख़ुशी नहीं आती है घर में, बात आपकी है निर्मूल।
बड़ी ख़ुशी की चाहत में हम, छोटी ख़ुशियाँ जाते भूल।।
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ख़ुशी झाँकती है जब घर में, बंद अर्गला कर लेते हम।
और उजाले के बदले में, घर में हम भर लेते हैं तम।
ख़ुशी सामने खड़ी हमारे, फिर भी देती नहीं दिखाई,
नदी किनारे बैठे बैठे खोज रहे होते हैं शबनम।
यही वजह है अक्सर चुभते जीवन में दुःखों के शूल।
बड़ी ख़ुशी की चाहत में हम छोटी ख़ुशियाँ जाते भूल।।
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सोचा है क्या बिटिया अपने जब कंधे पर चढ़ जाती है।
उसकी नन्हीं बाहें अपनी जब गर्दन को सहलाती है।
तुतलाकर कुछ भी कह जाना हमको अक्सर करता है ख़ुश,
और बोलती जब माँ-पापा चारों तरफ ख़ुशी छाती है।
बरसाते जीवन में ख़ुशियाँ घर में अक्सर नन्हे फूल।
बड़ी ख़ुशी की चाहत में हम छोटी ख़ुशियाँ जाते भूल।।
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दौलत का अम्बार ख़ुशी का लोग समझते होता वाहक।
लेकिन सच में तो धन ज्यादा ख़ुशियों में होता है बाधक।
धन से क्रय होती है चीजें नहीं ख़ुशी के सौदे सम्भव,
बिना ज़रूरत ज्यादा धन के लोग भागते पीछे नाहक।
प्रेम भरे रिश्ते हो जाते धन से ख़ुशियों के प्रतिकूल।
बड़ी ख़ुशी की चाहत में हम छोटी ख़ुशियाँ जाते भूल।।
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ख़ुशी नहीं आती है घर में बात आपकी है निर्मूल।
बड़ी ख़ुशी की चाहत में हम छोटी ख़ुशियाँ जाते भूल।।
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गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' बीकानेरी

Monday, 10 May 2021

सुषमा अमित अपार

 


 प्राची ने सिंदूर बिखेरा, मनहर बही बयार।
दिग-दिगंत तक फैल रही है, सुषमा अमित अपार।।
लगी हुई है कुंकुम बिंदी, नागरि ऊषा भाल,
अथवा झीने पट से झाँके, अरुणिम आभा गाल,
बंदनवार सजाए किंशुक, जगती करे सिंगार,
दिग-दिगंत तक फैल रही है, सुषमा अमित अपार।

तरल तरंगित कल कल करते, बहते नीर प्रपात,
स्वर्ण रश्मियाँ जगा रही हैं, सुप्त सभी जलजात,
पंख पसारे धायी तितली, भ्रमर करें गुंजार,
दिग-दिगंत तक फैल रही है, सुषमा अमित अपार।
भोर धरा पर उतर रही है, खोले स्वर्णिम केश,
आभा उसकी देख व्योम में, लजा गया राकेश,
मंगल गान कोकिला गाती, आयी अमल बहार,
दिग-दिगंत तक फैल रही है, सुषमा अमित अपार।

चन्द्र पाल सिंह "चन्द्र"

Sunday, 2 May 2021

आशा तारा

 


हरदम टिमटिम, करता-रहता, मन दमके।
मन के नभ में, आशा तारा, बन चमके॥
🌸
सब कहते हैं, दुनिया नश्वर, जग छलना।
पर जो देखूँ , सब सच लगता, मत हँसना।
आसमान-नग, पेड़-नदी-वन, घन बिखरे...
लगे प्रकृति यह, झूठ कभी क्या, सच कहना।
नयी निर्झरी, से कुछ नूतन, आ धमके।
मन के नभ में, आशा तारा, बन चमके॥
🌸
कितनी सुन्दर, है यह दुनिया, नैन भरो।
पर्यावरण न, नष्ट करो अब, ध्यान धरो।
ये पर्वत-वन, ये नदियाँ सब, हैं अपनी...
इनकी रक्षा, करना अपना, कर्म करो॥
उम्मीदों के, फल-फूलों से, जग गमके।
मन के नभ में, आशा तारा, बन चमके॥
🌸
दुर्धर्ष अचल, तुम शिलाखंड, पर्वत से।
युगों-युगों से, अचल तपस्वी, मूरत से।
पुष्प गुच्छ मृदु, उर में निर्झर, मरुधर से...
देख हृदय की, सहज सरसता, सब नत से॥
करो भरोसा, सदा स्वयं पर, तुम जम के।
मन के नभ में, आशा तारा, बन चमके॥
🌸
कुन्तल श्रीवास्तव, मुंबई

जीवन है संगीत - एक गीत

  शाश्वत गुंजित प्रणवाक्षर का, सतत् चल रहा गीत। उतर मौन में सुनो ध्यान से, जीवन है संगीत। चले समीरण सर-सर सर-सर, गाती है निर्भ्रांत। जल सरित...