Tuesday, 9 May 2017

हे! कर्मवीर

 
हे! कर्मवीर, श्रम देवपुरुष, हे! सर्जक, साधक, प्रतिपालक,
हे! सृष्टि समर के गणनायक, हे! जन गण मन के अधिनायक,
मैं कर्म योग का परिकल्पन, नैनों में धरने आई हूँ,
औ कर्म महत्ता जन जन के, अन्तस घट भरने आई हूँ


श्रम स्वेद नीर से ही सिंचित, धरणी की सारी काया है,
कब हाथ हिलाए बिन बोलो, दाना मुख तक भी आया है,
जैसा जिसने बोया पाया, यह नियम अटल है धरती पर,
प्रारब्ध न गले लगाता फिर, जो बैठा कर पर कर धर कर,
खुशबू हूँ सद्कर्मो की मैं, हर सदन बिखरने आई हूँ।


आध्यात्म, तपस्या, अनुशीलन,सन्यास अपरिग्रह, आत्मबल,
हैं कर्म साधना रूप अलग, करते मानव को सुदृढ़, सबल,
श्रद्धा, विश्वास, भक्ति आशा, हर कर्म मूल मन का दर्पण,
निज अहम बैर के भावों का, कर मानस गंगा में तर्पण,
मैं कर्म देविका जन जन के, कर कमल सँवरने आई हूँ।

धरणी, अम्बर, सूरज, तारे, अविराम सदा पथ पर चलते,
हैं कल्प करोड़ों बीते पर, देखा है क्या इनको थकते,
रावण हंता श्रीराम प्रभो, या कृष्ण सुदर्शनधारी हैं,
निज कर्म यज्ञ प्रतिपालन को, धरणी पर ये अवतारी हैं,
इस देव धरा के कण कण में, उत्फुल्ल विचरने आई हूँ।


***** दीपशिखा सागर

2 comments:

  1. वाआआह दीदी
    बहुत सुंदर कविता ग्रेट

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    1. बहुत-बहुत आभार ब्लॉग पर आने के लिए आदरणीय रोहिताश्व मिश्रा जी। इसी प्रकार उत्साहवर्धन करते रहें। सादर नमन

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