Sunday, 25 September 2016

पीले बादल



बादल पीले हो गए, कैसी यह तस्वीर।
वृक्ष अकेला है खड़ा, ज्यों फूटी तकदीर।।
ज्यों फूटी तकदीर, कि जैसे कुदरत रूठी।
तौबा हर शै आज, मुझे लगती है झूठी।
कहे रजत घबराय, कभी थे नीले नीले।
जाने क्या है राज़, हुए जो बादल पीले।।
==========================
*** गुरचरन मेहता 'रजत'

No comments:

Post a Comment

बचपन

जो किसी भी लालसा से मुक्त होगा सच कहें तो बस वही उन्मुक्त होगा हो नहीं ईर्ष्या न मन में द्वेष कोई हो न अभिलाषा-जनित आवेश कोई कुछ ...