Sunday, 4 September 2016

क्या है ज़िन्दगी? - एक गीत




जाने क्यूँ हर रिश्ता मुझको बेगाना सा लगता है
फूलों की ख़ुशबू से माली अनजाना सा लगता है


कभी सुखों से झोली भरती
कभी दुखों से गागर
प्यासा हर इंसान यहाँ पर
प्यासा प्यासा सागर
कभी गुनगुनी लगे ज़िंदगी 
कभी धूप सी तीखी
कभी नीम सी और कभी यह
लगती सुधा सरीखी

जाने क्यूँ हर आँगन मुझको वीराना सा लगता है
फूलों की ख़ुशबू से माली अनजाना सा लगता है

इक दिन पंछी उड़ जाते हैं
आसमान में ऊँचे
याद नहीं रहते फिर उनको
वो बचपन के कूँचे
वृक्ष अकेला रह जाता है
मृत्यु नहीं पर आती
गिन-गिन कर साँसे वो लेता
जान न लेकिन जाती

सजा हुआ ईंटों का घर भी बुतखाना सा लगता है 
फूलों की ख़ुशबू से माली अनजाना सा लगता है

दर्पण में ख़ुद को देखो तो
कमी न देखी जाती
प्रीत अगर सच्ची आँखों में
नमी न देखी जाती
सूरत इक दिन बिगड़ेगी, जो
लगता रूप सलोना
मन से मन जो मिल जाए तो
समझो सच्चा सोना

डाली का भी पत्ता-पत्ता दीवाना सा लगता है
फूलों की ख़ुशबू से माली अनजाना सा लगता है
 
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***** गुरचरन मेहता "रजत"

4 comments:

  1. Wah, Shandar Rachana. Aadaraneey Mehata ji ko Hardik badhai.

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  2. ह्र्दय से आभार आदरणीय धर साहब । नमन ।

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  3. अति सुंदर रचना

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    1. बहुत-बहुत आभार आपका आदरणीया.

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