Sunday, 5 April 2026

सौंदर्य - एक कवि का सच

 

तुम शब्दों से परे हो
फिर भी हर कवि तुम्हारा
उपयोग करना चाहता है। 
मानो, वह हवा को मुट्ठी में क़ैद कर
लेने पर आमादा हो,
मानो, आकाश को आँखों में समेट लेने
की उसकी ज़िद हो,
सौंदर्य तुम्हें देखने के लिए
आँखें नहीं/दृष्टि चाहिए
और दृष्टि भी वही
जिसका जन्म अन्तर्मन से हो
जो पूर्वाग्रहों से मुक्त हो
क्योंकि,  जब तक मापते रहेंगे तुम्हें 
त्वचा, आकार और मानकों से/ तब तक तुम
छूटते रहोगे हमारी पकड़ से,
एक अनाम/अनकहा/अनदेखा
सच बनाकर/सौंदर्य वस्तु नहीं/अनुभव हो
तुम दृश्य नहीं/ संवेदना हो
और शायद इसीलिए
तुम्हें पाया नहीं जाता है,
केवल महसूस किया जाता है। 

*** राजेश कुमार सिन्हा  

Sunday, 29 March 2026

पर्व की महत्ता - दोहे

 

पर्व बढ़ाते हैं सदा, सामाजिक सद्भाव।
पर्वों से रखना नहीं, मानव कभी दुराव।।

एक सूत्र में बाँधकर, पर्व रखें परिवार।
प्रेम और सौहार्द का, देते हैं उपहार।।

भारतीय त्योहार हैं, जीवन शैली अंग।
एक साथ जब बैठते, छेड़ें विविध प्रसंग।।

पर्व हमें देते सदा, खुशी और आनंद।
यही मानसिक शांति के, लिखते मधुमय छंद।।

संस्कृति और परंपरा, समझाते त्योहार।
नव उमंग उत्साह को, पर्व करें साकार।।

*** चंद्र पाल सिंह 'चंद्र'

Sunday, 22 March 2026

ईश्वर का वरदान - वृक्ष

 

पेड़ों से धरती की शोभा, कहते संत सुजान।
पेड़ लगाएँ पेड़ लगाएँ, मिलकर सब इंसान।।
इनसे लाभ बहुत हैं हमको, कहता है विज्ञान।
हरे पेड़ को नहीं काटना, हो भारी नुकसान।।

प्राण वायु मिलती है इनसे, जो जीवन आधार।
बात मान लो मेरी भाई, करो वृक्ष से प्यार।।
पशुओं को देते ये भोजन, ठंडी छाँव अपार।
खग-वृंदो के नीड़ यही हैं, सबका है उपकार।।

औषधि के भंंडार यही हैं, करते हमें निरोग।
भारत भू पर करते आए, हम इनका उपयोग।।
पुष्प फलों के हैं ये दाता, ईश्वर के वरदान।
कई तरह से पूरे करते, हम सबके अरमान।।

वेद हमें समझाते आए, देव इन्हें लो मान।
वृक्ष काटना बड़ा पाप है, बनें नहीं नादान।।
जनसंख्या अभिशाप बन रही, उजड़े हैं वन खूब।
जंगल को हम खूब बढ़ाएँ, बन करके महबूब।।
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*** मुरारि पचलंगिया

Sunday, 15 March 2026

युद्ध का पर्याय जीवन हो गया है - एक गीत

 


युद्ध का पर्याय जीवन हो गया है।
दर्प में आघात का व्रण बो गया है।

पाथ चुनते हैं समर का स्वार्थ में जो।
व्यग्र होती चेतना मृतप्राय हैं वो।
भार ले उत्तेजना को ढो रहा तन।
अनवरत अधिकार लोलुपता भरा मन।
आदि का सुर-ताल बेबस सो गया है।

युद्ध का परिणाम विध्वंसक सदा ही।
प्रति दिशा भयभीत रहती है कदा ही।
कृष्ण ला्ते शांति का प्रस्ताव पावन।
ठानता जो बैर वो है दुष्ट रावन।
भाव कुंठित करुण रस को धो गया है।

द्वेष पारावार अंतस को गलाता।
छेड़ता संग्राम निज प्रतिभा छलाता।
हैं बरसते क्रोध में जो अग्नि के कण।
क्षार करते हैं सभी संवाद के पण।
अंत का अध्याय जैसे खो गया है।
युद्ध का पर्याय जीवन हो गया है।

*** सुधा अहलुवालिया

 


Sunday, 8 March 2026

होली के रंग - कुण्डलिया छंद

 

तन को सतरंगी करें, ये होली के रंग।
मन उत्फुल्लित उछलता, ऐसी उठे तरंग।
ऐसी उठे तरंग, खुशी लहराती लहरे।
दुख नैराश्य विषाद, दूर तक कहीं न ठहरे।
मिटा मनों का मैल, एक कर देती मन को।
पिचकारी की धार, हृदय सँग रँगती तन को।
समरसता में घोलता, जीवन का जो रंग।
हो हुल्लड़ के साथ है, होली का हुड़दंग।
होली का हुड़दंग, पहन फूलों के गजरे।
गालों मले गुलाल, चेहरे हैं चितकबरे।
खाते हैं मिष्ठान्न, भेद बिन सब समता में।
होली का त्यौहार, भरे रँग समरसता में।
डॉ. राजकुमारी वर्मा

Sunday, 1 March 2026

ज़िंदगी का सच - मुक्तक

 

उसूलों की लड़ाई में, मुहब्बत हार जाती है।
फरेबी हो अगर सज़दे, इबादत हार जाती है।।
जिसे छलना फ़क़त आता, हिमायत वो करे सच की,
यही दस्तूर दुनिया का, शराफ़त हार जाती है।।

कहीं पर प्यार बिकता है, कहीं ईमान बिकता है।
खरीदोगे अगर तुम भी, जहाँ में ज्ञान बिकता है।।
शराफ़त की सभी बातें, किताबी फलसफ़ा यारों,
हक़ीक़त नोट की समझो, यहाँ इन्सान बिकता है।।

*** विजय मिश्र दानिश


Sunday, 22 February 2026

उर्वर भू यह भारत की - एक गीत

 

संतों की यह पावन धरती, अखिल जगत में न्यारी है।
मातृभूमि को माता कहते, जन्म दिया बलिहारी है।।

कलकल करती बहे जहाँ पर, नदियों की पावन धारा।
जम्बू द्वीपे आर्याव्रत का, कहलाता था यह प्यारा ।।
हिम किरीट सा श्वेत हिमालय, हरित उर्वरा धरणी है।
कलकल करती नदियाँ बहती, लगती कितनी प्यारी है।।

रवि की किरणें यहाँ भूमि पर, नित स्वर्णिम रूप बिखेरे।
अलख जगाने हुए यहाँ पर, कितने ही सन्त चितेरे।।
जन्में वीर हजारों कितने, उर्वर भू यह भारत की।
सदा शत्रुओं से रक्षा करने, सदा रही तैयारी है।।

वायु नीर क्यों करे प्रदूषित, श्वास कहाँ जाकर लेना।
भारत भू के जंगल पर्वत, और नहीं कटने देना।।
भरा खजाना भारत माँ का, अब कोई लूट न पाए।
इसे बचा कर्त्तव्य निभाना, निश्चित जिम्मेदारी है।।

*** लक्ष्मण लड़ीवाला 'रामानुज'

Sunday, 15 February 2026

सबके पालन हार - एक गीत

 

सत्य सनातन नाम ईश का, सबके पालन हार।
सनद साधना डगमग है प्रभु, हाथ गहो पतवार।

जग के हो आराध्य देव तुम, चित्तवृत्ति अविनाश।
यही कल्पना युग मन्वंतर, अरि को करे निराश।
भूल रहें जो वेद ऋचाएँ, वंशज हैं हम आर्य,
अविनाशी को कहे सनातन, पंच तत्व में सार।

भेदभाव मतिसुप्त करें जो, क्षुद्र हृदय भयभीत।
धीर धरे साधक मन मंदिर, सुखकर ये संगीत।
रही सदी से मुखर चेतना, बढ़ा रहे संताप,
अंश अनागत समझ न पाये, विकल नीति आधार।

महिमा करें बखान पुण्यपथ, राम-रमा अनिकेत।
मर्यादा को लाँघा जिसने, दुष्ट हृदय समवेत।
क्षुद्र ग्रहों की भाँति मिटेंगे, कालनेमि सम दैत्य,
संस्कृति का आधार तुम्हीं हो, हे मेरे करतार।

*** डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

Sunday, 8 February 2026

ब्रह्म का स्वरूप माँ

 

सौम्य प्रेम,शील,क्षेम का विशुद्ध रूप माँ।
जीव तत्व में विभक्त ब्रह्म का स्वरूप माँ।

दण्ड दे दुलारती, भविष्य को सँवारती।
कण्ठ से लगा कभी ममत्व से निहारती।
क्षीर के प्रसाद से भरा प्रणम्य कूप माँ।
जीव तत्व में विभक्त ब्रह्म का स्वरूप माँ।

कोमलांगिनी, सुभाषिनी,अगाध वत्सला।
शौर्य से बनी कभी सशक्त ढाल अर्गला।
कष्ट वृष्टि में लगे सदा सुरम्य धूप माँ।
जीव तत्व में विभक्त ब्रह्म का स्वरूप माँ।

आदि है अनंत है, अशेष है, विशेष है।
सृष्टि के प्रसार का पुनीत शेष, श्लेष है।
कोटि-कोटि सूर्य चन्द्र सी अगम्य भूप माँ।
जीव तत्व में विभक्त ब्रह्म का स्वरूप माँ।

*** अर्चना सिंह 'अना'

Sunday, 1 February 2026

प्रेम ही मोक्ष है - एक गीत

 

प्रेम ही प्राण है प्रेम ही श्वास है प्रेम पर ही टिका ये धरा ये गगन।

प्रेम ही शांति है प्रेम ही मोक्ष है प्रेम को ही हृदय कर रहा है नमन।

प्रेम से जीव है प्रेम से है जगत प्रेम से ईश है प्रेम से भक्ति है।
प्रेम ही भुक्ति है प्रेम ही मुक्ति है प्रेम कैवल्य है प्रेम ही शक्ति है।
प्रेम ही वंदना प्रेम ही अर्चना प्रेम अद्वैत है प्रेम ही है मिलन।
प्रेम ही शांति है प्रेम ही मोक्ष है प्रेम को ही हृदय कर रहा है नमन।

प्रेम ही प्यास है प्रेम ही तृप्ति है प्रेम ही भावना का अगम सिंधु है,
प्रेम से आचमन मन हमेशा करे प्रेम ही भाव का उच्चतम बिंदु है।
प्रेम के पान से प्रेम के मान से मिट सकेगी हृदय की अमिट यह तपन।
प्रेम ही शांति है प्रेम ही मोक्ष है प्रेम को ही हृदय कर रहा है नमन।

प्रेम ही धर्म है प्रेम ही कर्म है प्रेम की रागनी गा रहे ग्रंथ हैं
प्रेम ही सार है इस सकल सृष्टि का प्रेम से ही सजे भाव मय पंथ हैं।
बाँध सकता बताओ भला प्रेम को कामना से भरा यह अधूरा बदन।
प्रेम ही शांति है प्रेम ही मोक्ष है प्रेम को ही हृदय कर रहा है नमन।

*** सीमा गुप्ता 'असीम'

एक गीत - यह महा-श्मशान है

 

घाट है मणिकर्णिका यह, रुद्र का वरदान है।
दिन-रात जलती है चिता, यहाँ महा-श्मशान है॥

मंत्र दें तारक यहाँ शिव, हर मृतक के कान में।
मोक्ष का खुल द्वार जाता, मरघट के वितान में।
मंत्र शिव का मृतक के हित, मोक्ष का वरदान है।
दिन-रात जलती है चिता, यहाँ महा-श्मशान है॥1॥

विविध रूपों में अघोरी, अर्द्ध रात्रि मसान में।
साधना शक्ति की करते, वाम मार्ग विधान में।
भूत-प्रेत-निशाचरों का, मसान एक छान है।
दिन-रात जलती है चिता, यहाँ महा-श्मशान है॥2॥

घाट पर गंगा के हरपल, आ रहे हैं शव नये।
शवदाह करने अग्नि ले, 'कर' चुका परिजन गये।
डोम राजा का यहाँ पर, नृप सदृश् सम्मान है।
दिन-रात जलती है चिता, यहाँ महा-श्मशान है॥3॥

*** कुन्तल श्रीवास्तव

Sunday, 18 January 2026

आरम्भ

 

आरम्भ कोई शोर नहीं करता

वह अक्सर एक

गहरी चुप्पी में जन्म लेता है

जैसे रात के खत्म होने पर

अँधेरे को इत्तिला दिए बिना ही

सुबह की किरणें आ जाती हैं

आरम्भ बीते हुए का खंडन नहीं

बल्कि उसे सहलाती हुई

एक नई स्वीकृति है

मानों टूटे भरोसों की राख में

कहीं दबा हुआ

एक जीवित बीज!

आरम्भ

साहस से पहले का भय है

और भय के बाद की

सामान्य होती सांसे

यह वही क्षण है

जब मन

हार को स्वीकार कर

आगे बढ़ने का

पहला कदम रखता है!

आरम्भ

अंत का विरोध नहीं

उसका सबसे सटीक उत्तर है!


*** राजेश कुमार सिन्हा

 


Saturday, 10 January 2026

तब बनते हैं शंकर - गीत

 

निजी स्वार्थ के हेतु शक्ति सब, पाले मन के अंदर।
विष का प्याला पीना पड़ता, तब बनते हैं शंकर।।
करे समाहित उदिध सभी को, सरिता जो भी आई।
हृदय-सिंधु में कहाँ मनुज के, सागर सी गहराई।।
सदा विश्व कल्याण भावना, नहीं भरे अभ्यंतर।
निजी स्वार्थ के हेतु शक्ति सब, पाले मन के अंदर।।
ताकतवर निज कोष लुटाता, विश्व-धरा हरसाने।
मानव नित सामान जुटाता, लोगों को तड़पाने।।
किसी अहिल्या लाज लूटने, बनता नित्य पुरंदर।
निजी स्वार्थ के हेतु शक्ति सब, पाले मन के अंदर।।
तृषित धरा की प्यास बुझाने, वास्पित हुआ हमेशा।
सुख-दुख में समभाव रखे नित, देता यही सँदेशा।।
मनुज स्वार्थ की पूर्ति हेतु ही, रहता लगा निरंतर।।
निजी स्वार्थ के हेतु शक्ति सब, पाले मन के अंदर।।
*** चंद्र पाल सिंह 'चंद्र'

Sunday, 4 January 2026

नववर्ष पर दोहा सप्तक

 

खुशियों से भरपूर हो, नवल धवल हर भोर।
नव सुख की नव वर्ष में, बढ़ती जाए डोर।।1।।

मंगलमय नव वर्ष हो, हर पल हो खुशहाल।
प्रीत बढ़े नफरत मिटे, हर्ष भरा हो साल।।2।।

आगत का स्वागत करें, बढ़ें विगत को छोड़।
मची नये संकल्प की, नये साल में होड़।।3।।

मंथन बीते वर्ष पर, करना है बेकार।
नयी सोच से कीजिए, कल का नव शृंगार।।4।।

बिसरा बीती बात को, नूतन कर संकल्प।
श्रम से नव निर्माण का, कोई नहीं विकल्प।।5।।

नये साल की भोर का, सुखद सुहाना रूप।
फैले नूतन वर्ष में, हर पल सुख की धूप।।6।।

नया वर्ष सबका हरे, जीवन से संताप।
खुशहाली से ही सदा, होते बन्द प्रलाप।।7।।

*** सुशील सरना

सौंदर्य - एक कवि का सच

  तुम शब्दों से परे हो फिर भी हर कवि तुम्हारा उपयोग करना चाहता है।  मानो, वह हवा को मुट्ठी में क़ैद कर लेने पर आमादा हो, मानो, आकाश को आँखों ...