तुम शब्दों से परे हो
Sunday, 5 April 2026
सौंदर्य - एक कवि का सच
Sunday, 29 March 2026
पर्व की महत्ता - दोहे
Sunday, 22 March 2026
ईश्वर का वरदान - वृक्ष
Sunday, 15 March 2026
युद्ध का पर्याय जीवन हो गया है - एक गीत
युद्ध का पर्याय जीवन हो गया है।
दर्प में आघात का व्रण बो गया है।
पाथ चुनते हैं समर का स्वार्थ में जो।
व्यग्र होती चेतना मृतप्राय हैं वो।
भार ले उत्तेजना को ढो रहा तन।
अनवरत अधिकार लोलुपता भरा मन।
आदि का सुर-ताल बेबस सो गया है।
युद्ध का परिणाम विध्वंसक सदा ही।
प्रति दिशा भयभीत रहती है कदा ही।
कृष्ण ला्ते शांति का प्रस्ताव पावन।
ठानता जो बैर वो है दुष्ट रावन।
भाव कुंठित करुण रस को धो गया है।
द्वेष पारावार अंतस को गलाता।
छेड़ता संग्राम निज प्रतिभा छलाता।
हैं बरसते क्रोध में जो अग्नि के कण।
क्षार करते हैं सभी संवाद के पण।
अंत का अध्याय जैसे खो गया है।
युद्ध का पर्याय जीवन हो गया है।
*** सुधा अहलुवालिया
Sunday, 8 March 2026
होली के रंग - कुण्डलिया छंद
Sunday, 1 March 2026
ज़िंदगी का सच - मुक्तक
Sunday, 22 February 2026
उर्वर भू यह भारत की - एक गीत
Sunday, 15 February 2026
सबके पालन हार - एक गीत
Sunday, 8 February 2026
ब्रह्म का स्वरूप माँ
Sunday, 1 February 2026
प्रेम ही मोक्ष है - एक गीत
प्रेम ही प्राण है प्रेम ही श्वास है प्रेम पर ही टिका ये धरा ये गगन।
एक गीत - यह महा-श्मशान है
Sunday, 18 January 2026
आरम्भ
आरम्भ
कोई शोर नहीं करता
वह
अक्सर एक
गहरी
चुप्पी में जन्म लेता है
जैसे
रात के खत्म होने पर
अँधेरे
को इत्तिला दिए बिना ही
सुबह
की किरणें आ जाती हैं
आरम्भ
बीते हुए का खंडन नहीं
बल्कि
उसे सहलाती हुई
एक नई
स्वीकृति है
मानों
टूटे भरोसों की राख में
कहीं
दबा हुआ
एक
जीवित बीज!
आरम्भ
साहस
से पहले का भय है
और भय
के बाद की
सामान्य
होती सांसे
यह वही
क्षण है
जब मन
हार को
स्वीकार कर
आगे
बढ़ने का
पहला
कदम रखता है!
आरम्भ
अंत का
विरोध नहीं
उसका
सबसे सटीक उत्तर है!
*** राजेश
कुमार सिन्हा
Saturday, 10 January 2026
तब बनते हैं शंकर - गीत
Sunday, 4 January 2026
नववर्ष पर दोहा सप्तक
सौंदर्य - एक कवि का सच
तुम शब्दों से परे हो फिर भी हर कवि तुम्हारा उपयोग करना चाहता है। मानो, वह हवा को मुट्ठी में क़ैद कर लेने पर आमादा हो, मानो, आकाश को आँखों ...
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पिघला सूर्य , गरम सुनहरी; धूप की नदी। बरसी धूप, नदी पोखर कूप; भाप स्वरूप। जंगल काटे, चिमनियाँ उगायीं; छलनी धरा। दही ...
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सिर शोभित हेम किरीट गजानन मूषक वाहन प्रेम करे। उपवीत मनोहर कंध पड़ा अरु मोदक के कर थाल धरे। फल में प्रिय जामुन कैथ लगें उर पाटल फूल...










