सौम्य प्रेम,शील,क्षेम का विशुद्ध रूप माँ।
जीव तत्व में विभक्त ब्रह्म का स्वरूप माँ।
दण्ड दे दुलारती, भविष्य को सँवारती।
कण्ठ से लगा कभी ममत्व से निहारती।
क्षीर के प्रसाद से भरा प्रणम्य कूप माँ।
जीव तत्व में विभक्त ब्रह्म का स्वरूप माँ।
कोमलांगिनी, सुभाषिनी,अगाध वत्सला।
शौर्य से बनी कभी सशक्त ढाल अर्गला।
कष्ट वृष्टि में लगे सदा सुरम्य धूप माँ।
जीव तत्व में विभक्त ब्रह्म का स्वरूप माँ।
आदि है अनंत है, अशेष है, विशेष है।
सृष्टि के प्रसार का पुनीत शेष, श्लेष है।
कोटि-कोटि सूर्य चन्द्र सी अगम्य भूप माँ।
जीव तत्व में विभक्त ब्रह्म का स्वरूप माँ।
*** अर्चना सिंह 'अना'

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