भावनाओं से भरे,
अवसाद का न अन्त है।
बिलख उठती पीड़ा विरह की,
यामिनी में जब कभी,
जान पगले! अर्थ इसका,
कितना हृदय संताप है।
विरह का मतलब समझ
पगले! मेरा उर क्लांत है।
चाँदनी बिखरी धरा पर,
अग्नि क्यों बरसा रही।
गात जलता अग्नि सम,
क्यों दहकती जा रही।
बरसते उत्पल नयन,
ये वेदना का ताप है।
विरह का मतलब समझ,
पगले! मेरा उर क्लांत है।
अभिलाषाएं करवट ले रहीं,
वेदना के ज्वार से।
अश्रु से पलकें जो भीगी,
क्यों व्यथित थी प्यार से।
दुःख से आहत हृदय में,
न कोई झंकार है।
विरह का मतलब समझ,
पगले! मेरा उर क्लांत है।
पीड़ा मेरी सो गई,
मैं, निशा जगती रही।
वेदना की ले हिलोरें,
रात-भर जलती रही।
प्रतिबिम्वित होता तारकों में,
ये छलना का उत्पात है।
विरह का मतलब समझ,
पगले! मेरा उर क्लांत है।
*** कुसुम शर्मा "उमंग" ***
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