Sunday, 25 August 2019

दुर्मिल सवैया


 
(विधान - सगण (११२)× 8 = 24 वर्ण प्रति चरण, 12-12 वर्ण पर यति, चार चरण सम तुकांत)

घनघोर घटा मन आँगन में, तन मोर प्रकम्पित वायु करे।
तलवार दिखाय रही चपला, यह देखि सखी मन मोर डरे।।
जब सावन में बदरा बरसे, लगता नभ नैनन नीर झरे।
मनमोहन छोड़ गये जबसे, रसना रटती हर श्वास हरे।।


बहती शुचि शीतल मंद हवा, मन गीत सुहावन गावत है।
दृग खोलि हँसे फुलवा मन के, प्रिय आय रहे बतलावत है।।
मन मोर हवा सँग में उड़ता, बँसिया ब्रजनाथ बजावत है।
अब चैन न आय उमंग भरी, लगता घनश्याम बुलावत है।।


*** चन्द्र पाल सिंह "चन्द्र" ***

Sunday, 18 August 2019

स्वतन्त्रता का गीत

 
युगों युगों से चल रही, उत्सव की यह रीत,
आजादी का पर्व है, गाओ मंगल गीत।

घोर गुलामी में रहे, बहुत हुए बर्बाद,
संघर्षों के बाद ही, आज हुए आजाद,

भारत माँ को है नमन, जगी सभी में प्रीत,
आजादी का पर्व है, गाओ मंगल गीत।


कुर्बानी जो दे गये, सदा रहेंगे याद,
इसका प्रतिफल ये मिला, सब होंगे आबाद,

उन सबके गुणगान में, सुखद बजे संगीत,
आजादी का पर्व है, गाओ मंगल गीत।


आज पूर्ण आजाद हैं, होगा सही विकास,
भेद भाव सब छोड़ कर, करने उचित प्रयास,

हर जन में उत्साह हो, हर जन में हो प्रीत,
आजादी का पर्व है, गाओ मंगल गीत।


*** मुरारि पचलंगिया ***

Sunday, 11 August 2019

दक्षता पर दोहे

 
सदा दक्ष ही जीतते, बाजी को हर बार।
करते अपनी नाव को, चतुराई से पार।।


कुशल बने अभ्यास से, लगे लक्ष्य पर तीर।
दक्ष सदा ही खींचते, सबसे बड़ी लकीर।।


पग-पग पर संघर्ष है, इस जीवन में मीत।
करें दक्ष ही सामना, मिले उन्हें ही जीत।।


जिसमें जितनी दक्षता, उतनी भरे उड़ान।
दुस्साहस करते नहीं, वे ही चतुर सुजान।।


सदा कुशल चातुर्य ही, रखकर दृढ़ विश्वास।
सदा कुशल व्यवहार से, करता त्वरित विकास।।


रखते जो चातुर्य से, सबके सम्मुख पक्ष।
सभी मानते हैं उसे, उसी क्षेत्र में दक्ष।।


मानवता से युक्त हो, बनकर शिक्षित दक्ष।
अनुभव से ही रख सकें, दृढ़ता से हम पक्ष।।


*** लक्ष्मण रामानुज लड़ीवाला ***

Sunday, 4 August 2019

भीगता तन-मन चला



पग कथानक रच रहे हैं मौसमों की धार में
भीगता तन-मन चला गंतव्य को बौछार में


वेग कोई दे चुनौती चाहे आये बाढ़ - सी
वय उमंगों से भरी ही खेलती जलधार में 


सावनी छाई घटा दिल खोल कर बरसे यहाँ,
झूम लेंगे मन खुशी के संग ही परिवार में


मेह को किसकी पड़ी है वो नहीं ये देखता
कौन भीगा कौन सूखा रह गया संसार में 


खोल लो छतरी तुम्हारी ओढ़ लो बरसातियाँ
विघ्न बरसी ऋतु न डाले हाँफती रफ्तार में


एक पल देखो ठिठक बूँदे धरा पर नाचतीं
राग बजता मेघ का डूबा हुआ मल्हार में 


*** मदन प्रकाश ***

जीवन है संगीत - एक गीत

  शाश्वत गुंजित प्रणवाक्षर का, सतत् चल रहा गीत। उतर मौन में सुनो ध्यान से, जीवन है संगीत। चले समीरण सर-सर सर-सर, गाती है निर्भ्रांत। जल सरित...