Sunday, 28 July 2019

गीत - ताजमहल



प्यार-मुहब्बत से यह दुनिया, महक रही है आज भी।
यही कहानी सब से कहता, एक अनूठा ताज भी।।


जोड़ा कोई जब-जब देखे, बोले वाह!कमाल है।
कहता है यमुना का जल भी, अद्भुत प्रेम-मिसाल हैै।।
झेल रहा सब उन्नत मस्तक, असर न छाया-धूप का।
सदियों से प्रतिबिम्ब निहारे, अपने अनुपम रूप का।।
छूकर हँसता हर मौसम पर, हुआ न मैला साज भी।
यही कहानी सबसे कहता, एक अनूठा ताज भी।।


प्राण-पखेरू जब उड़ जाते, पिंजरे रूपी देह से।
रह जाता तब सबकुछ अपना, जिसे सँवारा नेह से।।
रोता है क्यों बोलो कोई, अपने प्रिय की याद में।
सदा सँजोये रहता क्यों मन, सुधियाँ सारी बाद में।।
बिलख-बिलखकर रोने में क्यों, कभी न आती लाज भी।
यही कहानी सबसे कहता, एक अनूठा ताज भी।।


हर मज़हब से प्रेम बड़ा है, सीखो बोली प्यार की।
देकर जाएँ कभी न जग को, बातें हम तकरार की।।
आते हैं वो लोग धरा पर, ईश्वर के वरदान से।
जीते हैं जो हँसकर जीवन, मरते हैं जो शान से।।
बन जाते हैं वही प्रेम की, 'अधर' मधुर आवाज भी।
यही कहानी सब से कहता, एक अनूठा ताज भी।।


*** शुभा शुक्ला मिश्रा 'अधर' ***

Sunday, 21 July 2019

"सजन रे झूठ मत बोलो"


 
"मुहब्बत की नहीं मुझसे", सजन रे झूठ मत बोलो। 

लता के सम लिपट जाना, नखों से पीठ खुजलाना,
अधर से चूम लेना मुख, नयन से कुछ कहा जाना,
कभी पहना दिया हमदम, गले में हार बाहों का,
अचानक गोद में लेकर, तुम्हारा केश सहलाना,
हथेली से छुपा लेना, तुम्हारा नैन को मेरे,
इशारे प्यार के थे या, शरारत भेद यह खोलो,
"मुहब्बत की नहीं मुझसे", सजन रे झूठ मत बोलो।  

तुम्हारा डाँटना या फिर ,तुम्हारी झिड़कियाँ मीठी, 
ज़रा सी बात पर आँसू, बहाने के बहाने भी, 
तुम्हारा हक़ जताना भी, तुम्हारी ज़िद सभी नखरे,
बताओ किस तरह मानूं, अदाओं की कलाबाज़ी, 
बुने जो ख़्वाब थे हमने, हमारे आशियाने के,
प्रिये ! बरखा बिना संभव, कभी क्या बीज भी बो लो, 
"मुहब्बत की नहीं मुझसे", सजन रे झूठ मत बोलो। 

कठिन होगा तुम्हारे बिन, सनम हर हाल में जीना,
जुदाई का हलाहल भी, बड़ा मुश्किल यहाँ पीना,
तुम्हीं ने डोर बाँधी थी, तुम्हीं ने तोड़ क्यों डाली?
अचानक क्यों मुझे जो हक़, दिया था प्रीत का छीना?
प्रतीक्षारत रहूँगा मैं, अभी तक आस है बाकी,
क़सम है लौट आओ तुम, न जीवन में ज़हर घोलो,
"मुहब्बत की नहीं मुझसे", सजन रे झूठ मत बोलो। 

*** गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' बीकानेरी ***

Sunday, 14 July 2019

मर्म धर्म का


 
मर्म धर्म का समझो पहले
फिर करना प्रभु का ध्यान
काशी काबा व्यर्थ है सब कुछ
अंतस में सब धाम
पावन गंगा क्या करे
सब कर्मों के हैं फल
अच्छे कर्म नहीं तो मनवा
गंगा सिर्फ है जल
जाने भ्रम में जीने का
ये क्यों करता अभिमान
सच्चा सुख नहीं काशी में
 क्यों समझा न इंसान
कर्म ईश है, कर्म है गंगा,
कर्म ही शक्तिमान
राशि, रत्न और ग्रह शान्ति से
कब मुश्किल हुई आसान
अच्छे कर्मों से तू मानव
कर अपना उत्थान
दीन दुखी को सहारा देकर
अपना जन्म सँवार 
अच्छे कर्मों के अच्छे ही
फल देते भगवान्
प्रभु मिलन की अच्छे कर्म ही
राह करते आसान
पाप कर्म से तौबा कर
फिर होंगे
तुझ में
चारों धाम
तुझमें
तेरे राम
तुझमें
तेरे श्याम 

*** सुशील सरना ***

Sunday, 7 July 2019

नट नागर ये


रंग मंच पर
नट नागर ये
पल पल वेश बदलते


बड़े खिलाड़ी खेल जगत के
रोज तमाशे करते
कभी बाँधते पगड़ी सिर पर
कभी पाँव में धरते


नाच रहे हैं
नचा रहे हैं
रोते कभी उछलते


कभी बने हैं राजा बाबू
रंक कभी हो जाते
कभी न्याय के कभी लूट के
सबको पाठ पढ़ाते


कभी अकेले
कभी भीड़ सँग
घर से रोज निकलते


खेल -खेल में रहे खिलाते
हारे फिर से खेले
अपनी करनी अपनी भरनी
लादे कई झमेले


खेल-खेल में
खाईं खोदें
कैसे लोग सँभलते


*** बृजनाथ श्रीवास्तव ***

जीवन है संगीत - एक गीत

  शाश्वत गुंजित प्रणवाक्षर का, सतत् चल रहा गीत। उतर मौन में सुनो ध्यान से, जीवन है संगीत। चले समीरण सर-सर सर-सर, गाती है निर्भ्रांत। जल सरित...