Sunday, 30 December 2018

तृण का भार




पर्वत को मैंने छेड़ा
ढह गया।
दूर कहीं से
एक तिनका आया
पथ बाँध गया।
बड़ी-बड़ी बाधाओं को तो
हम
यूँ ही झेल लिया करते हैं
पर कभी-कभी
एक तृण छूता है
तब
गहरा घाव कहीं बनता है
अनबोले संवादों का
संसार कहीं बनता है
भीतर ही भीतर
कुछ रिसता है
तब मन पर
पर्वत-सा भार कहीं बनता है।
 

*-*-*-*-*-
*** कविता सूद ***


Sunday, 23 December 2018

निशानी

 


अपने' क़िरदार से' तू मील का' पत्थर बन जा
रह-रवों के लिए' रहबर सा' इक अख़्तर बन जा
ज़िन्दगी तेरी ज़माने को' हो' इक पैमाना 
बशरियत के लिए' अनमोल सा' ज़ेवर बन जा 


जाना' ही है तो' यहाँ छोड़ निशानी ऐसी
सब जवानों में' हो' इक तेरी' जवानी ऐसी
हो के' क़ुर्बान वतन पर तु सितारा हो जा
कहकशाओं को' मिले एक रवानी ऐसी




*** यशपाल सिंह कपूर ***

शब्दार्थ :-
क़िरदार = चरित्र
रह-रवों = साथी मुसाफिर
रहबर = मार्गदर्शक
अख़्तर = सितारा, ध्वज
पैमाना = मानदण्ड, मानक
बशरियत = इंसानियत, मानवता
क़ुर्बान = बलिदान
कहकशा
ओं = आकाशगंगाओं
रवानी = चाल


Monday, 17 December 2018

एक नज़्म

 


ये दिल का दरिया उफन-उफन कर हसीन आंखों में आ गया है,
फलक़ पे तस्वीर तेरी-मेरी उभर रही है यूँ रफ्ता रफ़्ता,
नशीली शब ने कि फ़िल्म कोई बनाई जैसे हो आशिक़ी पर।
सुलगती सांसों का पैरहन दे कि जिस्म ने रूह को छुआ है।
ये मौज़ ए दरिया, तड़पता साहिल, है तेरी यादों की शोख़ महफ़िल,
मेरे ख़यालों में बज रहे हैं किसी की चाहत के भीगे नग्मे।
तड़प के उल्फ़त ने आँख खोली, समेटने को ये शोख़ मंज़र,
मगर ये किसने मिटा दिया है फलक़ पे तारी हसीं नज़ारा,
तेरे-मेरे अक्स पर न जाने, ये कौन बन के घटा है छाया,
ये किसने फेरी सियाह कूची, ये कौन बन के विलन खड़ा है।
अधूरी है दास्तान ए उल्फ़त कि फ़िल्म डब्बे में जा पड़ी है।
अधूरी रीलों पे रह गया है लिखा हुआ नाम तेरा-मेरा।
भरी जवानी में मर गए हैं कि जैसे क़िरदार दास्तां के,
उफन-उफन कर ये दिल का दरिया मना रहा है कि सोग कोई।
खड़े किनारे पे सोचता हूँ कोई तो आएगा दिल का गाहक,
खरीद लेगा जो दर्द ओ ग़म की, अधूरी रीलें, अधूरे सपने, 

बनेगी चाहत की फ़िल्म फिर से कि आशिक़ी भी जवान होगी,
थियेटरों में वो दिल के चढ़कर मचाएगी धूम एक दिन फिर।
लिखेगा फिर से फलक़ कहानी तेरी-मेरी जान आशिक़ी पर

...हाँ ... तेरी-मेरी जान आशिक़ी पर...

*** दीपशिखा ***

Sunday, 9 December 2018

शब्द



शब्दों का था भाव बड़ा
शक्ति बड़ी थी अर्थ बड़ा
केवल उनके उच्चारण से 

धरती पर था स्वर्ग खड़ा
शब्द ब्रह्म थे शब्द मंत्र थे

शब्दों से थी रची ऋचाएँ
शब्द सबद थे शब्द कबीरा

शब्दों में ही आयत आयें
ईमान शब्द हैं शब्द धर्म हैं 

किरदार शब्द हैं शब्द कर्महैं
शब्द योग हैं यही अमोघ हैं

शब्द अस्त्र हैं शस्त्र शब्द हैं
शब्द ज्ञान हैं शब्द मान हैं

शब्द पुण्य हैं शब्द पाप हैं
तूने तो शब्दों का अद्भुत वरदान दिया है
मैंने ही शब्दों का अपमान किया है

शब्द वही हैं
बस अर्थ नहीं हैं
केवल उच्चारण करते हैं

किरदारों में जिए नहीं हैं
इसीलिए व्यक्तित्व हमारे 

जगमग जलते दिए नहीं हैं
मेरे मालिक मेरे दाता
मुझसे अपने शब्द छीन ले
मुझको तू निःशब्द बना दे।


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*** नसीर अहमद 'नसीर' ***

Sunday, 2 December 2018

दो फूल




फूल ने फूल से फूल सी बात की,
मानो उल्फ़त ने गुल से मुलाकात की,
प्यार की तिश्नगी को सबब मिल गया,
कौन लिक्खे कथा ऐसे हालात की। 


उनके गालों के गुल पर कहा शे'र जब,
तमतमाने लगे तैश में बे-सबब,
हमने' ग़ुस्ताख़ी' की माँग लीं माँफ़ियाँ,
बोले ज़ुल्फों पे' भी तो कहो एक अब। 


*** यशपाल सिंह कपूर ***


जीवन है संगीत - एक गीत

  शाश्वत गुंजित प्रणवाक्षर का, सतत् चल रहा गीत। उतर मौन में सुनो ध्यान से, जीवन है संगीत। चले समीरण सर-सर सर-सर, गाती है निर्भ्रांत। जल सरित...