Sunday, 14 June 2015

तूने मुझे शर्मसार किया...


'पुत्रवती भव'
रोम रोम हर्षित हुआ था -
जब घर के बड़ों ने -
मुझ नव-वधु को यह आशीष दिया था -
कोख में आते ही -
तेरी ही कल्पनाओं में सराबोर!
बड़ी बेसब्री से काटे थे वह नौ महीने ...
तू कैसा होगा रे-
तुझे सोच-सोच भरमाती सुबह शाम!
बस आजा तू यही मनाती दिन रात ...
गोद में लेते ही तुझे-
रोम-रोम पुलक उठा था -
लगा ईश्वर ने मेरी झोली को आकंठ भर दिया था !!
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आज...
तूने... मेरी झोली भर दी !
शर्म से...
उन गालियों से-
जो हर गली हर मोड़ पर बिछ रही हैं...
उस धिक्कार से -
जो हर आत्मा से निकल रही है...
उस व्यथा से -
जो हर पीड़िता के दिल से टपक रही है...
उन बददुआओं से -
जो मेरी कोख पर बरस रही हैं!

मैंने तो इक इंसान जना था -
फिर - यह वहशी !
कब, क्यूँ, कैसे हो गया तू...

आज मेरी झोली में
नफ़रत है -
घृणा है -
गालियाँ हैं -
तिरस्कार है - जो लोगों से मिला -
ग्लानि है -
रोष है -
तड़प है -
पछतावा है -
जो तूने दिया !!!
जिसे माँगा था इतनी दुआओं से -
वही बददुआ बन गया !

तूने सिर्फ मुझे नहीं -
'माँ' - शब्द को शर्मसार किया...


***सरस दरबारी

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