शब्द से संसार रचना की कभी भगवान ने।
'तप' सुना 'तप' ही किया फिर एक तेरे ध्यान ने।।
शब्द से ही प्रेम होता शब्द से ही ग्लानियाँ।
भावना साकार होती इनसे ही गहराइयाँ।।
व्याल का विष शब्द सुनकर झट उतर जाता सुनो।
शब्द हो यदि मंत्र तो फिर विश्व तर जाता सुनो।।
यह अमी है पान करके हो अमर मानव यहाँ।
नाम से नामी प्रकट कर शब्द से है सब जहाँ।।
शब्द को मत भूलना तुम सीख दी नादान ने।।
राम हो या कृष्ण प्यारे शब्द से ही ज्ञात है।
शब्द में तन मन समाया शब्द सबके साथ है।।
शब्द सागर में समाया कवि हमारा प्यार से।
चुन लिए हीरे जगत में शब्द के ही सार से।।
ग्रंथ में जो भी लिखा है शब्द का ही भार है।
इस धरा से नभ तलक सब शब्द का व्यापार है।।
पंच भूतों को जनाया शब्द के ही ज्ञान ने।।
लेखनी लिखती फ़लक पर शब्द को अरमान से।
पात्र में जो शब्द सागर है मिला भगवान से।।
शब्द आँसू है ख़ुशी है शब्द से ही प्यार है।
इस धरा पर एक केवल शब्द ही तो सार है।।
एक क्षण मिलना बिछुड़ना एक क्षण में काल है।
जानता है शब्द से कवि जग यहाँ कंगाल है।।
शब्द मिटता है नहीं सुन कह दिया श्मशान ने।।
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राहुल शर्मा 'सिंधु'
फिरोजाबाद, उत्तर प्रदेश

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