Sunday, 9 March 2025

पञ्चचामर छंद

 

न उम्र की ढलान हो न जोश में अपूर्णता।
न हौंसला डिगे कभी न हो कभी अधीनता।
बलिष्ठ रोगहीन हो विचार में प्रगाढ़ता।
निकृष्ट स्फूर्तिहीन आज त्याग दें दरिद्रता।।

सुहावने विहान को सदा निहारते चलो।
न पाँव ये थमें वसुंधरा बुहारते चलो।
क़ुसूर भूल-चूक जो सभी सुधारते चलो।
पुनः मिले न जिंदगी अभी सँवारते चलो।।

न भिन्नता न खिन्नता विषाद का विनाश हो।
नवीनता प्रफ़ुल्लता प्रसन्नता प्रकाश हो।
प्रवास आस प्यास हो सदा नई तलाश हो।
बिना प्रयास के जिए सुनो सजीव लाश हो।।

सूरजपाल सिंह
कुरुक्षेत्र।

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