देवर भाभी खेले होली, भर पिचकारी डारे।
भीगे कपड़े तन-मन भीगे, लगे बहुत ही प्यारे।।
नीर-झील से गहरे इतने, मुखड़ें लगे नशीले,
हुरियारों की टोली जैसे, लगते सब हमजोली।
रंग अबीर गुलाल लगाते, खेले सब मिल होली।।
बरसाने की होली सबसे, लगे बहुत ही प्यारी।
लट्ठ-मार होली की देखो, महिमा सबसे न्यारी।।
लोक-गीत गा खूब रिझाते, ऐसी धूम मचाते,
भाव-विभोर किया गीतों ने, लगती मोहक़ बोली।
रंग अबीर गुलाल लगाते, खेले सब मिल होली।।
भेद-भाव को भूले सारे, सबको गले लगाते।
सरोबार तन-मन हो जाता, मिलकर सब हर्षाते।।
खुशी जताते फाग खेलते, कुछ पीकर ठंडाई,
जन-जन के इस प्रेम-पर्व में, करते हँसी ठिठोली।
रंग अबीर गुलाल लगाते, खेले सब मिल होली।।
*** लक्ष्मण लड़ीवाला 'रामानुज'
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