विश्वास देकर
बिठाया था कंधे पर
अंतरिक्ष की अंगुली पकड़ाकर
विकास का उजाला,
पुचकार कर
खाली हथेलियों में भर दी थी गर्माहट
रच दिया था चलचित्र का भ्रम,
और मैं
अज्ञात भाषा के शोर में गुम
फावड़ा उठाकर ढहाता चला गया
गिरि- गोलोक, कन्दरा- मन्दिर,
उदधि- उद्भव, नक्षत्रों का छत्र, अतल का तल,
मनोयोग से खोद दी थी
ऋतुओं की गंध, फुहारों की लय,
कुनकुनी धूप, सरकती छांव,
मिटा दिए प्रकृति के सब आदिम पदचिन्ह,
अचानक नथुनों में भर गया धुआँ
बरसने लगे अंगारे,
छा गया अंधेरा
और अब मैं
विश्वास के साथ
अकेला खड़ा हूँ हाशिये पर,
भरोसा उठाने के लिए!
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डॉ.मदन मोहन शर्मा
सवाई माधोपुर, राज.
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