Sunday, 23 February 2025

शुभ-शुभ - एक गीत

 

शुभ-शुभ शीत ग्रीष्म बरसात।
शुभ-शुभ प्रातः दिन अरु रात।

तेरा शुभ हो मेरा शुभ हो।
नहीं किसी का कभी अशुभ हो।
वैमनस्य कटुभाव रहे ना,
कहो वही जो रहे अचुभ हो।
शुभ-शुभ निकले मुख से बात।
शुभ-शुभ प्रातः दिन अरु रात।

रहे कामना सदा सुमंगल।
बोल कभी ना रहें अनर्गल।
मान प्रभू की इच्छा सुख-दुख,
मिले सुधारस या मिले गरल।
स्वस्थ मांनस हो पावन गात।
शुभ-शुभ प्रातः दिन अरु रात।

सुन्दर शुभकारी रहे सृष्टि।
रहे अपनी सकार की दृष्टि।
अधर मधुर मुस्कान सहेजें,
अमृत सी होती रहे वृष्टि।
शुभ-शुभ वृक्ष सुमन अरु पात।
शुभ-शुभ प्रातः दिन अरु रात।

डॉ. राजकुमारी वर्मा

Sunday, 16 February 2025

भरोसा

 

विश्वास देकर
बिठाया था कंधे पर
अंतरिक्ष की अंगुली पकड़ाकर
दिखाया था धरती पर फैलता
विकास का उजाला,
पुचकार कर
खाली हथेलियों में भर दी थी गर्माहट
रच दिया था चलचित्र का भ्रम,
और मैं
अज्ञात भाषा के शोर में गुम
फावड़ा उठाकर ढहाता चला गया
गिरि- गोलोक, कन्दरा- मन्दिर,
उदधि- उद्भव, नक्षत्रों का छत्र, अतल का तल,
मनोयोग से खोद दी थी
ऋतुओं की गंध, फुहारों की लय,
कुनकुनी धूप, सरकती छांव,
मिटा दिए प्रकृति के सब आदिम पदचिन्ह,
अचानक नथुनों में भर गया धुआँ
बरसने लगे अंगारे,
छा गया अंधेरा
और अब मैं
विश्वास के साथ
अकेला खड़ा हूँ हाशिये पर,
भरोसा उठाने के लिए!
~~~~~~~~~~~
डॉ.मदन मोहन शर्मा
सवाई माधोपुर, राज.

Sunday, 9 February 2025

ज्ञान की नित नव प्रभा से - एक गीत

 

माँ ! तिमिर हर लो हृदय का ज्ञान का उद्भास भर दो।
ज्ञान की नित नव प्रभा से मम हृदय परिपूर्ण कर दो।

कर ध्वनित माँ ब्रह्म लहरी शेष 'मैं' का रह न जाए।
हो अकेला भाव सागर भव व्यथा कुछ रह न पाए।
श्वेत पद्मासन विराजित शारदे तुझको पुकारूँ।
छोड़ कर सारे सितासित यह हृदय तव गीत गाए।
गूँजते हों स्वर प्रणव के ओम् की माँ तृप्ति भर दो।
ज्ञान की नित नव प्रभा से मम हृदय परिपूर्ण कर दो।

भावना के सिन्धु से ये मन सहेजे भाव मोती।
ऊर्मियों की चाँदनी से जो समेटे दिव्य ज्योती।
प्रेम का विस्तार कर दे क्या करेगा अब सघन तम,
आपका ही प्यार पाकर मैं नए सपने सँजोती।
रह न जाए तम भरा कोई किनारा मातु वर दो।
ज्ञान की नित नव प्रभा से मम हृदय परिपूर्ण कर दो।

हो गई है भू बसन्ती मातु तेरी अर्चना में।
झर रही हैं स्वर्ण वर्णी रश्मियाँ तव वन्दना में।
फिर रहे क्यों तम हृदय में शारदे तू तार दे माँ,
भर गए हैं रंग अनगिन मातु स्वागत अल्पना में।
हो रहा है मन तरंगित कल्पना को नव्य स्वर दो।
ज्ञान की नित नव प्रभा से मम हृदय परिपूर्ण कर दो।

*** सीमा गुप्ता 'असीम'

Sunday, 2 February 2025

राजा ऐसा चाहिए जैसे राजा राम - एक गीत

 

राजा ऐसा चाहिए, जैसे राजा राम।
नाम भजो तब सुधरते, हर जन का हर काम।।
..........
राम राज्य की कल्पना, कैसे हो साकार।
कुटिल चाल चलते सभी, बिगड़ी है सरकार।।
दुष्टों के दुष्कर्म से, देश हुआ बदनाम।
राजा ऐसा चाहिए, जैसे राजा राम।।
..........
दुष्टों की भरमार है, देखो चारों ओर।
सब पर हावी हो रहे, खूब मचाते शोर।।
लगें ठिकाने दुष्ट ये, तब पाएँ विश्राम।
राजा ऐसा चाहिए, जैसे राजा राम।।
..........
दुष्टों का संहार कर, दिया दिव्य संदेश।
जो हम ऐसा कर सकें, सुधरेगा परिवेश।।
ऐसा करने के लिए, करना है संग्राम।
राजा ऐसा चाहिए, जैसे राजा राम।।
...........
युग बीते पर आज भी, गुण गाता संसार।
राम राज्य को मानिए, सतयुग का आधार।।
संकल्पित हों हम सभी, कृपा करें सुखधाम।
राजा ऐसा चाहिए, जैसे राजा राम।।

*** मुरारि पचलंगिया

जीवन है संगीत - एक गीत

  शाश्वत गुंजित प्रणवाक्षर का, सतत् चल रहा गीत। उतर मौन में सुनो ध्यान से, जीवन है संगीत। चले समीरण सर-सर सर-सर, गाती है निर्भ्रांत। जल सरित...