Sunday, 21 February 2021

बसन्त पंचमी



उमंग प्राण में भरे बसन्ती।
बसन्त पंचमी करे बसन्ती॥

प्रसून-प्रीति से सजी लताएँ।
समस्त भृंग-वृंद गीत गाएँ॥
कली हरेक आज मुस्कुराती।
हवा चली सुगंधियाँ लुटाती॥
 
तरंग प्राण से झरे बसन्ती।
बसन्त पंचमी करे बसन्ती॥

समस्त प्यार मुक्त हस्त दाता।
बसन्त साथ ही अनंग आता॥
नवीन रंग से सजा धरा को।
बसन्त ने लिया लुभा हिया को॥
 
रती* अनंग जी हरे बसन्ती। (*प्रेमी)
बसन्त पंचमी करे बसन्ती॥

लुटा दिया पराग कोष सारा।
सदैव दान धर्म शीष धारा॥
सिखा रही हमें यही धरा है।
परोपकार कर्म ही खरा है॥
 
बसन्त ! रंग आज रे! बसन्ती।
बसन्त पंचमी करे बसन्ती॥

*** कुन्तल श्रीवास्तव, मुम्बई ***

Sunday, 14 February 2021

नर-नारी

 


 
नर-नारी का युग्म है, ईश्वर का प्रतिरूप।
इनसे ही मिलकर बना, जग में प्रेम अनूप।।1।।

कुसुमाकर ने जब लिखे, प्रीति भरे संवाद।
नर-नारी ने कर लिये, नैनों से अनुवाद।।2।।
 
नर-नारी पर काम का, डाले रंग अनंग।
उसी रंग में खिल उठा, टेसू आज मलंग।।3।।
 
महुए ने मधुरस भरा, बाँटा जब उन्माद।
नर-नारी करते ग्रहण, तब से प्रेम प्रसाद।।4।।
 
महकी जब से मंजरी, हुई नशीली वात।
नर-नारी में प्रीति के, पले मृदुल जज्बात।।5।।
 
नर-नारी से कर लिये, ऋतुपति ने अनुबंध।
फूलों में भर प्रीति की, खुश्बू वाली गंध।।6।।
 
देती है जब-जब प्रकृति, मानवता को दंश।
तब-तब यहाँ सहेजते, नर-नारी निज वंश।।7।।
 
*** भीमराव झरबड़े 'जीवन' बैतूल ***

Sunday, 7 February 2021

विरह का मतलब समझ

 

 
विरह का मतलब समझ,
पगले! मेरा उर क्लांत है।
 
भावनाओं से भरे,
अवसाद का न अन्त है।
बिलख उठती पीड़ा विरह की,
यामिनी में जब कभी,
जान पगले! अर्थ इसका,
कितना हृदय संताप है
 
विरह का मतलब समझ
पगले! मेरा उर क्लांत है।
 
चाँदनी बिखरी धरा पर,
अग्नि क्यों बरसा रही।
गात जलता अग्नि सम,
क्यों दहकती जा रही।
बरसते उत्पल नयन,
ये वेदना का ताप है।
 
विरह का मतलब समझ,
पगले! मेरा उर क्लांत है।
 
अभिलाषाएं करवट ले रहीं,
वेदना के ज्वार से।
अश्रु से पलकें जो भीगी,
क्यों व्यथित थी प्यार से।
दुःख से आहत हृदय में,
न कोई झंकार है।
 
विरह का मतलब समझ,
पगले! मेरा उर क्लांत है।
 
पीड़ा मेरी सो गई,
मैं, निशा जगती रही।
वेदना की ले हिलोरें,
रात-भर जलती रही।
प्रतिबिम्वित होता तारकों में,
ये छलना का उत्पात है।
 
विरह का मतलब समझ,
पगले! मेरा उर क्लांत है।
 
*** कुसुम शर्मा "उमंग" ***

जीवन है संगीत - एक गीत

  शाश्वत गुंजित प्रणवाक्षर का, सतत् चल रहा गीत। उतर मौन में सुनो ध्यान से, जीवन है संगीत। चले समीरण सर-सर सर-सर, गाती है निर्भ्रांत। जल सरित...