Sunday, 29 July 2018

ताल पर दोहे



ताल शब्द तो एक है, इसके अर्थ अनेक।
कवि को श्रोता ताल दे, जागे जोश विवेक।


तबला ढोल सितार हो, या शहनाई नाल।
कानों में रस घोल दे, बजे संग इक ताल।


नर्तन में तो ताल की, बहुत बड़ी है बात।
काल-माप औ वज़न ही, देता शह या मात


दंगल में उतरे वही, जिसकी मोटी जान।
ताल ठोक गर्जन करे, सिंह भाँति बलवान


ताल तलैया पोखरा, भर दे जो बरसात।
दिन में होली ईद हो, मने दिवाली रात।

 
  *** सतीश मापतपुरी ***

Sunday, 22 July 2018

बारिश/बाढ़ पर कुण्डलिया




भारत में टूटा कहर, बारिश का घनघोर
मची हुई जल प्रलय से, त्राहि त्राहि चहुँ ओर 
त्राहि त्राहि चहुँ ओर, हुआ बाधित जनजीवन 
झेल रहा संत्रास, देश आधा तकरीबन 
कह 'दबंग' कविराय, घिरी जनता आफत में
दिखा रहा सैलाब, भयानकता भारत में

 
रवि कांत श्रीवास्तव 'दबंग'

Sunday, 15 July 2018

चोट/जख्म/आघात पर दोहे



पर अवगुण देखे सदा, दिखी न खुद में खोट।
अक्सर करते हैं यहाँ, अपने दिल पर चोट।।


जिसको निज नेता चुना, देकर अपना वोट।
सरेआम वह दे रहा, मुझे चोट पर चोट।।


दूषित हुए समाज पर, ले भावों की ओट।
कविगण देते हैं सदा, निज चिंतन की चोट।।


शब्दों के आघात से, उजड़े उर का गाँव।
शब्दों की रसवंतिका, सदा छुआती पाँव।।


कभी न अनुपम कीजिए, दीन हृदय आघात।
दीनों की उर आह से, पुण्य क्षार हुइ जात।।

 
*** अनुपम आलोक ***

Sunday, 8 July 2018

अदब/आदर/सम्मान



दिलों ने दिलों को जो दावत लिखी है।
न समझो कि झूठी इबारत लिखी है।


हमारे बुजुर्गों ने बड़े ही अदब से,
बिना ऐब रहना, नसीहत लिखी है।


अलग घर बसाया मेरे भाईयों ने,
पिताजी ने जबसे वसीयत लिखी है।


सभी को अता की, रंगोआब, सुहरत,
मेरे हिस्से में क्यों फ़जीहत लिखी है।


कुरेदे गये उस ख़लिस के लहू से,
कहानी तुम्हारी बदौलत लिखी है। 


झड़े पात जबसे नहीं छाँव देता,
"शजर" की यही तो हक़ीक़त लिखी है।


*** शजर शिवपुरी ***

Sunday, 1 July 2018

जब जागो तभी सवेरा

 

छट जाये तमस घनेरा।
जब जागो तभी सवेरा।।


आदिम युग से आज तलक कुछ, अग्रज चलते आये।
हमने तो बस पद चिन्हों पर, उनके कदम बढ़ाये।।
जान न पाये झूठ सत्य का, कहाँ कौनसा डेरा।
छट जाये तमस........ (1)


सबने अपने अपने हित के, निज बाजार सजाये।
औरों को भरमाया कुछ ने, साझे सत्य कराये।।
कोई था उपकारी केवल, कोई बना लुटेरा।
छट जाये तमस....... (2)


आओ यारों बने हंस हम, सच पय पान करेंगे।
निज स्वारथ सी त्याग बुराई, जन कल्याण करेंगे।
आओ खोलें ज्ञान चक्षु हम, जिन्हें तमस ने घेरा।।
छट जाये तमस..... (3)


*** भीमराव झरबड़े "जीवन" बैतूल ***

जीवन है संगीत - एक गीत

  शाश्वत गुंजित प्रणवाक्षर का, सतत् चल रहा गीत। उतर मौन में सुनो ध्यान से, जीवन है संगीत। चले समीरण सर-सर सर-सर, गाती है निर्भ्रांत। जल सरित...