Sunday, 11 March 2018

तुम कब समझोगे?

 


पुरुष! तुम कब समझोगे,
कि हम हाड़-मांस के पुतले नहीं,
जो तुम्हारे उपभोग के लिए बने हैं,
अपितु तुम जैसे ही संवेदित,
जीते जागते मनुष्य हैं।


कब तक तुम अपनी कल्पनाओं के स्वरुप को
हम पर आरोपित करते रहोगे,
कब तक अपनी अपेक्षाओं, स्वगठित आदर्शों
और मिथ्या मर्यादाओं का भार
हम पर डालते रहोगे,
कब तक अपनी इच्छाओं की स्वर्ण-मंडित बेड़ी से
हमारे अस्तित्व को बाँध
हमें बहलाते रहोगे।


पुरुष, तुम कब समझोगे कि
हम न तो सीता बनना चाहते हैं
और न ही शूर्पणखा,
हम न तो आकाश में रहना चाहते हैं
और न ही पाताल में,
हम इसी धरती पर विचरना चाहते हैं
स्वतंत्र, उन्मुक्त, निडर
तुम्हारे संग
तुम्हारी ही तरह
मात्र एक व्यक्ति बनकर।
पुरुष, तुम कब समझोगे?


***** प्रताप नारायण

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