Saturday, 14 May 2016

सिंहस्थ कुम्भ महापर्व पर दोहे




पापी मन तू चेत ले, रखा न हरि का ध्यान
आई अब है शुभ घड़ी, कर ले पावन स्नान।1
<>
मेला है सिंहस्थ का, छलका अमृत नीर

लालायित सब लोग हैं, बैठे क्षिप्रा तीर
।2
<>
गुरु का बंधु प्रवेश जब, सिंह राशि में होय

तब लगता सिंहस्थ है, पूर्ण मनोरथ होय
।3
<>
क्षिप्रा के तट पर भई, साधु-सन्त की भीड़

भोले के दर्शन करो, मन -पंछी तज नीड़
।4। 
<>
हरिद्वार को सब कहें, सदा मोक्ष का द्वार।
महापर्व सिंहस्थ में, हो जाये उद्धार।।5
। 

<>
***** गुप्ता कुमार सुशील 'गुप्तअक्स'

2 comments:

  1. वाह बहुत प्रसंसनीय दोहे, बधाई आपको

    ReplyDelete
    Replies
    1. सादर आभार आपका आदरणीय.

      Delete

मत उदास हो

मत उदास हो थके मुसाफिर कुछ श्रम बिंदु बिखर जाने से यह पथ और निखर जायेगा। रोक सकी कब पागल रजनी आने वाली सलज उषा को बाँध न पाई काली...