Sunday, 13 September 2015

पाँच - हाइकु



उजालों में भी,
पलते हैं अंधेरे;
दीपक तले । 


उजाले देता,
मुफलिसी में जीता;
अंधेरे पीता । 


जलता रहे,
तिमिर से लड़ता;
मिट्टी का दीया । 


दीप लघु हूँ,
अंधेरों को पीता हूँ;
तन्हा जीता हूँ ।


मुँह अंधेरे,
कचरे में ढूँढता;
पेट की रोटी । 


*** डॉ. रमा द्विवेदी

4 comments:

  1. Replies
    1. सादर आभार आपका आदरणीय Suresh Chaodhary जी.
      सादर नमन

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  2. आदरणीय सपन जी ,बहुत -बहुत शुक्रिया ` सहज साहित्य' में मेरी रचना प्रकाशित करने के लिए ...

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    Replies
    1. सादर स्वागत है आपका आदरणीया Rama जी.
      सादर नमन

      Delete

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