Sunday, 7 December 2014

पाँच मुक्तक

सत्यं शिवं सुन्दरम् - साहित्य सृजन मेखला 
के साहित्यिक मंच पर 
मज़मून 31 में चयनित 
सर्वश्रेष्ठ रचना 



                       1

रूप शिखे ये नज़रे तुमको तोल रही हैं,
हर इक अदा दिल के दरवाज़े खोल रही हैं,
न न तुम अब अधरों को मत लरजाना प्रिये!
तेरी तो आँखें ही सब कुछ बोल रही हैं।
                         2
पीर की रीत भी चहकने लग गयी अब तो,
साँस भी आस से महकने लग गयी अब तो,
दर्द से आँख दो-चार करने लगा हूँ मैं,
टूटकर ज़िन्दगी दहकने लग गई अब तो
                         3
आँखों में आभासित प्रियतम,
अधरों पर अभिलाषित प्रियतम,
तन-मन पर छाये रहते हैं,
मेरे प्रिय मधुमासित प्रियतम
                  4
किसी के हम भी सहारे थे कभी,
किसी की आँख के तारे थे कभी,
वक्त ने बेवफ़ाई की वरना,
किसी को हम बहुत प्यारे थे कभी
                                5
रफ़्ता-रफ़्ता इन आँखों को वो मंज़र बहुत अजीब दिखा,
रातों-रात बदलता ना जाने कितनों का ये नसीब दिखा,
जो घर-द्वार खड़ा रहता था भारी-भारी बुनियाद लिये,
उसका भी सामान बिखरता हमको यूँ बेतरतीब दिखा
 
***प्रहलाद पारीक***

No comments:

Post a Comment

मत उदास हो

मत उदास हो थके मुसाफिर कुछ श्रम बिंदु बिखर जाने से यह पथ और निखर जायेगा। रोक सकी कब पागल रजनी आने वाली सलज उषा को बाँध न पाई काली...