Monday, 14 April 2014

एक क्षणिका

कहते थे कि कुछ अनजाना हुआ,
हुआ तो बस पहचाना हुआ,
कहीं सुना था हमने भी,
जो होता है, सो तो होना ही था,
तो क्या हुआ?
क्यों हुआ?
कहते ही क्यों हो?
अब तो ये जीवन का बस एक पहलू है,
के होने-जाने का दोष नहीं,
वह तो राजनेताओं की तरह दलबदलू है.
============================= सपन

No comments:

Post a Comment

मत उदास हो

मत उदास हो थके मुसाफिर कुछ श्रम बिंदु बिखर जाने से यह पथ और निखर जायेगा। रोक सकी कब पागल रजनी आने वाली सलज उषा को बाँध न पाई काली...