Sunday, 26 May 2024

सभा हो गई - एक गीत

भीड़ में मैं अकेला रहा उम्र भर।
अब स्वयं से मिला हूँ सभा हो गई।
मंजु-स्मृति रश्मियां मन पटल पर झरीं।
रैन तम मिट रहा शुचि प्रभा बो गई।

मंजुषा मंजु मन में दबी बात की।
प्रीति अल्हड़ सयानी मुखर रात की।
वो तुम्हीं थी दबे पाँव आ द्वार पर।
लाज चौखट कठिन से कठिन पार कर।
उर्मि अभिसारिका सी अमा धो गई।
अब स्वयं से मिला हूँ सभा हो गई।

लाज की बेड़ियां दूरियां थी घनीं।
कर्म की साधना धर्म चादर तनीं।
एक कर्तव्यनिष्ठा प्रखर भाव था।
बस निभाना स्वयं को सुभग चाव था।
तू सुहानी वसंती हवा हो गई।
अब स्वयं से मिला हूँ सभा हो गई।

आज सानिध्य तेरा मुखर मौन है।
अनछुई मृदु छुअन छाँव भी छौन है।
नेह की तुम प्रिये मंजु अनुवाद हो।
रागिनी सप्त स्वर में सुसंवाद हो।
सद्य शम्पा गिरी सी कहाँ खो गई।
अब स्वयं से मिला हूँ सभा हो गई।

*** सुधा अहलुवालिया 

Thursday, 23 May 2024

शुरू हुआ कलियुग का काल - एक गीत

द्वापर युग के जाते जाते, शुरू हुआ कलियुग का काल।
झूठ सत्य के शीश चढ़ गया, फँसा परीक्षित उसके जाल।।

बैठ परीक्षित के स्वर्ण मुकुट, कलियुग आया पाँव पसार।
मदिरा पीकर होश गवायें, सज्जन सब दिखते लाचार।।
सदाचार की राह छोड़कर, करता मानव दुर्व्यवहार,
कुल-कलंक विषधर जब उपजे, खूब बजाते रहते गाल।
पाखण्डी सज्जन की पगड़ी, चौराहे पर रहें उछाल।।

मोह जाल में फँसती महिला, व्यभिचारी करते व्यभिचार।
कामुक हो मदमत्त सदा ही, जीवन में करते अँधियार।।
धन-दौलत की बढ़ी प्यास ने, ख़ूब बढ़ाया भृष्टाचार,
अंधकार का युग यह देखो, दया धर्म का हुआ अकाल।
काम-क्रोध मद मोह लोभ में, नैतिकता की गले न दाल।।

रहें भले ही कलियुग में हम, हो सकते इससे आज़ाद।
त्रेता में भी दम्भी रावण, कर सकता जीवन बर्बाद।।
सन्त सरीखे सभी युगों में, जीवन का लेते आनंद,
सत्संगी तो कलियुग में भी, मस्ती में रहते हर हाल।
कलियुग में भी बोध रहे हो, जी सकते ऊँचा कर भाल।।

*** लक्ष्मण रामानुज लड़ीवाला

Sunday, 12 May 2024

जग-सराय में रैन बसेरा - एक गीत

 

जग-सराय में रैन बसेरा, प्रात यहाँ से जाना।
धर्म-कर्म की चादर ओढ़े, नहीं पड़े पछताना।।

खुली बेड़ियाँ गर्भ-नर्क की, स्वर्ग-धरा पर आया।
ख़ुश थे सभी मगर तू रोया, देख जगत की माया।।
भूल गया घर वापस जाना, कुछ दिन यहाँ ठिकाना।
जग-सराय में रैन बसेरा, प्रात यहाँ से जाना।।

यौवन का मदिरालय छलका, मृग तृष्णा ने घेरा।
भोग-रोग के संग तृषा ने, डाल दिया तन डेरा।।
मन-तुरंग नव भरे उड़ानें, सोच लिया जो पाना।
जग-सराय में रैन बसेरा, प्रात यहाँ से जाना।।

गई बहारें पतझड़ आया, फीके लगें नजारे।
काया-माया साथ न देती, झूठे सभी सहारे।।
हंस उड़ा तज मानसरोवर, रूठ गया जब दाना।
जग-सराय में रैन बसेरा, प्रात यहाँ से जाना।।

*** चंद्र पाल सिंह 'चंद्र'

Sunday, 5 May 2024

श्रम पर दोहे

 

श्रम ही सबका कर्म है, श्रम ही सबका धर्म।
श्रम ही तो समझा रहा, जीवन फल का मर्म।।

ग्रीष्म शरद हेमन्त हो, या हो शिशिर वसंत।
वर्षा ऋतु से प्रिय जगत, श्रम से प्रिय गृह कंत।।

श्रम जीवन के वृक्ष को, सिंचित करता श्वेद।
फल छाया पल्लव सुमन, देकर हरता खेद।।

श्रम जीवन का मूल धन, श्रम जीवन का ब्याज़।
श्रम जीवन का घोंसला, श्रम नभ की परवाज़।।

सकल जगत के जीव सब, पहने श्रम का हार।
अपने-अपने पथ चले, फल देता दातार।।

कर्म हीन विधि हीन नर, रचता गृह फल हीन।
भाग्य हीन बन घूमता, मन वाणी धन दीन।।

श्रम श्रद्धा विश्वास है, श्रम ही साधन साध्य।
श्रम के बल से प्रकट हो, फल रूपी आराध्य।।

डॉ. मदन मोहन शर्मा
सवाई माधोपुर, राज.

जीवन है संगीत - एक गीत

  शाश्वत गुंजित प्रणवाक्षर का, सतत् चल रहा गीत। उतर मौन में सुनो ध्यान से, जीवन है संगीत। चले समीरण सर-सर सर-सर, गाती है निर्भ्रांत। जल सरित...