Sunday, 18 October 2015

एक चतुष्पदी





उलझी सी जीवन राहों में गिर-गिर के संभलना सीख लिया,
कलियों की तमन्ना दिल में लिए काँटों पे चलना सीख लिया,
शिकवा या गिला कुछ भी तो नहीं हमको अपनी परेशानी से,
घुट-घुट के तड़पती आहों ने हँस-हँस के जलना सीख लिया।

  
*** विश्वजीत शर्मा 'सागर'

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