Sunday, 24 January 2016

मासूम लहू


 
यह एक ऐसा दर्द है जिसकी न कोई थाह
चीर कलेजा रख दिया रह रह निकले आह


रह रह उठती हूक वह मंज़र कैसा होगा
खेले जिसके संग तड़पता देखा होगा



पथरा जाये आँख नज़ारा देखा होगा
ढेर मासूमों का जब तड़पता देखा होगा


रीति आँखों से उसने सहलाया होगा
अंतिम बार उसे जब माँ ने नहलाया होगा


पूछा होगा ईश से चुप रहा वह कैसे
मासूमों का लहू बहने दिया क्यूँ ऐसे


क्या था उनका दोष करते थे हँसी ठिठोली
इंसानी वहशत बनी जब, सीने की गोली


अब तो खालीपन है हर आँगन हर ठाँव
आँसू ही अब मरहम हैं रोये सारा गाँव

 
***सरस दरबारी***

2 comments:

  1. मेरी रचना को यहाँ स्थान देकर जो मान दिया है उसके लिए मँच का ह्रदय तल से आभार

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    1. सादर आभार, हार्दिक स्वागत एवं नमन आदरणीया Saras जी.

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