Sunday, 26 July 2015

नदी का जल

 
नदी का जल
बादल की बूँद बन
बहता है घने जंगल की
डालियों पर
मुग्ध हो जाता है वह
एकाकार हो
जंगल झाँकने लगता है उसमें

साफ़ परिदृश्य
पाखी, तितली, हिरण और
अनछुई बदली
छू लेती है
नदी का अंतर्मन

जब नदी बर्फ हो
बूँद बूँद बन उड़ रही थी
तो भी नदी का रंग
श्वेत ही था
उड़ती भाप सा

नदी हमेशा से पाक
पवित्र थी,
जब गाँव गाँव भटकी
जब शहर घूमी
जब समुन्द्र से मिली
या फिर बादल बन ढली

बचा सको तो नदी का रंग
बदरंग होने से
तो नदी बनना होगा
तर्पण करना होगा

अपने आँख की
बहती अश्रु धारा बचानी होगी
जहाँ से फूटते हैं सभी
आत्मीय स्त्रोत।


*** मंजुल भटनागर ***

No comments:

Post a Comment

दीवाली के दोहे

जब लौटे वनवास से, लखन सहित सियराम। दीपों से जगमग हुआ, नगर अयोध्या धाम।।1।। जलते दीपों ने दिया, यह पावन संदेश। ज्योतिपुञ्ज श्...