Sunday, 18 January 2015

ते ते पाँव पसारिये जेती लम्बी सौर

'सत्यं शिवं सुन्दरम् - साहित्य सृजन मेखला' 
मज़मून 37 में चयनित सर्वश्रेष्ठ रचना



तृष्णा एक भँवर है गहरा नहीं है कोई छोर
उतने पाँव पसारिये बस जितनी लम्बी सौर

निर्धन है तो शरमाना क्या, 
 निर्बल है तो घबराना क्या, 
 जीवन के मौसम बदलेंगे, 
 सच कहने में हकलाना क्या, 
धन-दौलत से हंस न बनते ना ही होते मोर। 
 उतने पाँव पसारिये बस जितनी लम्बी सौर

सूरज गर्मी से जलता है, 
 चन्दा को ग्रहण हरता है, 
 पूर्ण नहीं कोई दुनिया में,
 तारा भी टूट के झरता है,
अपनी कमियों का कुदरत कब करती है शोर
 उतने पाँव पसारिये बस जितनी लम्बी सौर

सपनो में हर्ज नहीं होता,
 पर जीवन कर्ज नहीं होता,
 भ्रम की दुनिया में जीना भी,
 मानव का फर्ज नहीं होता,
जीवन अंधेरी रातें है और कभी है भोर
 उतने पाँव पसारिये बस जितनी लम्बी सौर

दुनिया में क्या लेकर आया,
 जो कुछ पाया यहीं पर पाया,
 फल जो खाता रोज मजे से,
 तूने क्या कोई पेड़ लगाया,
सब-कुछ मिला तुझे कुदरत से होता भाव विभोर
 उतने पाँव पसारिये बस जितनी लम्बी सौर

***संजीव जैन***
 

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