आख़िर क्यों - कड़वी हक़ीक़त की एक ग़ज़ल

  नहीं है आस अपनों से नहीं अधिकार आख़िर क्यों भरी आँखें मगर है प्यार का इज़हार आख़िर क्यों ख़ुदा ने नेमतें प्यारी हमें बख़्शी हुईं लेकिन कपट छ...