Thursday, 30 January 2014
Subscribe to:
Posts (Atom)
हे माँ दुर्गे!
हे माँ दुर्गे! तुम जगत जननी हो असुरों का संहार करती हो पर माँ/मनुष्य के भीतर पलते असुरों का क्या? वे असुर/ जो तुम्हारे मंदिर में शीश झुकात...
-
मानव (१) मैं भी मानव हूँ। एहसास इसका, इसलिए नहीं होता, कि परिभाषा के अनुकूल मैं भी हूँ। बल्कि, इसलिए होता है क्योंकि मैं भी बे...
-
जब उजड़ा फूलों का मेला। ओ पलाश! तू खिला अकेला।। शीतल मंद समीर चली तो , जल-थल क्या नभ भी बौराये , शाख़ों के श्रृंगों पर चंचल , कुसुम-...
