हे माँ दुर्गे!

  हे माँ दुर्गे! तुम जगत जननी हो असुरों का संहार करती हो पर माँ/मनुष्य के भीतर पलते असुरों का क्या? वे असुर/ जो तुम्हारे मंदिर में शीश झुकात...