Sunday, 17 May 2026
आख़िर क्यों - कड़वी हक़ीक़त की एक ग़ज़ल
Sunday, 10 May 2026
'मान' सहित विश्वास जगाकर - एक गीत
*** डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी
Sunday, 3 May 2026
सरतीति संसार: - एक गीत
Sunday, 26 April 2026
जीवन के प्रश्नों का हल - एक गीत
Sunday, 19 April 2026
प्राची प्रकट हुई भारत में, लेकर आज नया दिनमान - एक गीत
प्राची प्रकट हुई भारत में, लेकर आज नया दिनमान॥
उषा लिए उम्मीद रश्मियाँ, पहुँच रही संसद के द्वार।
शोर मचा चहुँ ओर बढ़ रहा, भारत में नारी अधिकार।
किन्तु अभ्र आशंकाओं के, खड़ा अभी आभा को घेर।
साथ ग्रहण बन रूढ़ शक्तियाँ, करा रहे शुभक्षण में देर।
छ्द्म कोहरा फट जाएगा, आएगा ही नवल विहान।
प्राची प्रकट हुई भारत में, लेकर आज नया दिनमान॥
जल थल नभ के आयामों तक, नारी पहुँच रही है आज
रहा न कोई क्षेत्र बचा अब, जहाँ न भरती ये परवाज़।
अगर न्याय है तो आधा दो, ऐसा ही कहता दस्तूर।
दशम अंश दे उन्हें रखा है, संसद के चौखट से दूर।
भीख नहीं हक माँग रही है, लौटा दो उसका सम्मान।
प्राची प्रकट हुई भारत में, लेकर आज नया दिनमान॥
सिर्फ लुभावन वादे हैं या, सचमुच पुरुष हुआ गंभीर।
या नारी को चाप बना कर, मारा पुनः चुनावी तीर।
पहला बिल लेकर जब आया, लोक सभा चुनाव चौबीस।
कहा गया धर्य रख नारी, दूर नहीं है अब है उनतीस।
बंग जीतने की चाहत है, या होगा नारी उत्थान।
प्राची प्रकट हुई भारत में, लेकर आज नया दिनमान॥
*** शशि रंजन 'समदर्शी'
Sunday, 12 April 2026
मत्तगयंद सवैया - जयघोष
जीत लिया जिसने मन को वह वीर प्रवीर अधीर न होगा।
क्रोध प्रलोभन काम गुमान लिए मन मेल असीर न होगा।
सौम्य सुशील स्वभाव सुसज्जित और कहीं रणधीर न होगा।
भीतर धार लिया प्राण तो फिर और समान सुबीर न होगा।।
जोश जागे रणतूर्य सुने असि ताल बजा जयघोष करे वो।
मौत नहीं भयभीत करे तब कौन कहे किस बात डरे वो।
नाद अगाध करे मुख से ललकार सुना मन भीति भरे वो।
यूढ़ पलायन शत्रु करें रण में जब पाँव अडोल धरे वो।।
*** सूरजपाल सिंह, कुरुक्षेत्र
Sunday, 5 April 2026
सौंदर्य - एक कवि का सच
तुम शब्दों से परे हो
Sunday, 29 March 2026
पर्व की महत्ता - दोहे
Sunday, 22 March 2026
ईश्वर का वरदान - वृक्ष
Sunday, 15 March 2026
युद्ध का पर्याय जीवन हो गया है - एक गीत
युद्ध का पर्याय जीवन हो गया है।
दर्प में आघात का व्रण बो गया है।
पाथ चुनते हैं समर का स्वार्थ में जो।
व्यग्र होती चेतना मृतप्राय हैं वो।
भार ले उत्तेजना को ढो रहा तन।
अनवरत अधिकार लोलुपता भरा मन।
आदि का सुर-ताल बेबस सो गया है।
युद्ध का परिणाम विध्वंसक सदा ही।
प्रति दिशा भयभीत रहती है कदा ही।
कृष्ण ला्ते शांति का प्रस्ताव पावन।
ठानता जो बैर वो है दुष्ट रावन।
भाव कुंठित करुण रस को धो गया है।
द्वेष पारावार अंतस को गलाता।
छेड़ता संग्राम निज प्रतिभा छलाता।
हैं बरसते क्रोध में जो अग्नि के कण।
क्षार करते हैं सभी संवाद के पण।
अंत का अध्याय जैसे खो गया है।
युद्ध का पर्याय जीवन हो गया है।
*** सुधा अहलुवालिया
Sunday, 8 March 2026
होली के रंग - कुण्डलिया छंद
Sunday, 1 March 2026
ज़िंदगी का सच - मुक्तक
Sunday, 22 February 2026
उर्वर भू यह भारत की - एक गीत
Sunday, 15 February 2026
सबके पालन हार - एक गीत
Sunday, 8 February 2026
ब्रह्म का स्वरूप माँ
Sunday, 1 February 2026
प्रेम ही मोक्ष है - एक गीत
प्रेम ही प्राण है प्रेम ही श्वास है प्रेम पर ही टिका ये धरा ये गगन।
आख़िर क्यों - कड़वी हक़ीक़त की एक ग़ज़ल
नहीं है आस अपनों से नहीं अधिकार आख़िर क्यों भरी आँखें मगर है प्यार का इज़हार आख़िर क्यों ख़ुदा ने नेमतें प्यारी हमें बख़्शी हुईं लेकिन कपट छ...
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पिघला सूर्य , गरम सुनहरी; धूप की नदी। बरसी धूप, नदी पोखर कूप; भाप स्वरूप। जंगल काटे, चिमनियाँ उगायीं; छलनी धरा। दही ...
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सिर शोभित हेम किरीट गजानन मूषक वाहन प्रेम करे। उपवीत मनोहर कंध पड़ा अरु मोदक के कर थाल धरे। फल में प्रिय जामुन कैथ लगें उर पाटल फूल...













