Sunday, 17 May 2026

आख़िर क्यों - कड़वी हक़ीक़त की एक ग़ज़ल

 

नहीं है आस अपनों से नहीं अधिकार आख़िर क्यों
भरी आँखें मगर है प्यार का इज़हार आख़िर क्यों

ख़ुदा ने नेमतें प्यारी हमें बख़्शी हुईं लेकिन
कपट छल बेइमानी से भरा संसार आख़िर क्यों

कभी बेटी किसी पर बोझ तो होती नहीं फिर भी
उठा दी बेरहम हो बीच में दीवार आख़िर क्यों

बराबर हैं सभी इंसां न कोई फर्क इनमें है
तो फिर चारों तरफ ये ख़ून की बौछार आख़िर क्यों

दिखावा ख़ुदफ़रेबी का लगी कुछ होड़ है ऐसी
हुए मगरूर रिश्तों में अजब व्यवहार आख़िर क्यों

गए हो छोड़ कर जब से लगे वीरान ये दुनिया
सुकूनो चैन को खोकर पड़े मँझधार आख़िर क्यों

ठिकाना चंद दिन का है तमाशा कुछ घड़ी का है
भला फिर कर रहे भाई यहाँ तक़रार आख़िर क्यों

*** कान्ति शुक्ला


Sunday, 10 May 2026

'मान' सहित विश्वास जगाकर - एक गीत

गीत गुनेंगे सरगम अपने, नित्य नये अहसास जगाकर।
राष्ट्र चेतना रोम-रोम में, 'मान' सहित विश्वास जगाकर।

सरस लालिमा प्राचीरों पर,
आभा-मण्डल कर दे अर्पित।
मदिर मदिर तन पवन दुलारे,
माटी महके सोंधी सिंचित।
गुन-गुन का इकतारा छेड़े, चंचल भँवरे हास जगाकर।
राष्ट्र चेतना रोम-रोम में, 'मान' सहित विश्वास जगाकर।

विकट वेदना द्रुतगामी हो
राग-द्वेष को होम करें हम।
ऋण अनंत वसुधा के वीरों,
सिंहनाद को व्योम करें हम।
संस्कृति के सम्मान-मान से,नवल पंथ विन्यास जगाकर।
राष्ट्र चेतना रोम-रोम में, 'मान' सहित विश्वास जगाकर।

घिरी साँझ जो धरा गगन तक,
पथ दीप्तिमान करना प्रतिपल।
तरल तरंगित अंतस्तल में,
रत्नाकर सा होगा हलचल।
मंत्र मुग्ध सी करे रागिनी,”लता” अनछुई प्यास जगाकर।
राष्ट्र चेतना रोम-रोम में, 'मान' सहित विश्वास जगाकर।

*** डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी  

Sunday, 3 May 2026

सरतीति संसार: - एक गीत

 

यह माटी है यह सोना है, सुख-दुख का भण्डार है।
जिसने इसको जैसा देखा, वैसा यह संसार है।।
मेला लगा कहीं भक्तों का, संगम तट पर वास है,
कहीं नशे में चूर जवानी, जलती गीली घास है,
विश्वासों के बिछे गलीचे, छल-छद्मों का जाल है,
उगल रहे विष साॅंप दूध पी, दन्त गढ़ाते भाल है।

फूलों की घाटी के नीचे, दहक रहे अंगार है।
जिसने इसको जैसा देखा, वैसा यह संसार है।।

शांति - प्रेम - सद्भाव यहीं है, विश्व ग्राम का भाव भी,
मतभेदों के बीच उभरता, नव रिश्तों का चाव भी,
है आतंक - युद्ध -शोषण तो, मानवता का गान भी,
समृद्धि ने संस्कृति को बाँटें, गुप्त घाव का भान भी।

कहीं ज्ञान का विद्रुप मुख है, कहीं ज्ञान शृंगार है।
जिसने इसको जैसा देखा, वैसा यह संसार है।।

शाश्वत भी है मिथ्या भी है, व्यष्टि- समष्टि रूप यही,
क्षणभंगुर में नित जीवन है, वही कृषक है कृषि वही,
वही जगत के नाट्य मंच का, अभिनेता- निर्देशक है,
मनुज पीर का कुशल चितेरा, हँसता हुआ विदूषक है।

समझो तो जग ही ईश्वर है, ना मानो भंगार है।
जिसने इसको जैसा देखा, वैसा यह संसार है।।
~~~~~~~~~~~~~~~~~
*** मदन मोहन शर्मा

Sunday, 26 April 2026

जीवन के प्रश्नों का हल - एक गीत

 

उलझन कभी नहीं बतलाती, जीवन के प्रश्नों का हल।
शान्त हृदय से ही मिलते हैं, सुन्दर सुखद सुहाने पल।

बाधाओं से मुक्त नहीं हैं, अनजानी जीवन राहें।
जहाँ विपत्ति खड़ी रहती हैं, फैलाए अपनी बाहें।
नहीं दिखाई पड़ता हमको, इस नैराश्य सिन्धु का तल।
उलझन कभी नहीं बतलाती, जीवन के प्रश्नों का हल।

जब अशान्त हो अन्तर अपना, सुख का फूल नहीं खिलता।
उलझन के ताने-बाने का, कोई सिरा नहीं मिलता।
अवसादों का तमस् लिए कब, होगा मधुमय आगत कल।
उलझन कभी नहीं बतलाती, जीवन के प्रश्नों का हल।

नहीं आज में जीने देते, उलझन के ये चौराहे।
किंकर्तव्यविमूढ़ हुआ मन, जादू की लकड़ी चाहे।
किन्तु मिटेगी सारी उलझन पाकर आत्म शक्ति का बल।
उलझन कभी नहीं बतलाती, जीवन के प्रश्नों का हल।

*** सीमा गुप्ता 'असीम'

Sunday, 19 April 2026

प्राची प्रकट हुई भारत में, लेकर आज नया दिनमान - एक गीत

संसद में संवाद शुरू है, नारी है जिसका उन्वान।
प्राची प्रकट हुई भारत में, लेकर आज नया दिनमान॥

उषा लिए उम्मीद रश्मियाँ, पहुँच रही संसद के द्वार।
शोर मचा चहुँ ओर बढ़ रहा, भारत में नारी अधिकार।
किन्तु अभ्र आशंकाओं के, खड़ा अभी आभा को घेर।
साथ ग्रहण बन रूढ़ शक्तियाँ, करा रहे शुभक्षण में देर।
छ्द्म कोहरा फट जाएगा, आएगा ही नवल विहान।
प्राची प्रकट हुई भारत में, लेकर आज नया दिनमान॥

जल थल नभ के आयामों तक, नारी पहुँच रही है आज
रहा न कोई क्षेत्र बचा अब, जहाँ न भरती ये परवाज़।
अगर न्याय है तो आधा दो, ऐसा ही कहता दस्तूर।
दशम अंश दे उन्हें रखा है, संसद के चौखट से दूर।
भीख नहीं हक माँग रही है, लौटा दो उसका सम्मान।
प्राची प्रकट हुई भारत में, लेकर आज नया दिनमान॥

सिर्फ लुभावन वादे हैं या, सचमुच पुरुष हुआ गंभीर।
या नारी को चाप बना कर, मारा पुनः चुनावी तीर।
पहला बिल लेकर जब आया, लोक सभा चुनाव चौबीस।
कहा गया धर्य रख नारी, दूर नहीं है अब है उनतीस।
बंग जीतने की चाहत है, या होगा नारी उत्थान।
प्राची प्रकट हुई भारत में, लेकर आज नया दिनमान॥

*** शशि रंजन 'समदर्शी'

Sunday, 12 April 2026

मत्तगयंद सवैया - जयघोष

 

जीत लिया जिसने मन को वह वीर प्रवीर अधीर न होगा।

क्रोध प्रलोभन काम गुमान लिए मन मेल असीर न होगा।

सौम्य सुशील स्वभाव सुसज्जित और कहीं रणधीर न होगा।

भीतर धार लिया प्राण तो फिर और समान सुबीर न होगा।। 


जोश जागे रणतूर्य सुने असि ताल बजा जयघोष करे वो।

मौत नहीं भयभीत करे तब कौन कहे किस बात डरे वो।

नाद अगाध करे मुख से ललकार सुना मन भीति भरे वो।

यूढ़ पलायन शत्रु करें रण में जब पाँव अडोल धरे वो।। 


*** सूरजपाल सिंह, कुरुक्षेत्र 


Sunday, 5 April 2026

सौंदर्य - एक कवि का सच

 

तुम शब्दों से परे हो
फिर भी हर कवि तुम्हारा
उपयोग करना चाहता है। 
मानो, वह हवा को मुट्ठी में क़ैद कर
लेने पर आमादा हो,
मानो, आकाश को आँखों में समेट लेने
की उसकी ज़िद हो,
सौंदर्य तुम्हें देखने के लिए
आँखें नहीं/दृष्टि चाहिए
और दृष्टि भी वही
जिसका जन्म अन्तर्मन से हो
जो पूर्वाग्रहों से मुक्त हो
क्योंकि,  जब तक मापते रहेंगे तुम्हें 
त्वचा, आकार और मानकों से/ तब तक तुम
छूटते रहोगे हमारी पकड़ से,
एक अनाम/अनकहा/अनदेखा
सच बनाकर/सौंदर्य वस्तु नहीं/अनुभव हो
तुम दृश्य नहीं/ संवेदना हो
और शायद इसीलिए
तुम्हें पाया नहीं जाता है,
केवल महसूस किया जाता है। 

*** राजेश कुमार सिन्हा  

Sunday, 29 March 2026

पर्व की महत्ता - दोहे

 

पर्व बढ़ाते हैं सदा, सामाजिक सद्भाव।
पर्वों से रखना नहीं, मानव कभी दुराव।।

एक सूत्र में बाँधकर, पर्व रखें परिवार।
प्रेम और सौहार्द का, देते हैं उपहार।।

भारतीय त्योहार हैं, जीवन शैली अंग।
एक साथ जब बैठते, छेड़ें विविध प्रसंग।।

पर्व हमें देते सदा, खुशी और आनंद।
यही मानसिक शांति के, लिखते मधुमय छंद।।

संस्कृति और परंपरा, समझाते त्योहार।
नव उमंग उत्साह को, पर्व करें साकार।।

*** चंद्र पाल सिंह 'चंद्र'

Sunday, 22 March 2026

ईश्वर का वरदान - वृक्ष

 

पेड़ों से धरती की शोभा, कहते संत सुजान।
पेड़ लगाएँ पेड़ लगाएँ, मिलकर सब इंसान।।
इनसे लाभ बहुत हैं हमको, कहता है विज्ञान।
हरे पेड़ को नहीं काटना, हो भारी नुकसान।।

प्राण वायु मिलती है इनसे, जो जीवन आधार।
बात मान लो मेरी भाई, करो वृक्ष से प्यार।।
पशुओं को देते ये भोजन, ठंडी छाँव अपार।
खग-वृंदो के नीड़ यही हैं, सबका है उपकार।।

औषधि के भंंडार यही हैं, करते हमें निरोग।
भारत भू पर करते आए, हम इनका उपयोग।।
पुष्प फलों के हैं ये दाता, ईश्वर के वरदान।
कई तरह से पूरे करते, हम सबके अरमान।।

वेद हमें समझाते आए, देव इन्हें लो मान।
वृक्ष काटना बड़ा पाप है, बनें नहीं नादान।।
जनसंख्या अभिशाप बन रही, उजड़े हैं वन खूब।
जंगल को हम खूब बढ़ाएँ, बन करके महबूब।।
~~~~~~~~~~~~~
*** मुरारि पचलंगिया

Sunday, 15 March 2026

युद्ध का पर्याय जीवन हो गया है - एक गीत

 


युद्ध का पर्याय जीवन हो गया है।
दर्प में आघात का व्रण बो गया है।

पाथ चुनते हैं समर का स्वार्थ में जो।
व्यग्र होती चेतना मृतप्राय हैं वो।
भार ले उत्तेजना को ढो रहा तन।
अनवरत अधिकार लोलुपता भरा मन।
आदि का सुर-ताल बेबस सो गया है।

युद्ध का परिणाम विध्वंसक सदा ही।
प्रति दिशा भयभीत रहती है कदा ही।
कृष्ण ला्ते शांति का प्रस्ताव पावन।
ठानता जो बैर वो है दुष्ट रावन।
भाव कुंठित करुण रस को धो गया है।

द्वेष पारावार अंतस को गलाता।
छेड़ता संग्राम निज प्रतिभा छलाता।
हैं बरसते क्रोध में जो अग्नि के कण।
क्षार करते हैं सभी संवाद के पण।
अंत का अध्याय जैसे खो गया है।
युद्ध का पर्याय जीवन हो गया है।

*** सुधा अहलुवालिया

 


Sunday, 8 March 2026

होली के रंग - कुण्डलिया छंद

 

तन को सतरंगी करें, ये होली के रंग।
मन उत्फुल्लित उछलता, ऐसी उठे तरंग।
ऐसी उठे तरंग, खुशी लहराती लहरे।
दुख नैराश्य विषाद, दूर तक कहीं न ठहरे।
मिटा मनों का मैल, एक कर देती मन को।
पिचकारी की धार, हृदय सँग रँगती तन को।
समरसता में घोलता, जीवन का जो रंग।
हो हुल्लड़ के साथ है, होली का हुड़दंग।
होली का हुड़दंग, पहन फूलों के गजरे।
गालों मले गुलाल, चेहरे हैं चितकबरे।
खाते हैं मिष्ठान्न, भेद बिन सब समता में।
होली का त्यौहार, भरे रँग समरसता में।
डॉ. राजकुमारी वर्मा

Sunday, 1 March 2026

ज़िंदगी का सच - मुक्तक

 

उसूलों की लड़ाई में, मुहब्बत हार जाती है।
फरेबी हो अगर सज़दे, इबादत हार जाती है।।
जिसे छलना फ़क़त आता, हिमायत वो करे सच की,
यही दस्तूर दुनिया का, शराफ़त हार जाती है।।

कहीं पर प्यार बिकता है, कहीं ईमान बिकता है।
खरीदोगे अगर तुम भी, जहाँ में ज्ञान बिकता है।।
शराफ़त की सभी बातें, किताबी फलसफ़ा यारों,
हक़ीक़त नोट की समझो, यहाँ इन्सान बिकता है।।

*** विजय मिश्र दानिश


Sunday, 22 February 2026

उर्वर भू यह भारत की - एक गीत

 

संतों की यह पावन धरती, अखिल जगत में न्यारी है।
मातृभूमि को माता कहते, जन्म दिया बलिहारी है।।

कलकल करती बहे जहाँ पर, नदियों की पावन धारा।
जम्बू द्वीपे आर्याव्रत का, कहलाता था यह प्यारा ।।
हिम किरीट सा श्वेत हिमालय, हरित उर्वरा धरणी है।
कलकल करती नदियाँ बहती, लगती कितनी प्यारी है।।

रवि की किरणें यहाँ भूमि पर, नित स्वर्णिम रूप बिखेरे।
अलख जगाने हुए यहाँ पर, कितने ही सन्त चितेरे।।
जन्में वीर हजारों कितने, उर्वर भू यह भारत की।
सदा शत्रुओं से रक्षा करने, सदा रही तैयारी है।।

वायु नीर क्यों करे प्रदूषित, श्वास कहाँ जाकर लेना।
भारत भू के जंगल पर्वत, और नहीं कटने देना।।
भरा खजाना भारत माँ का, अब कोई लूट न पाए।
इसे बचा कर्त्तव्य निभाना, निश्चित जिम्मेदारी है।।

*** लक्ष्मण लड़ीवाला 'रामानुज'

Sunday, 15 February 2026

सबके पालन हार - एक गीत

 

सत्य सनातन नाम ईश का, सबके पालन हार।
सनद साधना डगमग है प्रभु, हाथ गहो पतवार।

जग के हो आराध्य देव तुम, चित्तवृत्ति अविनाश।
यही कल्पना युग मन्वंतर, अरि को करे निराश।
भूल रहें जो वेद ऋचाएँ, वंशज हैं हम आर्य,
अविनाशी को कहे सनातन, पंच तत्व में सार।

भेदभाव मतिसुप्त करें जो, क्षुद्र हृदय भयभीत।
धीर धरे साधक मन मंदिर, सुखकर ये संगीत।
रही सदी से मुखर चेतना, बढ़ा रहे संताप,
अंश अनागत समझ न पाये, विकल नीति आधार।

महिमा करें बखान पुण्यपथ, राम-रमा अनिकेत।
मर्यादा को लाँघा जिसने, दुष्ट हृदय समवेत।
क्षुद्र ग्रहों की भाँति मिटेंगे, कालनेमि सम दैत्य,
संस्कृति का आधार तुम्हीं हो, हे मेरे करतार।

*** डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

Sunday, 8 February 2026

ब्रह्म का स्वरूप माँ

 

सौम्य प्रेम,शील,क्षेम का विशुद्ध रूप माँ।
जीव तत्व में विभक्त ब्रह्म का स्वरूप माँ।

दण्ड दे दुलारती, भविष्य को सँवारती।
कण्ठ से लगा कभी ममत्व से निहारती।
क्षीर के प्रसाद से भरा प्रणम्य कूप माँ।
जीव तत्व में विभक्त ब्रह्म का स्वरूप माँ।

कोमलांगिनी, सुभाषिनी,अगाध वत्सला।
शौर्य से बनी कभी सशक्त ढाल अर्गला।
कष्ट वृष्टि में लगे सदा सुरम्य धूप माँ।
जीव तत्व में विभक्त ब्रह्म का स्वरूप माँ।

आदि है अनंत है, अशेष है, विशेष है।
सृष्टि के प्रसार का पुनीत शेष, श्लेष है।
कोटि-कोटि सूर्य चन्द्र सी अगम्य भूप माँ।
जीव तत्व में विभक्त ब्रह्म का स्वरूप माँ।

*** अर्चना सिंह 'अना'

Sunday, 1 February 2026

प्रेम ही मोक्ष है - एक गीत

 

प्रेम ही प्राण है प्रेम ही श्वास है प्रेम पर ही टिका ये धरा ये गगन।

प्रेम ही शांति है प्रेम ही मोक्ष है प्रेम को ही हृदय कर रहा है नमन।

प्रेम से जीव है प्रेम से है जगत प्रेम से ईश है प्रेम से भक्ति है।
प्रेम ही भुक्ति है प्रेम ही मुक्ति है प्रेम कैवल्य है प्रेम ही शक्ति है।
प्रेम ही वंदना प्रेम ही अर्चना प्रेम अद्वैत है प्रेम ही है मिलन।
प्रेम ही शांति है प्रेम ही मोक्ष है प्रेम को ही हृदय कर रहा है नमन।

प्रेम ही प्यास है प्रेम ही तृप्ति है प्रेम ही भावना का अगम सिंधु है,
प्रेम से आचमन मन हमेशा करे प्रेम ही भाव का उच्चतम बिंदु है।
प्रेम के पान से प्रेम के मान से मिट सकेगी हृदय की अमिट यह तपन।
प्रेम ही शांति है प्रेम ही मोक्ष है प्रेम को ही हृदय कर रहा है नमन।

प्रेम ही धर्म है प्रेम ही कर्म है प्रेम की रागनी गा रहे ग्रंथ हैं
प्रेम ही सार है इस सकल सृष्टि का प्रेम से ही सजे भाव मय पंथ हैं।
बाँध सकता बताओ भला प्रेम को कामना से भरा यह अधूरा बदन।
प्रेम ही शांति है प्रेम ही मोक्ष है प्रेम को ही हृदय कर रहा है नमन।

*** सीमा गुप्ता 'असीम'

आख़िर क्यों - कड़वी हक़ीक़त की एक ग़ज़ल

  नहीं है आस अपनों से नहीं अधिकार आख़िर क्यों भरी आँखें मगर है प्यार का इज़हार आख़िर क्यों ख़ुदा ने नेमतें प्यारी हमें बख़्शी हुईं लेकिन कपट छ...