Sunday, 10 May 2026

'मान' सहित विश्वास जगाकर - एक गीत

गीत गुनेंगे सरगम अपने, नित्य नये अहसास जगाकर।
राष्ट्र चेतना रोम-रोम में, 'मान' सहित विश्वास जगाकर।

सरस लालिमा प्राचीरों पर,
आभा-मण्डल कर दे अर्पित।
मदिर मदिर तन पवन दुलारे,
माटी महके सोंधी सिंचित।
गुन-गुन का इकतारा छेड़े, चंचल भँवरे हास जगाकर।
राष्ट्र चेतना रोम-रोम में, 'मान' सहित विश्वास जगाकर।

विकट वेदना द्रुतगामी हो
राग-द्वेष को होम करें हम।
ऋण अनंत वसुधा के वीरों,
सिंहनाद को व्योम करें हम।
संस्कृति के सम्मान-मान से,नवल पंथ विन्यास जगाकर।
राष्ट्र चेतना रोम-रोम में, 'मान' सहित विश्वास जगाकर।

घिरी साँझ जो धरा गगन तक,
पथ दीप्तिमान करना प्रतिपल।
तरल तरंगित अंतस्तल में,
रत्नाकर सा होगा हलचल।
मंत्र मुग्ध सी करे रागिनी,”लता” अनछुई प्यास जगाकर।
राष्ट्र चेतना रोम-रोम में, 'मान' सहित विश्वास जगाकर।

*** डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी  

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